Friday, 29 May, 2009

मेरा गीत, मेरी मधुशाला…!!!



"काफी समय बीत गया रुह चुराने में…
शायद जीवन और लगे उसे पास लाने में"।


इस दौरान मेरे एक मित्र मधुमये जी जो संगीतकार हैं,
उन्होंने मुझे प्रेरित किया गीत लिखने के लिए और बस
कलमबद्ध गीत की संगीतमय रुपरेखा तैयार हो गई…
वैसे तो ये बहुत पहले ही संगीतबद्ध हो चुका था किंतु
समयाभाव के कारण पोस्ट नहीं कर पा रहा था…
लीजिए प्रस्तुत है मेरा लिखा और मधुमये जी का संगीत
आप सबके सामने…
कैसा लगा ये जरुर बताएँ… वैसे भी पहला प्रयास था मेरा गीत
लिखने का…।

धन्यवाद!!

Friday, 14 November, 2008

प्रीत की लगन या मुक्ति मार्ग


आगोश में निशा के करवटें बदलता रहता है सवेरा
लिपटकर उसकी संचेतना में बिखेरता है वह प्रांजल प्रभा…
संभोग समाधि का है यह या अवसर गहण घृणा का
फिर-भी तरल रुप व्यक्त श्रृंगार, उद्भव है यह अमृत का…

उत्साह मदिले प्रेम का…
जागते सवेरे में समाधि…
अवशेष मुखरित व्यंग…
या व्यंग इस रचना का…

शायद मेरे अंतर्तम चेतना का गहरा अंधकार
जो अव्यक्त सागर की गर्जना का उत्थान है…
सालों से इतिहास बना वो कटा-फटा चेहरा
कहना चाहता है कुछ मन की बात…

दिवालों की पोरों में थी उसके सुगंधी की तलाश
प्रकृति के संयोग में आप ही योग बन जाने की पुकार…
विस्तृत संभव यथा में लगातार संघर्ष कर पाने का यत्न
किसके लिए… उस एक संभव रुप लावण्य की प्रतीक्षा…

सारा दिवस बस भावनाओं की सिलवटों में बदल ले गई
आराम की एक शांत संभावना…
शायद इस कायनात में रंजित नगमों की वर्षा में सिसकियों
की अभिलाषा ही टिक सकी हैं…

आज इस निष्कर्ष पर जाकर ठहर गया है मन
ना अब किसी की प्रतीक्षा ना किसी की अराधना
खोल दृष्टि पार देख गगन के वहाँ कोई नहीं है
किसी के पीछे…
वहाँ उन्मुक्त सिर्फ मैं हूँ…"मैं"

खोकर एक संभावना आगई देखो कितनी संभावना…
मधुर प्रीत का सत्य संकरे मार्ग से होकर मुक्ति में समा गया…
नजरे उठकर जाते देख तो रही हैं उस उर्जा को पर
अब चाहता नहीं की वो वापस उतर आये मेरे अंतर्तम में…।

=> आप सभी को मेरी ओर से बीते दिपावली की ढेरों बधाइयॉ

क्या करूँ अपनी फिल्म को लेकर बहुत व्यस्त था… बस खुशी इस बात की

है कि मुझे दो फिल्में और मिल गई हैं, जिसका निर्देशन और लेखन मैं ही

कर रहा हूँ…। मेरी पहली Commercial Film, "AUR- Life Is A Story"

है जिसमें संभवत: Kon-Kona-Sen Sharma को लिया जाए… अभी बात

चल रही है… इसकी Shooting लंदन में मार्च में शुरु होगी जिसकी बजह से

व्यस्तता बढ़ गई है … बस आप सब दुआ करें की मैं अपने लक्ष्य को पूरा कर

लूँ… चूंकि इसका निर्देशन मेरा है तो मुझपर काफी बोझ भी है…।कुछ मन में

भावनाएँ उठी सो पता नहीं क्या लिख दिया है…।


Thursday, 17 July, 2008

आशा का नभ है विशाल…।

जाने कितनी ही सुबह बीत गई रात
को तकने के बहाने पर याद रहा
मेरा यही साथी जो साथ चला था
तन्हाइयों में उस वक्त…
अपने फिल्म को लेकर इतना व्यस्त
हो गया हूँ कि कब रात आती है
और चली जाती है पता ही नहीं चलता।
वैसे मेरी फिल्म का Promo
सीरिफोर्ट ऑडिटोरियम में 20 मई को
दिखलाया गया था जिसमें दिल्ली की
मुख्यमंत्री ने भी शिरकत ली थी…
कुछ तकनीकी पक्ष का काम बचा है
सो उसी को पूरा करने में लगा हूँ।
आज बहुत दिनों बाद आप सब से
कुछ कहने का दिल हुआ तो आशा
(Hope) को साथ ले आया…।



स्वयं के अंतस में अपने को गहरे उतार कर देखो,
वहाँ अंजन की काली रेखा में भी आंनद घटित होता
ही होगा…

जाग हो जाये अगर जाग से ज्यादा,
वहाँ स्वप्नों के आंगन में भविष्य सार्थक होता
ही होगा…

स्वतंत्र हो कर निर्भीक नये आवरण में झांक कर देखो
वहाँ पार सीमाओं के परम विराट जागरित होता
ही होगा…

बाहर निकल कर सघन अंधकार से आसमान में देखो,
वहाँ आशा के नभ-मंडल में उल्लास योग का संगम होता
ही होगा…

"मात्र सुख की आशा में कहाँ जीवन का हर्ष बहता है,
वह तो सत्य प्रवाह है… जो अनंत गहरे में भीतर ही भीतर
इठलाता है…।"

Thursday, 10 April, 2008

मैं हूँ यही मेरा है नव-निर्माण…



नियती नहीं मेरा किसी सोये हुए इतिहास का
उद्घोषणा प्रकृति का नवीन वर्तमान हूँ…

मन की उदास वृत्ति बेचैन शोक का नाद नहीं
राह दृष्टांत धवल ज्योति का पूँज हूँ

गहन अंधकार निस्तेज आवरण अविद्या शरणार्थी नहीं
प्रस्फुटित काया प्रज्ञा भूषित क्रांति का पुत्र हूँ

हारा हुआ संग्राम कोई मृतकों की परिपाटी नहीं
शिखर मुकुट उद्देश्य जीत का जागा हुआ कटाक्ष हूँ…

पंचरत्नों की माया मात्र जीव सकल निर्माण नहीं
निर्गुण शांत प्रार्थना का परम आनंद हूँ…

मात्र मृदा की संतान उसकी तामसी चेतना नहीं
थोड़ा उपर बहुत उपर अनंत का विस्तार हूँ…

क्रंदन कोलाहल सृष्टि का केवल पंख नहीं
सात्विक प्रेम परमात्मा का अद्भुत श्रृंगार हूँ

विपद तपस्चर्या शून्य योग खंडित जिज्ञासा स्वयं नहीं
जीवन में बहता राग-उल्लास…महान संन्यासी हूँ मैं…।

Wednesday, 26 March, 2008

प्रेम पंथ है…आत्म प्रतीति।



पता नहीं मुझे इस जिंदगी के और कितने मायने हैं…
समझ नहीं आता कौन दु:ख के, कौन सुख के हैं…
सभी को साथ लेकर परखना……? संभव नहीं,
वक्त निकलता जाता है, कई उलझे मोड़ छोड़ देता है
मदिले संरचना में इसके फिर देवदास चला आता है
अपने को भींगाकर रस में पतला सा दर्द फैला जाता है
तन्हाई है…इंतजार भी…प्रतीक्षा है अपने-आप की
तलाश लेकिन करता है मन… दूर रह रहे साथी की
एकांत मन जो मानता ही…नहीं!!!
जाकर ले आ उसे… अब छोड़ भी यह मायूस बिस्तर
भाग उधर…चल दौड़ भी जा… खो न जाये यह सुहाना मंजर
साथ है जबतक साथी का अम्बर सौरभ बरसाता है
मूल रुप में प्रकृति विकास क्रीड़ा में रम जाती है…
सभ्यता का पथ रुककर थोड़ी देर…
संस्कार देवी से पूछेगा…वो कौन दिव्य संगत में है
किसकी यह रचना होगी…
विस्तार सत्य का मनन हृदय में… कोलाहल संयत वातावरण होगा
जटिल भावना… लम्बी उदासीनता में भी
चाँद नयनों में खिला होगा…
आगोश में लिपट कर दिवा-रात्री
सपनों के सुमधुर गीत… पागल शमा…
घायल कामना का अंतरंग प्रीत...
आशाओं के चादर में लिपटा वह सिकुड़ा मेरा प्रेम।
सात्विक कर्म मुझसे अलग होने की, आज आज्ञा मांगता है
फिर से नये मदिरालय को नया दास दे जाता है…
खुद से अलग होकर उसमें…खुद को ही ओझल कर दूं
सौ बार डूबना हो फिर तो क्या, संग्राम सार्थक कर दूं
आनंद ढूँढने निकला था कोसो दूर गगन में
आज मगन हूँ अपने ही इस नीले शांत मन में…।

Sunday, 23 December, 2007

Nalanda -- हमारी धरोहर है।



"नालंदा" जिसका अर्थ है ज्ञान बाँटने वाला, जहाँ से भारत में सांस्कृतिक व
दार्शनिक विचारधारा का सूत्रपात हुआ। जिस समय विश्व अपने अस्तित्व को
अंधकार में तलाश रहा था, हमारी नालंदा अपनी ज्ञान गंगा से जगत के
पाप-पंकिल-शरीरी को पवित्र करने में जुटा था। उस जमाने में विश्व ध्यान-योग
की शिक्षा इसकी गोद में बैठकर पूरा कर रहा था। पटना (बिहार) से लगभग
90 km की दूरी पर स्थित यह महान धरोहर अपने कर्णधारों की राह तक
रहा है, जो कभी हमारे ज्ञान-गौरव का साधन हुआ करता था आज स्वयं की
विगति से त्राण कर रहा है…।

भारत का गौरवशाली इतिहास शक्तिशाली मगध शासन के नेतृत्व में शुरु हुआ,
जिसकी राजधानी राजगृह थी; यहीं से विश्व के दो महान धर्मों का
जन्म हुआ, जहाँ से एक राष्ट्र की भावना, समन्वय सौहार्द व आध्यात्मिक
जीवन का प्रचार-प्रसार आरंभ हुआ आज अपने अस्तित्व की तलाश कर
रहा है जो निश्चित ही एक बड़ा आश्चर्य है। और यही क्रिया विश्व के प्रथम
आवासीय विश्वविद्यालय नालंदा के साथ भी घटा। हम मात्र हाथ पर हाथ
रखे एक दूसरे की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहे हैं…।



सामान्यत: ऐसा माना जाता है की नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना पाँचवीं
शताब्दी के आसपास कुमार गुप्त के द्वारा हुई पर इतिहास के पन्नों को
और खंगाला जाए तो पता चलता है कि इसका अस्तित्व द्वितीय शताब्दी से
ही बना हुआ था क्योंकि नागार्जुन जो यहाँ के विद्यार्थी व बाद में शिक्षक भी रहे
उनका काल यही माना जाता है…। हर्षवर्धन व पाल शासन काल में यह अपनी
प्रज्ञा से फलता-फूलता रहा किंतु इसके उपरांत धीरे-धीरे यह गहरे अंधकार में
समाता चला गया जहाँ से पुन: बाहर नहीं निकल पाया।

महान चीनी यात्री हुयेनसांग और इत्सिंग ने कई वर्षों तक यहाँ सांस्कृतिक व
दर्शन की शिक्षा ग्रहण की, नालंदा के विषय में काफी कुछ कहा है--- "उस
जमाने में विश्व के कई जगहों, सुमात्रा, चीन, थाइलैंड कोरिया, श्रीलंका आदि
जगहों से विद्यार्थी ज्ञानार्जन करने आते थे पर इस विश्वविद्यालय की नामांकन
प्रक्रिया बहुत मुश्किल थी… विद्यार्थियों को तीन कठीन परीक्षा स्तरों से
होकर गुजरना पड़ता था जो शायद विश्व की पहली ऐसी प्रणाली थी। यहाँ
10000 विद्यार्थियों एवं 2000 शिक्षक के रहने की व्यापक व्यवस्था थी
जिसके लिए 300 कमरे बने थे तथा साथ और अकेले रहने की भी
अलग से व्यवस्था की गई थी। यहाँ की नौ तलीय पुस्तकालय में 3
लाख से ज्यादा जनरल व पुस्तकें मौजूद थी जो अपने विनाश के समय
लगभग 6 महिनों तक जलती रही। इसके गौरव पर पहला आघात
हूण शासक मिहिरकुल के द्वारा किया गया बाद में बंगाल का तुर्क शासक
बख्तियार खिलजी ने 1199 के आसपास इसे पूरी तरह से समाप्त कर
दिया…। जिसकी बेड़ियों में वह आज भी बंधी हुई अपनी मुक्ति के उस
उज्जवल दिव्य प्रकाश की आस में आँख फाड़े बैठी है। यह हमारे देश
का दुर्भाग्य है कि हम अपने इतिहास की भूलों को सुधारने के बजाये
लगातार दोहराते जा रहे हैं।




मैं इसकी पुनर्स्थापना के लिए किए जा रहे प्रयास में ज्यादा विस्तार में
नहीं जाऊँगा पर हमारे पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब ने जरुर इसे रास्ता दिया
आगे आने का। सिंगापुर, चीन, जापान व दक्षिण-कोरिया ने भी सहयोग
देने का वादा किया है और 2009 तक इसके पुनर्जीवन को अमल में लाने
का प्रयास किया जाएगा…। पर अगर ध्यान से देखा जाए तो नालंदा आज
भी धूल में पड़ा अपनी मलिनता पर अश्रु बहा रहा है। कोई छोटा प्रयास भी
विकास का अभी तक सरकार के द्वारा नहीं देखने को मिला है… आज
मैं जब कभी टेलिविज़न देखता हूँ तो "अतुल्य भारत" के विज्ञापन
पर मेरी दृष्टि पड़ती है तो थोड़ी खुशी भी होती है पर अफसोस इसबात
का है कि आजतक नालंदा के विषय को न तो लोगों तक पहुंचाया
गया न कभी दिखलाया गया और आज सरकार इसके विकास पर
बड़ी-2 बातें करती नजर आती है… वहाँ न तो बाहर से आये लोगों
के लिए रहने की व्यवस्था है ना ही कोई पुस्तकालय है जहाँ
बैठकर नालंदा के इतिहास पर दृष्टिपात कर सकें।

आज कुछ मित्रों की सहायता से इस महान संपदा की रक्षा के लिए
थोड़े कदम बढ़ाये गये हैं, जिसमें पहला प्रयास इसके उपर चलचित्र
बना कर किया जा रहा है और इसका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है
जिसका उद्देश्य है जन-जन तक इसके गौरव तत्वों को पहुंचाना
जिससे इसपर कुछ काम किया जा सके… और भी कई सारे ऐसे
काम हैं जो हमारे मित्रगण रात-दिन एक कर उसे क्रियान्वित करने
में जुटे हैं… सरकार का प्रयास आजतलक तो नकारात्मक ही रहा है
पर हम अपने सामर्थ के अनुसार क्या ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते
जिससे इसके विकास में एक ईंट जुड़ जाए चाहे वो वैचारिक सहायता
ही क्यों न हो…।सबसे बड़ा आश्चर्य तो आप सभी को यह जानकर
होगा की मुझे अपनी फिल्म बनाने में कितनी परेशानी हो रही है
क्योंकि नालंदा के उपर इंटरनेट पर कुछ एक पेज के सिवा कोई
सामग्री ही उपलब्ध नहीं है…। ये है असल दुर्भाग्य हमारे वर्तमान
का जो हम इतिहास को सहेज ही नहीं पा रहे हैं… कहा जाता है
की इतिहास की महत्ता ही ये होती है कि भविष्य में दोबारा वो
गलतियॉ न की दोहराई जाए जो हमने की हैं।

"कब तक घुटेगी तू इन संस्कारों में,
कब तक बहेगी इन उपेक्षाओं में

सालों से खड़ी है तू यहीं अवशेषों पर
जो प्रकट है क्षण-क्षण वर्तमान पर
मुरझा गई है तू एक याचक बनकर,
ज्ञान-देवी तू साधना सागर

चिंतन का तू अंकुरण है,
सत्य सजाया हृदय महल में
विश्व जागरण का तू प्रस्रवण है
एक तू ही तो सुंदरा है वन में
मेरे राज्य की गहरी धुंध में
गिर जाने दे अपने सजल अश्रु
इन विखंडित शिलाओं पर,

त्याग निस्तब्धता सांझ की
आध्यात्म-वाणी का आह्वान कर,
उठ जाग अभी महानिद्रा से,

बढ़ा दो कदम बोधि-वृक्ष की तरफ
स्वयं की अलौकिक वसुंधरा पथ पर

जीवांत सुरभि… शांत लहर में,
गीत रच ले अनंत स्पर्श मधुर ध्वनियों की
सत्य यही है दिव्य देवी…
तेरा आदिकाल ही तेरा, वास्तविक उषाकाल है।"

"मेरा आज आपसे इस लेख के लिए टिप्पणियों की प्रतीक्षा
नहीं है वरन यह की आप अपने वैचारिक तत्वों को मुझसे
बांटें कि वहाँ पर और क्या किया जा सकता है विकास
के संदर्भ में। मुझे जरुर अपनी योजना से अवगत कराएँ
शायद कुछ एक तत्वों को मैं अपनी फिल्म में भी शामिल
कर पाऊँ।"

धन्यवाद।

Monday, 26 November, 2007

आगाज़ सजग; वास्तविकता मौन…।



कतरा-कतरा जीवन की डोर सिमटती
जाती है संध्या के लाल गर्भ में…
बेख़ौफ नाचती आहिस्ते से
घटती जाती है सांसों में…
दौड़ अंधी, भाग दुनियाँ की
बैचैन चेहरों में उगती है
मायूस पल तृष्णा की कैद
आजाद मन पर चढ़ती जाती है…।

सभी भाग रहे बस औरों से आगे-आगे,
किस ओर कहाँ किसलिए?? है यह बस प्रारब्ध!!!
खुद से या वक्त को छोड़
बोझिल झुके कंधे अपने अस्त की
राह तकते हैं…
नहीं छूटती गति चक्र की खाली वृत
आगे वक्त से जाकर जीने में
वर्तमान रुद्ध हो जाते हैं…
तत्पर है जो, साथ वक्त के चलने को
पागल विक्षिप्त कहे जाते हैं…।

भाग ओ दुनियाँ!!! भाग किधर भी…
भागेगा कितना तू उसी चक्र में
घूमता-घूमता कई बार वहीं…फिर और वहीं
संताप, अविद्या में घुटता ही जाएगा…।

विमुख पतित आवरण, संस्कार घसीटता
सभ्यता की चौखट पर अपना त्राण मांग रहा…
दोष है किसका? नहीं जानते हम,
दोषों के पिछे भागते हम, मूल स्वरुप
स्वच्छंद वयस को रौंदते जाते हैं…
होती है अज्ञान की अज्ञानता से भिड़ंत
लहूलुहान निस्तेज होकर लथपथ
विशाल नीले चादर में रेंगना जानते हैं…।

भरता नहीं ये जख्म कभी…अपनी सलाख़ों
से ही गोद-गोद कर जो बनाएं हैं…
भाव-प्रेम-स्नेह-करुणा डूबती है इस लहू-आंगन में
शोर तड़पते रुह की…
तिमिर-गहराई में लुप्त हो जाती है,
बढ़ती तपीस… धधकती ज्वाला में
प्रतिबद्धता अकुलाई है… बढ़ते हुए इस
अनजाते दर्द से मानवता भरमाई है…

कोई जागे…जाग से आगे, लाकर दे
आनंद-पुष्प के पुलकित हार…
सशंकित हतप्रभ नयनों में भर दे
आशा-गंगा की धार…
रोपे वह ऐसा अंकुरण जो करे सार्थक
यह नव-निर्माण… ।

Wednesday, 7 November, 2007

सभी को दीपावली की बहुत सारी शुभकामनाएँ।



एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में अचानक मुझे मुंबई से बाहर जाना
पड़ रहा है… कुछ दिन तो लग ही जाएँगे आने में, तबतक
आप सभी को मेरी ओर से----

"सभ्यता-संस्कृति-संस्कारों का है यह प्रज्ज्वलन
या भूत से वर्तमान का है यह संवरण
मेरे लिए तो यह दीपक भविष्य का है परावर्तन॥"

"दीपावली" की बहुत-2 शुभकामनाएँ।