नियती नहीं मेरा किसी सोये हुए इतिहास का
उद्घोषणा प्रकृति का नवीन वर्तमान हूँ…
मन की उदास वृत्ति बेचैन शोक का नाद नहीं
राह दृष्टांत धवल ज्योति का पूँज हूँ…
गहन अंधकार निस्तेज आवरण अविद्या शरणार्थी नहीं
प्रस्फुटित काया प्रज्ञा भूषित क्रांति का पुत्र हूँ…
हारा हुआ संग्राम कोई मृतकों की परिपाटी नहीं
शिखर मुकुट उद्देश्य जीत का जाग हुआ कटाक्ष हूँ…
पंचरत्नों की माया मात्र जीव सकल निर्माण नहीं
निर्गुण शांत प्रार्थना का परम आनंद हूँ…
मात्र मृदा की संतान उसकी तामसी चेतना नहीं
थोड़ा उपर बहुत उपर अनंत का विस्तार हूँ…
क्रंदन कोलाहल सृष्टि का केवल पंख नहीं
सात्विक प्रेम परमात्मा का अद्भुत श्रृंगार हूँ…
विपद तपस्चर्या शून्य योग खंडित जिज्ञासा स्वयं नहीं
जीवन में बहता राग-उल्लास…महान संन्यासी हूँ मैं…।
Thursday, 10 April, 2008
मैं हूँ यही मेरा है नव-निर्माण…
Wednesday, 26 March, 2008
प्रेम पंथ है…आत्म प्रतीति।

पता नहीं मुझे इस जिंदगी के और कितने मायने हैं…
समझ नहीं आता कौन दु:ख के, कौन सुख के हैं…
सभी को साथ लेकर परखना……? संभव नहीं,
वक्त निकलता जाता है, कई उलझे मोड़ छोड़ देता है
मदिले संरचना में इसके फिर देवदास चला आता है
अपने को भींगाकर रस में पतला सा दर्द फैला जाता है
तन्हाई है…इंतजार भी…प्रतीक्षा है अपने-आप की
तलाश लेकिन करता है मन… दूर रह रहे साथी की
एकांत मन जो मानता ही…नहीं!!!
जाकर ले आ उसे… अब छोड़ भी यह मायूस बिस्तर
भाग उधर…चल दौड़ भी जा… खो न जाये यह सुहाना मंजर
साथ है जबतक साथी का अम्बर सौरभ बरसाता है
मूल रुप में प्रकृति विकास क्रीड़ा में रम जाती है…
सभ्यता का पथ रुककर थोड़ी देर…
संस्कार देवी से पूछेगा…वो कौन दिव्य संगत में है
किसकी यह रचना होगी…
विस्तार सत्य का मनन हृदय में… कोलाहल संयत वातावरण होगा
जटिल भावना… लम्बी उदासीनता में भी
चाँद नयनों में खिला होगा…
आगोश में लिपट कर दिवा-रात्री
सपनों के सुमधुर गीत… पागल शमा…
घायल कामना का अंतरंग प्रीत...
आशाओं के चादर में लिपटा वह सिकुड़ा मेरा प्रेम।
सात्विक कर्म मुझसे अलग होने की, आज आज्ञा मांगता है
फिर से नये मदिरालय को नया दास दे जाता है…
खुद से अलग होकर उसमें…खुद को ही ओझल कर दूं
सौ बार डूबना हो फिर तो क्या, संग्राम सार्थक कर दूं
आनंद ढूँढने निकला था कोसो दूर गगन में
आज मगन हूँ अपने ही इस नीले शांत मन में…।
Sunday, 23 December, 2007
Nalanda -- हमारी धरोहर है।

"नालंदा" जिसका अर्थ है ज्ञान बाँटने वाला, जहाँ से भारत में सांस्कृतिक व
दार्शनिक विचारधारा का सूत्रपात हुआ। जिस समय विश्व अपने अस्तित्व को
अंधकार में तलाश रहा था, हमारी नालंदा अपनी ज्ञान गंगा से जगत के
पाप-पंकिल-शरीरी को पवित्र करने में जुटा था। उस जमाने में विश्व ध्यान-योग
की शिक्षा इसकी गोद में बैठकर पूरा कर रहा था। पटना (बिहार) से लगभग
90 km की दूरी पर स्थित यह महान धरोहर अपने कर्णधारों की राह तक
रहा है, जो कभी हमारे ज्ञान-गौरव का साधन हुआ करता था आज स्वयं की
विगति से त्राण कर रहा है…।
भारत का गौरवशाली इतिहास शक्तिशाली मगध शासन के नेतृत्व में शुरु हुआ,
जिसकी राजधानी राजगृह थी; यहीं से विश्व के दो महान धर्मों का
जन्म हुआ, जहाँ से एक राष्ट्र की भावना, समन्वय सौहार्द व आध्यात्मिक
जीवन का प्रचार-प्रसार आरंभ हुआ आज अपने अस्तित्व की तलाश कर
रहा है जो निश्चित ही एक बड़ा आश्चर्य है। और यही क्रिया विश्व के प्रथम
आवासीय विश्वविद्यालय नालंदा के साथ भी घटा। हम मात्र हाथ पर हाथ
रखे एक दूसरे की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहे हैं…।
सामान्यत: ऐसा माना जाता है की नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना पाँचवीं
शताब्दी के आसपास कुमार गुप्त के द्वारा हुई पर इतिहास के पन्नों को
और खंगाला जाए तो पता चलता है कि इसका अस्तित्व द्वितीय शताब्दी से
ही बना हुआ था क्योंकि नागार्जुन जो यहाँ के विद्यार्थी व बाद में शिक्षक भी रहे
उनका काल यही माना जाता है…। हर्षवर्धन व पाल शासन काल में यह अपनी
प्रज्ञा से फलता-फूलता रहा किंतु इसके उपरांत धीरे-धीरे यह गहरे अंधकार में
समाता चला गया जहाँ से पुन: बाहर नहीं निकल पाया।
महान चीनी यात्री हुयेनसांग और इत्सिंग ने कई वर्षों तक यहाँ सांस्कृतिक व
दर्शन की शिक्षा ग्रहण की, नालंदा के विषय में काफी कुछ कहा है--- "उस
जमाने में विश्व के कई जगहों, सुमात्रा, चीन, थाइलैंड कोरिया, श्रीलंका आदि
जगहों से विद्यार्थी ज्ञानार्जन करने आते थे पर इस विश्वविद्यालय की नामांकन
प्रक्रिया बहुत मुश्किल थी… विद्यार्थियों को तीन कठीन परीक्षा स्तरों से
होकर गुजरना पड़ता था जो शायद विश्व की पहली ऐसी प्रणाली थी। यहाँ
10000 विद्यार्थियों एवं 2000 शिक्षक के रहने की व्यापक व्यवस्था थी
जिसके लिए 300 कमरे बने थे तथा साथ और अकेले रहने की भी
अलग से व्यवस्था की गई थी। यहाँ की नौ तलीय पुस्तकालय में 3
लाख से ज्यादा जनरल व पुस्तकें मौजूद थी जो अपने विनाश के समय
लगभग 6 महिनों तक जलती रही। इसके गौरव पर पहला आघात
हूण शासक मिहिरकुल के द्वारा किया गया बाद में बंगाल का तुर्क शासक
बख्तियार खिलजी ने 1199 के आसपास इसे पूरी तरह से समाप्त कर
दिया…। जिसकी बेड़ियों में वह आज भी बंधी हुई अपनी मुक्ति के उस
उज्जवल दिव्य प्रकाश की आस में आँख फाड़े बैठी है। यह हमारे देश
का दुर्भाग्य है कि हम अपने इतिहास की भूलों को सुधारने के बजाये
लगातार दोहराते जा रहे हैं।
मैं इसकी पुनर्स्थापना के लिए किए जा रहे प्रयास में ज्यादा विस्तार में
नहीं जाऊँगा पर हमारे पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब ने जरुर इसे रास्ता दिया
आगे आने का। सिंगापुर, चीन, जापान व दक्षिण-कोरिया ने भी सहयोग
देने का वादा किया है और 2009 तक इसके पुनर्जीवन को अमल में लाने
का प्रयास किया जाएगा…। पर अगर ध्यान से देखा जाए तो नालंदा आज
भी धूल में पड़ा अपनी मलिनता पर अश्रु बहा रहा है। कोई छोटा प्रयास भी
विकास का अभी तक सरकार के द्वारा नहीं देखने को मिला है… आज
मैं जब कभी टेलिविज़न देखता हूँ तो "अतुल्य भारत" के विज्ञापन
पर मेरी दृष्टि पड़ती है तो थोड़ी खुशी भी होती है पर अफसोस इसबात
का है कि आजतक नालंदा के विषय को न तो लोगों तक पहुंचाया
गया न कभी दिखलाया गया और आज सरकार इसके विकास पर
बड़ी-2 बातें करती नजर आती है… वहाँ न तो बाहर से आये लोगों
के लिए रहने की व्यवस्था है ना ही कोई पुस्तकालय है जहाँ
बैठकर नालंदा के इतिहास पर दृष्टिपात कर सकें।
आज कुछ मित्रों की सहायता से इस महान संपदा की रक्षा के लिए
थोड़े कदम बढ़ाये गये हैं, जिसमें पहला प्रयास इसके उपर चलचित्र
बना कर किया जा रहा है और इसका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है
जिसका उद्देश्य है जन-जन तक इसके गौरव तत्वों को पहुंचाना
जिससे इसपर कुछ काम किया जा सके… और भी कई सारे ऐसे
काम हैं जो हमारे मित्रगण रात-दिन एक कर उसे क्रियान्वित करने
में जुटे हैं… सरकार का प्रयास आजतलक तो नकारात्मक ही रहा है
पर हम अपने सामर्थ के अनुसार क्या ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते
जिससे इसके विकास में एक ईंट जुड़ जाए चाहे वो वैचारिक सहायता
ही क्यों न हो…।सबसे बड़ा आश्चर्य तो आप सभी को यह जानकर
होगा की मुझे अपनी फिल्म बनाने में कितनी परेशानी हो रही है
क्योंकि नालंदा के उपर इंटरनेट पर कुछ एक पेज के सिवा कोई
सामग्री ही उपलब्ध नहीं है…। ये है असल दुर्भाग्य हमारे वर्तमान
का जो हम इतिहास को सहेज ही नहीं पा रहे हैं… कहा जाता है
की इतिहास की महत्ता ही ये होती है कि भविष्य में दोबारा वो
गलतियॉ न की दोहराई जाए जो हमने की हैं।
"कब तक घुटेगी तू इन संस्कारों में,
कब तक बहेगी इन उपेक्षाओं में
सालों से खड़ी है तू यहीं अवशेषों पर
जो प्रकट है क्षण-क्षण वर्तमान पर
मुरझा गई है तू एक याचक बनकर,
ज्ञान-देवी तू साधना सागर
चिंतन का तू अंकुरण है,
सत्य सजाया हृदय महल में
विश्व जागरण का तू प्रस्रवण है
एक तू ही तो सुंदरा है वन में
मेरे राज्य की गहरी धुंध में
गिर जाने दे अपने सजल अश्रु
इन विखंडित शिलाओं पर,
त्याग निस्तब्धता सांझ की
आध्यात्म-वाणी का आह्वान कर,
उठ जाग अभी महानिद्रा से,
बढ़ा दो कदम बोधि-वृक्ष की तरफ
स्वयं की अलौकिक वसुंधरा पथ पर
जीवांत सुरभि… शांत लहर में,
गीत रच ले अनंत स्पर्श मधुर ध्वनियों की
सत्य यही है दिव्य देवी…
तेरा आदिकाल ही तेरा, वास्तविक उषाकाल है।"
"मेरा आज आपसे इस लेख के लिए टिप्पणियों की प्रतीक्षा
नहीं है वरन यह की आप अपने वैचारिक तत्वों को मुझसे
बांटें कि वहाँ पर और क्या किया जा सकता है विकास
के संदर्भ में। मुझे जरुर अपनी योजना से अवगत कराएँ
शायद कुछ एक तत्वों को मैं अपनी फिल्म में भी शामिल
कर पाऊँ।"
धन्यवाद।
Monday, 26 November, 2007
आगाज़ सजग; वास्तविकता मौन…।

कतरा-कतरा जीवन की डोर सिमटती
जाती है संध्या के लाल गर्भ में…
बेख़ौफ नाचती आहिस्ते से
घटती जाती है सांसों में…
दौड़ अंधी, भाग दुनियाँ की
बैचैन चेहरों में उगती है
मायूस पल तृष्णा की कैद
आजाद मन पर चढ़ती जाती है…।
सभी भाग रहे बस औरों से आगे-आगे,
किस ओर कहाँ किसलिए?? है यह बस प्रारब्ध!!!
खुद से या वक्त को छोड़
बोझिल झुके कंधे अपने अस्त की
राह तकते हैं…
नहीं छूटती गति चक्र की खाली वृत
आगे वक्त से जाकर जीने में
वर्तमान रुद्ध हो जाते हैं…
तत्पर है जो, साथ वक्त के चलने को
पागल विक्षिप्त कहे जाते हैं…।
भाग ओ दुनियाँ!!! भाग किधर भी…
भागेगा कितना तू उसी चक्र में
घूमता-घूमता कई बार वहीं…फिर और वहीं
संताप, अविद्या में घुटता ही जाएगा…।
विमुख पतित आवरण, संस्कार घसीटता
सभ्यता की चौखट पर अपना त्राण मांग रहा…
दोष है किसका? नहीं जानते हम,
दोषों के पिछे भागते हम, मूल स्वरुप
स्वच्छंद वयस को रौंदते जाते हैं…
होती है अज्ञान की अज्ञानता से भिड़ंत
लहूलुहान निस्तेज होकर लथपथ
विशाल नीले चादर में रेंगना जानते हैं…।
भरता नहीं ये जख्म कभी…अपनी सलाख़ों
से ही गोद-गोद कर जो बनाएं हैं…
भाव-प्रेम-स्नेह-करुणा डूबती है इस लहू-आंगन में
शोर तड़पते रुह की…
तिमिर-गहराई में लुप्त हो जाती है,
बढ़ती तपीस… धधकती ज्वाला में
प्रतिबद्धता अकुलाई है… बढ़ते हुए इस
अनजाते दर्द से मानवता भरमाई है…
कोई जागे…जाग से आगे, लाकर दे
आनंद-पुष्प के पुलकित हार…
सशंकित हतप्रभ नयनों में भर दे
आशा-गंगा की धार…
रोपे वह ऐसा अंकुरण जो करे सार्थक
यह नव-निर्माण… ।
Wednesday, 7 November, 2007
सभी को दीपावली की बहुत सारी शुभकामनाएँ।

एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में अचानक मुझे मुंबई से बाहर जाना
पड़ रहा है… कुछ दिन तो लग ही जाएँगे आने में, तबतक
आप सभी को मेरी ओर से----
"सभ्यता-संस्कृति-संस्कारों का है यह प्रज्ज्वलन
या भूत से वर्तमान का है यह संवरण
मेरे लिए तो यह दीपक भविष्य का है परावर्तन॥"
"दीपावली" की बहुत-2 शुभकामनाएँ।
Wednesday, 24 October, 2007
"दिनकर"… एक बलंद आवाज ।

"बढ़कर विपत्तियों पर छा जा, मेरे किशोर! मेरे ताजा!
जीवन का रस छन जाने दे,तन को पत्थर बन जाने दे।
तू स्वयं तेज भयकारी है,
क्या कर सकती चिनगारी है?"
राष्ट्रकवि 'दिनकर' विरचित ये पंक्तियाँ आम मानव में
भी विशिष्टता का बोध कराने सकने में सक्षम है… विगत
कुछ दिनों पहले ही राष्ट्रकवि 'दिनकर' जन्मशताब्दी
समारोह में विमोचित पुस्तक "समर शेष है" में मेरी जिस कविता को स्थान
मिला वही यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ… मेरी इस कविता के संदर्भ में
"मुरली मनोहर जोशी" ने भी आयोजकों से पूछा कि यह कविता किसकी लिखी
हुई है… जिससे निश्चय ही, आत्म-गौरव सा प्रतीत हुआ…।
"कहीं दूर नक्षत्रों से वह चेहरा
संकेत अनेकों प्रेषित करता है
अपने देदीप्यमान संस्कारों के
करवटे बदला करता है…
समझें जो अभिव्यक्ति उसकी
आधार विनय का वह देता है…
व्यक्तित्व था वह क्षितिज सकल
अप्रतिम ज्ञान की दीर्घ लकीर
वैशिष्ट्य ओजमय काव्य दृष्टि से
भारत का जिसने सुप्रभात देखा
सिमरिया गाँव से टाँग वह झोला
पन्नों में कुछ सांसें छोड़ा…
बीज क्रांति का लिए हृदय में
दिनकर बन वीरों का आह्वान किया
हिंदी का गौरव मसाल जला
भावी जगत का उद्घोष किया
उत्साह विद्यार्थियों का कलमबद्ध कर
राष्ट्राभिमान भवितव्य की ओर मुखरीत किया…
उर्वशी की आत्म-सौंदर्य से संस्कृति
के कई गंभीर अध्याय लिखे…
कुरुक्षेत्र में बिखरे ज्ञान महिमा को
चुनकर बनाया आध्यात्म महल
चिंतन जो बन गये अक्षर…शोध
संस्कृति में व्याप्त होकर उद्देश्य
लिए राष्ट्र पीढ़ी का उत्थान…
गुंज रही आज-भी काव्य शैली उनकी
चंचल किशोरों के तन-मन में
हुंकार करता हुआ नवयुवक अग्रसर है
अपने दिव्य क्रांति के पथ पर
जीवन लक्ष्य साध्य हुआ था
शब्द खिला जब पंखुड़ियाँ बनकर
गहन आदर्श शांत ज्वाला का
संधान किया कर्ण बनकर...
रश्मिरथी है वह मनोविज्ञान
कविवर का अंतर्दृष्टिविस्तार
युवकों के भीतर नित्य होते महाभारत
कुंठीत उमंग अज्ञान भूमि में
चैतन्य का वह महा-अवसान
रुंधा हुआ कल आच्छादित भविष्य
रोज ही करते एक विषपान…
खोला द्वार कर्ण के द्वारा
विचलित मन को शांत किया
जख्मों से फूटते फव्वारे…लेप स्नेह का
लगाकर उपासना से मानवता में मुस्कान दिया…
पीढ़ी-दर-पीढ़ी जब कभी सुनेगी उनकी
रचनाओं के हर्ष गीत
प्रेरणा पंकिल शब्दों में ऊर्जा की
अभिव्यक्ति उधेल उदासी शिखर पर
कर्मठ स्वरुप निहित वीरता का सूत्रधार करेगी…
राष्ट्रकवि वह नूतन दीपक
भारत का सच्चा महानायक
सागर जैसी गर्जना थी उनमें
विद्यार्थियों के लिए नया जागरण
सत्य… कोलाहल बनकर उफनता था
साहस का समर बांधे हुए…
आवाज भविष्य की मौन प्रेम का
गौरव और प्रतीक शांति का
अवर्णनीय सक्षम उद्यमी कदम बढ़ाया
तीसरे विश्व… नई राह की ओर...
उद्घोषक थे क्रांति के वह शाश्वत ज्ञान की पराकाष्ठा भी
समग्रता के प्रतिबिंब थे वह आत्म-सिक्त आगाज भी
याद करें उनकी कार्यशैली और गहराई टटोलें आत्मन की
लेकर चले कलम उनकी ही जोड़े कड़ी अभिनव जीवन की।"
Tuesday, 2 October, 2007
महात्मा…Gandhi...।

हमारे परम पिता, गुरु एवं कर्णधार
कई मायनों में हमसे बिल्कुल समान
और थोड़े जुदा-जुदा भी। आज विश्व
अहिंसा दिन भी घोषित किया गया जो
इस महान पुरुष के लिए विश्व श्रद्धांजलि
है। भारत ही ऐसा देश है जहाँ इस महा-
पुरुष की सबसे ज्यादा आलोचना की गई
मगर वह आज भी अपनी प्रज्ञा से शोभित
है… आज जो कविता मैं प्रस्तुत करने जा
रहा हूँ, वह मेरे पूर्व लेख "महात्मा और सत्याग्रह" का ही विस्तृत
रुप है…चूंकि यह कविता "महात्मा" पर लिखी मेरी प्रिय कविता है, जो उस लेख में
छिप-सी गई थी…।
“जन्मा था हमारा भविष्य आज ही साधारण शरीरी ले
विश्वास समेटे नेत्रों में देखा दासत्व, युग का रे…
दर्शन जिनका काल से आगे…सत्य था पीछे उनके
टेक चला था राम रे…
नि:संग अहिंसा की कर्मठता का पाठ पढ़ाते अपने
उषा काल में…
जिसके निर्भीक पांव से पड़ा मलीन था छत्र ब्रिटिश
का राज रे…
भारत के क्षितिज पर बनकर पिता चंदा के जैसे चमकते
हैं बापू बनकर राम रे…
अनुनय-पूर्वक लड़ा संग्राम, उतार फेंका अपने चीवर को
मानवता के आदर्श में…
कई चेहरों में अद्भुत वह चेहरा बनकर उतरे थे
प्राणों में स्वाभिमान रे…
तस्वीर बनाई नये भारत की जीवंत किया उसे
विश्व-इतिहास में…
दिया अनूठा ज्ञान सत्याग्रह का विश्व को, ऐसे थे वह महात्मा.…
जिनकी दुनियाँ करती गान रे…
सभी आधारों का समन्वय कर दे दिया वतन आजाद
हमारे हाथ रे…
वे महान नहीं आदर्श ,गर्व- स्वाभिमान यही थी उनकी
पहचान रे…
वह मानव थे या महा-मानव, पर थे
भारत के लाल रे…
पारितोषिक है यह स्वतंत्रता… जीते जा रहे… उल्लास इसकी
सुगंध दिशाओं में फैला है, ऐसा आश रे…
आओ याद करें उस पुण्य आत्मन को
शत-शत नमन आदर-प्रणाम के साथ रे…
कि विश्वास हो पर्वत के जैसा
जो ढकेले चक्रवात रे…
पूरा हो लक्ष्य हमारा बढ़े देशाभिमान रे…"
हे राम, हे राम, हे राम
Friday, 28 September, 2007
राष्ट्रकवि "दिनकर" जन्मशताब्दी समारोह- एक झलक
न देखे विश्व पर मुझको घृणा से, मनुज हूँ सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं।
सुनूँ क्या सिंधु!! मैं गर्जन तुम्हारा स्वयं युग-धर्म का हुंकार हूँ मैं।
इन पंक्तियों की प्रखरता को देखकर सहज ही अनुमान लगाया
जा सकता है कि मैं बात किसकी करने वाला हूँ… इसकारण
बताना भी उचित नहीं समझता… आप स्वयं विद्वान हैं।
बड़े दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि इतना बड़ा आयोजन
दिल्ली शहर में ही हुआ और सभी ब्लागर मित्र इससे वंचित
रह गये… मैंने काफी प्रयास किया कि आप सभी को
अवगत कराया जा सके पर सभी व्यर्थ। मैंने चिठ्ठाकार
को कम से कम 5-6 पत्र लिखे होंगे पर वह क्यों नहीं पहुंच पाया,
एक हास्यास्पद स्थिती उत्पन्न करता है… नित्य दिन
एक हल्की सूचना देता पत्र भी मेल बाक्स में आ जाता
है मगर जब इस आयोजन की सूचना मैं………???
कुछ लोगों के Email मिल जाने के कारण मैं व्यक्तिगत
रुप से संपर्क साध पाया…कुछ आये भी…।
मेरा उद्देश्य मात्र यह था कि राष्ट्रकवि दिनकर पर,
जिनके भी अच्छे काम हों वह अपनी लेखनी भेज सकें…
स्मारिका "समर शेष है" के लिए जिसमें स्वयं प्रधानमंत्री और
कई सारे मंत्रीगण ने अपना बौद्धिक सहयोग दिया है…
इस विचित्र स्थिती पर एक ही पंक्ति याद आती है---
"सच है, सत्ता सिमट-2 जिनके हाथों में आयी
शान्तिभक्त वे साधु-पुरुष क्यों चाहें कभी लड़ाई???"
इस समारोह का उद्घाटन स्वयं माननीय गृहमंत्री जी
ने किया…।
मुरली मनोहरजोशी, शिंदे जी, वशिष्ठ नारायण सिंह,
पूर्व सांसद डा0 रत्नाकर पांडे व श्री अरुण कुमार आदि कई
महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने भाग लिया…।
ज्योति प्रज्वलन कार्यक्रम माननीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल
के कर-कमलों द्वारा…।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मारिका " समर शेष है…"
का विमोचन।
इस स्मारिका में मेरी भी कविता "दिनकर-एक बलंद आवाज"
को जगह मिली साथ ही हमारी प्रिय ब्लागर एवं प्रेम शिक्षिका
रंजना भाटिया जी ( रंजू) की भी रचना प्रकाशित हुई है…।
"मानव जब जोर लगता है,
पत्थर पानी बन जाता है।"
काफी बड़ी संख्या में सरल और विद्वत-जनों ने भाग लिया…।
"शान्ति खोलकर खड्ग क्रांति का जब वर्जन करती है,
तभी जान-लो, किसी समर का वह सर्जन करती है…।"
जैसी महान गीत रचना का आनंद उठाते जन…।
"मैं विभा-पुत्र जागरण गान है मेरा
जग को अक्षय आलोक, दान है मेरा।"
समारोह का अंत भी होना ही था… जब गीता का
अंत आ गया तो यह तो आम सभा ही थी…
पापी कौन? मनुज से उसका न्याय चुरानेवाला?
या कि न्याय खोजते विघ्न का शीश उड़ानेवाला?
इस चित्र में मेरा अपना परम प्रिय अनुज अदिति नंदन जी
( दाहिने से चौथे मुंड चश्मा लगाए), तथा इस समारोह के
प्रमुख आयोजक श्री नीरज जी (अध्यक्ष, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह
दिनकर स्मृति न्यास)…तस्वीर में बांयें से दूसरे व्यक्ति।
इसप्रकार से समारोह का अंत हुआ तथा मिडिया वालों
ने भी काफी सहयोग दिया सहारा समय, दूरदर्शन, जी न्यूज
E tv से इसका सीधा प्रसारण किया जा रहा था तथा आज तक
और स्टार न्यूज से खबरें दिखाई गईं। जिसप्रकार राष्ट्रकवि
"दिनकर" को लोगों ने याद किया वह अद्भुत था…।
मैं तो हमेशा ही यही कहता आया हूँ कि---
"वह कवि नहीं उन जैसे जो नारी में एक नई नारी
प्रकृति में भी सुंदरा नारी ही देखा करते थे…
वह कवि नहीं महाकवि थे जो जन-जन में
हुंकार देखा करते थे… भारत का नव -भविष्य
कंप- कपाते लबों पर ओज घोला करते थे…।"
दिनकर जी की एक सुंदर पंक्ति से इसका अंत करना
चाहूंगा…
"फूलों की क्या बात? बाँस की हरियाली पर मरता हूँ।
अरी दूब, तेरे चलते, जगती का आदर करता हूँ।
इच्छा है, मैं बार-बार कवि का जीवन लेकर आऊँ,
अपनी प्रतिभा के प्रदीप से जग की अमा मिटा जाऊँ॥"
वैसे दिसम्बर माह में नीरज जी ने लाल किला
में पुन: इसका अयोजन करने का निर्णय लिया है
जिसका शुभारंभ प्रधानमंत्री जी के हाथों द्वारा किया जाएगा…
इसके लिए अभी से तैयारी
शुरू कर दी गई है…।
पता नहीं कुछ तकनीकी कारणों से मेरी पहले की रचना मिट गई…
चूंकि मैं अभी अपनी पहली Short Film ---
"The Man In The Mirror" की वजह से काफी
व्यस्त चल रहा हूँ… ब्लाग पर भी आने का मौका
कम ही मिल पाता है… उपर से पुरानी रचना मिट गई
खैर कुछ-2 तो लिखता ही रहेगा मन।



