आज का चिंतन...

आज का चिंतन...
मेरा मानना है कि परमात्मा ने मनुष्य होकर
जन्म लिया है,यही अवतारवाद का भी स्वरुप
है किंतु यहाँ जन्म एक पूर्ण-मुक्त मानव का
होता है.जितने भी प्रज्ञावान पुरुष हुए हैं उनका
भी मानना कि हमारे भीतर जो चैतन्य है वही
परम अवस्था भी है--इसका तात्पर्य यही है कि
हर साधारण मानव परमात्मा की प्रतिमूर्तिस्वरुप
है जो मानव को अन्य किसी भी जीव से उसकी
अपार सक्षमता के कारणतः अलग करती है यानि प्रत्येक मानव के अंदर
ब्रह्मांड बनाने की क्षमता विद्यमान है अलौकिकता कहीं बाहर नहीं...अंतर्निहीत
होती है;शंकराचार्य ने माया को इस अज्ञान का कारण माना है...इसके कारण
ही हमें अपनी शक्ति का पूर्ण आभास नहीं हो पाता और परमात्मा स्वयं से
अलग दिखता है--हमारा शरीर तो एक तीर्थ है जहाँ हर एक उच्च स्तर
के बाद भीतरी शुद्धता का अनुभव होता जाता है...मात्र मानसिक व मन के
प्रयास से उन कोष्टकों को जागृत किया जा सकता है जो जन्म के साथ सभी
मनुष्य में सुप्तावस्था में होता है... चैतन्य का शाश्वत प्रवाह जो व्यक्तिगत
इच्छा-आकांक्षा से मुक्त होकर सर्वशक्तिमान सत्ता की ओर हो जाता है महानता
का शिखर उसके मस्तक पर होता है...हलांकि उसे यह पता नहीं होता, उसका
जीवन तो सत्-चित्त-आनंद में लीन होता है-- मैं यह सोंचता हूँ कि जब इस
जगत का प्रत्येक कण अपनी हर अवस्था में एक दुसरे से भिन्न होता है तो
व्यक्तिगत ज्ञान का अहंकार स्वभाविक ही है...किंतु यही तो अज्ञान है; हमारी सृष्टि
का स्वरुप विकासमान है जो लगातार किसी ओर प्रवाहमान है...यही गति दिव्य
अलौकिक युक्त मानव की अंतर्निहीत सत्ता उसके पुण्यात्मा होने का मार्ग बतलाती है...
और तभी जगत को संपूर्णता एवं सूक्ष्मता से देखा जा सकता है...
हरि ओम तत् सत्

5 comments:

manya said...

samanarthak parantu bhinn roop se vyakt vichaaron ka achhaa smanwya.. jinhe swayam ke vicharaon ka pravaah diya gaya hai.. ek atal alaukik satya par kitne janate hai.. padhenge to sabhi.. pehle bhi padh chuke honge.. lekin kaun samjhega ya jagega.. yah kaliyug hai.. yahaan aadamai aadami ko kha raha hai , phir bhi aadami kahla raha hai.. par bahut prabhaavshaali vichaar hai.. vishwaas karti hun yah diya tufaan me bhi jala rahega..

Divine India said...

नहीं चाहता वो कुछ देर रुकें,उनके भी अपने
दायरे हैं,चाहता तो बस इतना हूँ...वो मौन होकर
हीं थोड़ी आश तो पायेंगे...कौन नहीं चाहता
दो पल की शांत दशा...परेशानी तो इतनी है
खुद को देखना कोई नहीं चाहता...ठीक कहा...
किंतु इंसान इंसान को नहीं स्वयं को निगलता
जा रहा है...। शुक्रिया

mauli said...

aap ko makar sankranti ki bahut bahut shubh kamna zivan k in pahaluon ko aapne badi sundarta se apne vicharo me pradarshit kiya he

Divine India said...

बहुत अच्छा लगा जो पहली बार मेरे ब्लाग पर
आईं और प्रेरणा वाक्यों से मेरा मनोबल बढ़ाया
आपके इसी प्रयास का इंतजार रहेगा...।

ranju said...

bahut khoob ..bahut hi sunder lafazo mein likha hai aapne ..

ranju