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आशा का नभ है विशाल…।

जाने कितनी ही सुबह बीत गई रात
को तकने के बहाने पर याद रहा
मेरा यही साथी जो साथ चला था
तन्हाइयों में उस वक्त…
अपने फिल्म को लेकर इतना व्यस्त
हो गया हूँ कि कब रात आती है
और चली जाती है पता ही नहीं चलता।
वैसे मेरी फिल्म का Promo
सीरिफोर्ट ऑडिटोरियम में 20 मई को
दिखलाया गया था जिसमें दिल्ली की
मुख्यमंत्री ने भी शिरकत ली थी…
कुछ तकनीकी पक्ष का काम बचा है
सो उसी को पूरा करने में लगा हूँ।
आज बहुत दिनों बाद आप सब से
कुछ कहने का दिल हुआ तो आशा
(Hope) को साथ ले आया…।



स्वयं के अंतस में अपने को गहरे उतार कर देखो,
वहाँ अंजन की काली रेखा में भी आंनद घटित होता
ही होगा…

जाग हो जाये अगर जाग से ज्यादा,
वहाँ स्वप्नों के आंगन में भविष्य सार्थक होता
ही होगा…

स्वतंत्र हो कर निर्भीक नये आवरण में झांक कर देखो
वहाँ पार सीमाओं के परम विराट जागरित होता
ही होगा…

बाहर निकल कर सघन अंधकार से आसमान में देखो,
वहाँ आशा के नभ-मंडल में उल्लास योग का संगम होता
ही होगा…

"मात्र सुख की आशा में कहाँ जीवन का हर्ष बहता है,
वह तो सत्य प्रवाह है… जो अनंत गहरे में भीतर ही भीतर
इठलाता है…।"
11:28 AM
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11:28 AM

Divine India

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मैं हूँ यही मेरा है नव-निर्माण…



नियती नहीं मेरा किसी सोये हुए इतिहास का
उद्घोषणा प्रकृति का नवीन वर्तमान हूँ…

मन की उदास वृत्ति बेचैन शोक का नाद नहीं
राह दृष्टांत धवल ज्योति का पूँज हूँ

गहन अंधकार निस्तेज आवरण अविद्या शरणार्थी नहीं
प्रस्फुटित काया प्रज्ञा भूषित क्रांति का पुत्र हूँ

हारा हुआ संग्राम कोई मृतकों की परिपाटी नहीं
शिखर मुकुट उद्देश्य जीत का जागा हुआ कटाक्ष हूँ…

पंचरत्नों की माया मात्र जीव सकल निर्माण नहीं
निर्गुण शांत प्रार्थना का परम आनंद हूँ…

मात्र मृदा की संतान उसकी तामसी चेतना नहीं
थोड़ा उपर बहुत उपर अनंत का विस्तार हूँ…

क्रंदन कोलाहल सृष्टि का केवल पंख नहीं
सात्विक प्रेम परमात्मा का अद्भुत श्रृंगार हूँ

विपद तपस्चर्या शून्य योग खंडित जिज्ञासा स्वयं नहीं
जीवन में बहता राग-उल्लास…महान संन्यासी हूँ मैं…।

1:55 PM
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1:55 PM

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जिंदगी लहर है…इबादत है…!!!



यह निर्जरा है…प्रधन का
संयुग है…एषणा का
समग्रता है…आश्चर्य का
चांदनी है…अपूर्व सौंदर्य शीतलता का
जिंदगी लहर है…कौतूहल का
इबादत है…परमात्मा के स्नेहावलंबन का,

छिपाया मर्म है कितने स्थापनाओं का
बड़ा अनोखा रहस्य भी है अंधकार का
भाषा भी इसमें और परिभाषा भी…
आशा का तिनका और एक सहारा भी
निराशा की लाठी है यह, तत्वज्ञान भी

हम खिंचते जाते है आढ़ी-टेढ़ी लकीरें…
बिना तस्वीर की परिकल्पनाओं के…
राह पर बढ़ चलते हैं और कई मोड़ों पर
सोंचे बिना मुड़ जाते हैं……
अपने मंतव्यों पर बिना समझे चढ़कर उतर जाते हैं
गुजरते हादशों के पन्नों को बस यूं ही
पलटते जाते है…
जिंदगी की इसी लहर को हम सब जीते चले जाते हैं।

सुबह होती है और रात गुजर जाती है अंगराइयों में
जिंदगी की यह लहर अपने ही कशमशाहट में
हंसते-रोते कट जाती है…खड़े रह जाते है उद्देश्य हमारे
जगत के अंधेरे साये में कढ़वे सत्य के सहारे

ख्यालों की सरिश्त से तरबतर आलम तकता है परेशान होकर
कोई रुककर किसी के हाथ भी तो नहीं सहलाता
मृदुलतास्नेह वर्षा से मन को स्पर्श भी तो नहीं करता
पहचानना तो दूर…अंधी-दौड़ के साथी सब
अपने होकर भी मुख फेर लेते हैं

जिंदगी की यह भी एक लहर है…जो उदासी की बदली
से झांकती जाती है…नदियों पर तैरते, पर स्थिर दिखते
पतवाड़ों के बिल्कुल नीचे से विशाल आवरण में बहे जाती है…
डुबकी लगाते है नदी में और तत्क्षण पूरा जीवन नया हो्कर
पिछे छूटे समय पर व्यंग करते बहे जाती है…।

निगाहें ढूंढ़ती है उसे, वारिपूरित कर दे निर्जन उपवन को
दोनों हथेलियों से अपने जो सहलाए मातम को
तन्हाइयों से पटा यह वृहत मैदान सुगम उत्सव को
उन्मुलित है कर रहा…अग्रगण्यता का मंत्र लिए
पकड़े विज्ञान के हाथों को…
प्रेम-अनुराग के मतलब को ही बदल रहा…
स्वच्छंदता इतिहास…!!!
और जीवन का मर्म यहीं खड़ा प्रतीक्षा कर रहा…

हम जीते चले जा रहे निरुद्देश्य
वह बदलता बहता जा रहा है…
लगातार बिन रुके…बिन थमे
जीते तो जाते हैं हम इसे अपना तरीका मानकर
मगर इस जीवन को जीने का सलीका
गलत होता…।
1:54 PM
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1:54 PM

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अशुभ की समस्या…!!!


ऐसे काफी सारे प्रश्न हैं जो
हमें उद्वेलित करते रहते हैं…
और उनमें सबसे महत्व-
पूर्ण दार्शनिक दृष्टिकोंण से
है कि जब इस जगत का
निर्माता ईश्वर है और जो
परम शक्तिशाली भी है तो इस जगत में अशुभ क्या कर रहा
है…अगर ईश्वर करुणामय व दयालु है…सभी को प्रेम करनेवाला
है तो इस जगत में तो चातुर्दिक आनंद ही आनंद होना चाहिए
था। मानव जीवन में दु:ख-संताप-लोभ की व्यापकता और भयभीत
कर देनेवाली प्राकृतिक विपदा कई रुपों में स्नेही स्रष्टा के विचार
को अविश्वसनीय बना देते हैं।
मेरा मानना है कि एक सर्वशक्तिमान सत्ता से
अशुभ की अपेक्षा नहीं की जा सकती…परमात्मा ने जब इस
प्रकृति को रचा तो मानव को कोरे कागज की तरह ' जगत ' थमा
दिया और साथमें शाश्वत बुद्धि और विवेक को दिया जिसका
उपयोग वह स्वतंत्ररुप में कर सकता था…।लेकिन संतुलन की
जो स्थिती हमें रखनी चाहिए थी वह लोभ-संवरण के कारणत:
टूट गई… जो परमशुभानुभूति है वो अशुभ का निर्माता नहीं हो
सकता !!! ये तय है!!! ईश्वरवादियों के इस तर्क में अभिनंदन पूर्ण
तर्कना विद्यमान है।इस जगत में दृष्टिगत "पाप" कोई अशुभ
नहीं जिसे दार्शनिकों ने इतना महत्व प्रदान किया है…क्योंकि
अशुभ की समस्या तो तब आयेगी जब सच में अशुभ विद्यमान
होगा।जो "पाप" इस जगत में सर्वत्र व्याप्त दिख रहा है…वस्तुत:
वह एक "परम शुभ" ही है, जो मानव जिज्ञासा के लिए रहस्यमय
अंधकार है…जो विश्व विकास की संभावना है, यह न होता तो
संघर्ष की उत्पत्ति संभव ही न हो पाती…यह तो एक " विरोधी शुभ "
है… चूंकि मानव सामान्यत: सीमित ज्ञान वाला प्राणी है जो जिज्ञासा
के कारण ज्ञान को सक्रिय करता रहता है…अगर यह न होता,वह या
तो जड़ बन जाता या इस पृथ्वी के पूर्ण सर्ग के पहले ही प्रलय की
क्रिया आरंभ हो जाती…। अभी तो जगत पूर्णत: खिला ही नहीं है तो
विकास ऊर्ध्वमुखी है लेकिन जैसे ही यह खिल उठेगा यह वापस उसी
स्थिती में लौट आएगा…क्योंकि जन्म और मृत्यु दोनों ही
परम सत्य है…।
11:31 AM
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11:31 AM

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Image Of Virtue..."सत्य संकेत"

Image Of Virtue
कोई और कहाँ है उसके जैसा,
जो गहरा इतना विशाल है
हर आकृति के पीछे...
"एक सवाल है"
जो शायद कुछ भी न कहता हो
फिर-भी 'व्यक्त आभास' है,
कण-कण में प्रकृति-प्रकृति सांसों में
भी उद्गार है…संकेत छुपा है आस-पास पर अज्ञान फैला…सब माया है,
मृत्यु व जीवन के मध्य सिमटा सब प्रयास है,
नभ के दोनों छोड़ों तक…एक वही तो गुंजायमान है,
मानव मस्तक के ठीक उपर एक
अत्यंत विस्तृत संसार है...
3:24 PM
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3:24 PM

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आज का चिंतन...

आज का चिंतन...
मेरा मानना है कि परमात्मा ने मनुष्य होकर
जन्म लिया है,यही अवतारवाद का भी स्वरुप
है किंतु यहाँ जन्म एक पूर्ण-मुक्त मानव का
होता है.जितने भी प्रज्ञावान पुरुष हुए हैं उनका
भी मानना कि हमारे भीतर जो चैतन्य है वही
परम अवस्था भी है--इसका तात्पर्य यही है कि
हर साधारण मानव परमात्मा की प्रतिमूर्तिस्वरुप
है जो मानव को अन्य किसी भी जीव से उसकी
अपार सक्षमता के कारणतः अलग करती है यानि प्रत्येक मानव के अंदर
ब्रह्मांड बनाने की क्षमता विद्यमान है अलौकिकता कहीं बाहर नहीं...अंतर्निहीत
होती है;शंकराचार्य ने माया को इस अज्ञान का कारण माना है...इसके कारण
ही हमें अपनी शक्ति का पूर्ण आभास नहीं हो पाता और परमात्मा स्वयं से
अलग दिखता है--हमारा शरीर तो एक तीर्थ है जहाँ हर एक उच्च स्तर
के बाद भीतरी शुद्धता का अनुभव होता जाता है...मात्र मानसिक व मन के
प्रयास से उन कोष्टकों को जागृत किया जा सकता है जो जन्म के साथ सभी
मनुष्य में सुप्तावस्था में होता है... चैतन्य का शाश्वत प्रवाह जो व्यक्तिगत
इच्छा-आकांक्षा से मुक्त होकर सर्वशक्तिमान सत्ता की ओर हो जाता है महानता
का शिखर उसके मस्तक पर होता है...हलांकि उसे यह पता नहीं होता, उसका
जीवन तो सत्-चित्त-आनंद में लीन होता है-- मैं यह सोंचता हूँ कि जब इस
जगत का प्रत्येक कण अपनी हर अवस्था में एक दुसरे से भिन्न होता है तो
व्यक्तिगत ज्ञान का अहंकार स्वभाविक ही है...किंतु यही तो अज्ञान है; हमारी सृष्टि
का स्वरुप विकासमान है जो लगातार किसी ओर प्रवाहमान है...यही गति दिव्य
अलौकिक युक्त मानव की अंतर्निहीत सत्ता उसके पुण्यात्मा होने का मार्ग बतलाती है...
और तभी जगत को संपूर्णता एवं सूक्ष्मता से देखा जा सकता है...
हरि ओम तत् सत्
3:16 PM
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3:16 PM

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चिंतन-५

"सच तो ये है कि हम अपने अंतस की आकांक्षाओं से
आगे कुछ-भी नहीं देख पाते; सचमुच...ये निगाहें
ही हमारी पथप्रदर्शक हैं, इन मन की विभूतियों से
आगे न हम कुछ जान पाते हैं और न ही समझ पाते हैं,
जिसने परम अनुभूति की आकृति को अपने अंतस में
स्थान दिया ही न हो वह नास्तिकता के पथ पर चला जाए,
कोई आश्चर्य नहीं. काम-ज्वाला और भौतिक-आवरण ने
इंसान के भीतरी चक्षुओं को इस तरह से कैद कर रखा है
कि स्वतः यह आभास होता है-- मेरा दृष्टिकोण ही सत्
और सर्वमान्य है किंतु यह सोंच गलत या सही नहीं है,
अंधकार मात्र इसकारण से है क्योंकि दूसरा मत भी हो
सकता है, इसे नकारते हैं-- मन की वास्तविक दुनियाँ को
अगर विस्तार दे सकें तो बाह्य सत्ता अपने-आप बृहत हो
जाएगी."
9:17 PM
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9:17 PM

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चिंतन-३

"जब पीड़ा का एहसास बढ़ता है तो उत्तेजना बढ़ती है,
और जब थोड़ा सुख बढ़ता है तो आनंद-धारा प्रवाहित
होने लगती है."
1:57 PM
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1:57 PM

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चिंतन-२

"इस समस्त संसार में जिंदगी से बडा और महत्वपूर्ण
कुछ भी नहीं हो सकता,कोई भी रिस्ता अपने जीवन
से ज्यादा अनूठा और अनमोल नहीं है.."
3:07 PM
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3:07 PM

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