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Nalanda -- हमारी धरोहर है।



"नालंदा" जिसका अर्थ है ज्ञान बाँटने वाला, जहाँ से भारत में सांस्कृतिक व
दार्शनिक विचारधारा का सूत्रपात हुआ। जिस समय विश्व अपने अस्तित्व को
अंधकार में तलाश रहा था, हमारी नालंदा अपनी ज्ञान गंगा से जगत के
पाप-पंकिल-शरीरी को पवित्र करने में जुटा था। उस जमाने में विश्व ध्यान-योग
की शिक्षा इसकी गोद में बैठकर पूरा कर रहा था। पटना (बिहार) से लगभग
90 km की दूरी पर स्थित यह महान धरोहर अपने कर्णधारों की राह तक
रहा है, जो कभी हमारे ज्ञान-गौरव का साधन हुआ करता था आज स्वयं की
विगति से त्राण कर रहा है…।

भारत का गौरवशाली इतिहास शक्तिशाली मगध शासन के नेतृत्व में शुरु हुआ,
जिसकी राजधानी राजगृह थी; यहीं से विश्व के दो महान धर्मों का
जन्म हुआ, जहाँ से एक राष्ट्र की भावना, समन्वय सौहार्द व आध्यात्मिक
जीवन का प्रचार-प्रसार आरंभ हुआ आज अपने अस्तित्व की तलाश कर
रहा है जो निश्चित ही एक बड़ा आश्चर्य है। और यही क्रिया विश्व के प्रथम
आवासीय विश्वविद्यालय नालंदा के साथ भी घटा। हम मात्र हाथ पर हाथ
रखे एक दूसरे की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहे हैं…।



सामान्यत: ऐसा माना जाता है की नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना पाँचवीं
शताब्दी के आसपास कुमार गुप्त के द्वारा हुई पर इतिहास के पन्नों को
और खंगाला जाए तो पता चलता है कि इसका अस्तित्व द्वितीय शताब्दी से
ही बना हुआ था क्योंकि नागार्जुन जो यहाँ के विद्यार्थी व बाद में शिक्षक भी रहे
उनका काल यही माना जाता है…। हर्षवर्धन व पाल शासन काल में यह अपनी
प्रज्ञा से फलता-फूलता रहा किंतु इसके उपरांत धीरे-धीरे यह गहरे अंधकार में
समाता चला गया जहाँ से पुन: बाहर नहीं निकल पाया।

महान चीनी यात्री हुयेनसांग और इत्सिंग ने कई वर्षों तक यहाँ सांस्कृतिक व
दर्शन की शिक्षा ग्रहण की, नालंदा के विषय में काफी कुछ कहा है--- "उस
जमाने में विश्व के कई जगहों, सुमात्रा, चीन, थाइलैंड कोरिया, श्रीलंका आदि
जगहों से विद्यार्थी ज्ञानार्जन करने आते थे पर इस विश्वविद्यालय की नामांकन
प्रक्रिया बहुत मुश्किल थी… विद्यार्थियों को तीन कठीन परीक्षा स्तरों से
होकर गुजरना पड़ता था जो शायद विश्व की पहली ऐसी प्रणाली थी। यहाँ
10000 विद्यार्थियों एवं 2000 शिक्षक के रहने की व्यापक व्यवस्था थी
जिसके लिए 300 कमरे बने थे तथा साथ और अकेले रहने की भी
अलग से व्यवस्था की गई थी। यहाँ की नौ तलीय पुस्तकालय में 3
लाख से ज्यादा जनरल व पुस्तकें मौजूद थी जो अपने विनाश के समय
लगभग 6 महिनों तक जलती रही। इसके गौरव पर पहला आघात
हूण शासक मिहिरकुल के द्वारा किया गया बाद में बंगाल का तुर्क शासक
बख्तियार खिलजी ने 1199 के आसपास इसे पूरी तरह से समाप्त कर
दिया…। जिसकी बेड़ियों में वह आज भी बंधी हुई अपनी मुक्ति के उस
उज्जवल दिव्य प्रकाश की आस में आँख फाड़े बैठी है। यह हमारे देश
का दुर्भाग्य है कि हम अपने इतिहास की भूलों को सुधारने के बजाये
लगातार दोहराते जा रहे हैं।




मैं इसकी पुनर्स्थापना के लिए किए जा रहे प्रयास में ज्यादा विस्तार में
नहीं जाऊँगा पर हमारे पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब ने जरुर इसे रास्ता दिया
आगे आने का। सिंगापुर, चीन, जापान व दक्षिण-कोरिया ने भी सहयोग
देने का वादा किया है और 2009 तक इसके पुनर्जीवन को अमल में लाने
का प्रयास किया जाएगा…। पर अगर ध्यान से देखा जाए तो नालंदा आज
भी धूल में पड़ा अपनी मलिनता पर अश्रु बहा रहा है। कोई छोटा प्रयास भी
विकास का अभी तक सरकार के द्वारा नहीं देखने को मिला है… आज
मैं जब कभी टेलिविज़न देखता हूँ तो "अतुल्य भारत" के विज्ञापन
पर मेरी दृष्टि पड़ती है तो थोड़ी खुशी भी होती है पर अफसोस इसबात
का है कि आजतक नालंदा के विषय को न तो लोगों तक पहुंचाया
गया न कभी दिखलाया गया और आज सरकार इसके विकास पर
बड़ी-2 बातें करती नजर आती है… वहाँ न तो बाहर से आये लोगों
के लिए रहने की व्यवस्था है ना ही कोई पुस्तकालय है जहाँ
बैठकर नालंदा के इतिहास पर दृष्टिपात कर सकें।

आज कुछ मित्रों की सहायता से इस महान संपदा की रक्षा के लिए
थोड़े कदम बढ़ाये गये हैं, जिसमें पहला प्रयास इसके उपर चलचित्र
बना कर किया जा रहा है और इसका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है
जिसका उद्देश्य है जन-जन तक इसके गौरव तत्वों को पहुंचाना
जिससे इसपर कुछ काम किया जा सके… और भी कई सारे ऐसे
काम हैं जो हमारे मित्रगण रात-दिन एक कर उसे क्रियान्वित करने
में जुटे हैं… सरकार का प्रयास आजतलक तो नकारात्मक ही रहा है
पर हम अपने सामर्थ के अनुसार क्या ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते
जिससे इसके विकास में एक ईंट जुड़ जाए चाहे वो वैचारिक सहायता
ही क्यों न हो…।सबसे बड़ा आश्चर्य तो आप सभी को यह जानकर
होगा की मुझे अपनी फिल्म बनाने में कितनी परेशानी हो रही है
क्योंकि नालंदा के उपर इंटरनेट पर कुछ एक पेज के सिवा कोई
सामग्री ही उपलब्ध नहीं है…। ये है असल दुर्भाग्य हमारे वर्तमान
का जो हम इतिहास को सहेज ही नहीं पा रहे हैं… कहा जाता है
की इतिहास की महत्ता ही ये होती है कि भविष्य में दोबारा वो
गलतियॉ न की दोहराई जाए जो हमने की हैं।

"कब तक घुटेगी तू इन संस्कारों में,
कब तक बहेगी इन उपेक्षाओं में

सालों से खड़ी है तू यहीं अवशेषों पर
जो प्रकट है क्षण-क्षण वर्तमान पर
मुरझा गई है तू एक याचक बनकर,
ज्ञान-देवी तू साधना सागर

चिंतन का तू अंकुरण है,
सत्य सजाया हृदय महल में
विश्व जागरण का तू प्रस्रवण है
एक तू ही तो सुंदरा है वन में
मेरे राज्य की गहरी धुंध में
गिर जाने दे अपने सजल अश्रु
इन विखंडित शिलाओं पर,

त्याग निस्तब्धता सांझ की
आध्यात्म-वाणी का आह्वान कर,
उठ जाग अभी महानिद्रा से,

बढ़ा दो कदम बोधि-वृक्ष की तरफ
स्वयं की अलौकिक वसुंधरा पथ पर

जीवांत सुरभि… शांत लहर में,
गीत रच ले अनंत स्पर्श मधुर ध्वनियों की
सत्य यही है दिव्य देवी…
तेरा आदिकाल ही तेरा, वास्तविक उषाकाल है।"

"मेरा आज आपसे इस लेख के लिए टिप्पणियों की प्रतीक्षा
नहीं है वरन यह की आप अपने वैचारिक तत्वों को मुझसे
बांटें कि वहाँ पर और क्या किया जा सकता है विकास
के संदर्भ में। मुझे जरुर अपनी योजना से अवगत कराएँ
शायद कुछ एक तत्वों को मैं अपनी फिल्म में भी शामिल
कर पाऊँ।"

धन्यवाद।
3:07 PM
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3:07 PM

Divine India

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1857 का "Revolt"


1857 का विद्रोह” अपने 150 साल पूरा
कर चुका है, मुंबईचौपाल
पर बहस के लिए आमंत्रण किया गया था
बात यहीं से शुरु हुई…मैंने देखा वर्तमान
समय में इतिहास के कुछ पन्ने स्पष्ट हो
चुके हैं तब-भी इतनी अतिश्योक्तिपूर्ण परिचर्चा
हो रही है…अब चुकीं इस क्षेत्र से अपन का
लंबा नाता रहा है तो पूर्व का “मैं” जागा और
जैसे ही लिखने लगा…ये क्या मेरे हाथ कंपकंपा
रहे थे जैसे जड़ता की स्थिति में आ गये हो
Keypad पर कुछ भी टाईप नहीं हो रहा था,
मन भयाक्रांत था सहमा हुआ…अब लिखना था
1857 का विद्रोह और कांप रहा था मैं क्यों?
तो लो जी हम भी मन के अंधकार को प्रकाशित
कर लें नहीं तो मैं काला न रह जाऊँ…।एक दिन
“RSS तालिबान” लिखा लेख पर जा पहुंचा…
मैं इसपर की गई टिप्पणियों को पढ़ पूरी तरह
हतोत्साहित हो गया…वाह मित्रों!!! क्या हालात हैं
तुम्हारे…जब रचना जी ने अपने लेख में ग्रुप की
बातें की तो सारे झंडा लेकर विरोध करने जा
पहुंचें और वहाँ टिप्पणियों की संख्या मासा-अल्लाह!!J
सब सफाई ही देने में लगे थे…लेकिन ये क्या
संप्रदायवाद की दुर्गंध…क्या प्रतिक्रिया
दी है भाइयों भाई वाह!!!!!!
Shrish Bhai
मेरे एक लेख की प्रतिक्रिया में सच कहा था कि
दिव्याभ भाई आज –कल चिट्ठाकार बहुत असहनशील
हो गये हैं…यह अब सच लगने लगा है, कोई
अनाम बनकर टिप्पणी कर रहा है और जब
देखता है कि अभी तो कुछ कहा ही नहीं तो
दोबारा वही शक्स पुन: पहुँच जाता है…हमारे बीच
बौद्धिकता का चोला डाले कुछ मित्र-गण भी
कुछ-से-कुछ लिख कर आ रहे हैं…कई बार इन लोगों
ने “जलते भारत” पर सवाल उठाए पर दिख गया कि
लिखना और वास्तविकता दोनों अलग हैं।


सदाशिव स्वामी ने कहा था कि
जो करने की इच्छा हो वह मत करो,
तब तुम जो चाहोगे वह कर सकोगे।


इस विरोधाभासी कथन का यही अर्थ है कि अपने
“अहं” को मार डालो तभी उच्चता पाओगे।
अब कहीं मैं न इस गाली-गलौज में आ फंसूँ
तो भयभीत हो गया…था।]
तो चर्चा शुरू करते हैं---
1857 का विद्रोह“क्रांति” था। सबसे पहले
“क्रांति” को समझना आवश्यक है…
“क्रांति” वह होता
है जिसका कोई परिणामी उद्देश्य हो एक निश्चित समीकरण
हो एक गणितीय नियम हो…जो सत्ता के पूर्ण परिवर्तन
व नये शासन की शुरुआत करता हो…बदलाव की
उसी पुरातन पृष्ठभूमि से स्वयं को अलग कर
निर्माण की नई आकांक्षा को पूरा करता हो,
अर्थात सारे स्तरों पर तत्क्षण परिवर्तन।

और इस आधार पर यह अब प्रमाणित हो चुका
है कि 1857 एक विद्रोह था…।


1857 का विद्रोह एक महान जागरण था, जो गहन
अब्रिटिश” भावनाओं की अभिव्यक्ति स्वरूप उत्तर तथा
मध्य भारत में फूट पड़ा, यद्यपि भारतीय नागरीकों
के असंतोष का सीधा प्रभाव सैनिकों पर पड़ा,
जिसके कारणत: इसका आरंभ सैनिक विद्रोह के
रुप में हुआ तथापि इसका नेतृत्व असैनिकों के हाथों
में और शीघ्र ही इसने अधिकांश जनता एवं किसान
वर्ग को भी सम्मिलित कर लिया। विद्रोह की व्यापकता
इसी-से ज्ञात होती है कि उस समय के कतिपय
पर्यवेक्षकों ने इसे “राष्ट्रीय विद्रोह” की संज्ञा दी।
ईस्ट इंडिया कंपनी की साम्राज्यवादी अराजकतापूर्ण
शोषण की प्रवृति तथा धन की लोलुपता के संचित
प्रभाव से भारत में सभी वर्गों यथा रियासतों के
शासक, सैनिकों, जमींदारों, कृषकों, व्यापारियों तथा
धर्म संस्थापक आक्रांत थे, ब्रिटिश नीतियों के कारण
हिंदू-मुसलमान के धर्म-मान-जीवन सम्पत्ति सभी
को भय उत्पन्न हो गया था। यद्यपि भारतीयों का
रोष समय-समय पर विभिन्न भागों में विद्रोह के रुप
में प्रकट होता रहा; इसी आधार की उपज जो सामान्यत:
भिन्न व व्यापक जन-आंदोलन “1857 के विद्रोह
के रुप में हुआ।
जहाँ तक 1857 के विद्रोह की “राष्ट्रीय प्रकृति” का प्रश्न है
इस संबंध में इतिहासकारों में मैंतक्य नहीं है।
इसके पक्ष में “बेंजामिन डिजरेली” जो इंगलैंड में
समकालीन रूढ़िवादी दल के एक प्रमुख नेता थे तथा
अशोक मेहता” आदि विद्वानों ने इसे “राष्ट्रीय विद्रोह
माना है। डिजरेली के अनुसार
यह सुनियोजित एवं
प्रयत्नों का परिणाम था, जो अवसर की प्रतीक्षा में था।

जहाँ तक राष्ट्रीय विद्रोह का प्रश्न है, किसी विद्रोह
को राष्ट्रीय विद्रोह तब कहा जा सकता है जब;
    • वह संपूर्ण राष्ट्र में एक समान प्रभाव छोड़े
    • उस विद्रोह का कोई एक नेतृत्वकर्ता हो
    • वह राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर लड़ा जा
      रहा हो
    • विद्रोह को सर्वसाधारण एवं सभी वर्गों का
      समर्थन प्राप्त हो।


1857 के विद्रोह में बंगाली, पंजाबी, महाराष्ट्रीय तथा
मद्रासीयों नें यह कभी अनुभव नहीं किया था कि वे
एक राष्ट्र के सदस्य हैं। विद्रोह का नेता कोई राष्ट्रीय
नेता नहीं था। “बहादुरशाह” कोई राष्ट्रीय सम्राट नहीं
था, उसे तो मात्र सैनिकों ने नेता घोषित कर दिया,
नाना साहब का दूत लंदन से पेंशन प्राप्त नहीं कर
सका तब इन्होंने विद्रोह का झंडा उठाया। झांसी का
विद्रोह उत्तराधिकार और विलय के प्रश्नों को लेकर था,
इसमें कोई संशय नहीं कि “रानी झांसी” वीर-गति को
प्राप्त हुईं परंतु इससे स्पष्ट नहीं की वह राष्ट्रीय हित में
लड़ रही थीं। अवध का नवाब एक बेकार एवं व्यभिचारी
व्यक्ति था, जो राष्ट्रीय नेता नहीं हो सकता था यह तो
अवध के तालुकदारों ने सामंतशाही अधिकारों था अपने
राजा के लिए युद्ध किया ना कि राष्ट्रीय-हित में। इसमें
जनता के सभी वर्गों ने हिस्सा नहीं लिया आधुनिक
शिक्षा प्राप्त वर्ग, मध्यम एवं उच्चवर्ग तथा सम्पत्तिशाली
वर्ग इस आंदोलन से अलग ही रहा। विद्रोह का प्रसार
भी सीमित था, उत्तर व मध्य भारत के अलावा अन्य भागों
में इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।
डा सेन का कथन है:
19 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में भारत केवल
एक भौगोलिक कथन ही था तथा उस समय भारतीय
राष्ट्रीयता भ्रूणावस्था में थी”।
सही जान
पड़ता है।

श्री ताराचंद ने ज्यादा स्पष्ट किया है;
1857 का विद्रोह एक कमजोर व्यवस्था
का अपनी खोई हुई मर्यादा को पाने का अंतिम प्रयास
था।


अत: इस रुप में “1857 के विद्रोह" को राष्ट्रीय विद्रोह की
संज्ञा नहीं दी जा सकती। “क्रांति” तो बिल्कुल नहीं!!


जहाँ तक 1857 के विद्रोह का प्रश्न है, इसके वास्तविक
स्वरूप के संबंध में इतिहासकारों का विभिन्न मत है…
समकालीन अंग्रेज लेखकों ने जिसमें जॉन विलियम,
मालेसन, ट्रेविलियन, लारेन्स ने इसे सिर्फ सैनिकों का
विद्रोह या "म्यूटिनी" कहा। इन लोगों ने असैनिकों के
योगदान की या तो उपेक्षा की या इसे कुछ स्वार्थी
लोगों की स्वार्थपरायणता का परिणाम मानकर महत्वहीन
समझा। कुछ भारतीय इतिहासकार भी इसे सैनिक विद्रोह
मानते हैं—मुंशी ज़ीवन लाल, दुर्गादास, सैयद अहमद ख़ां
आदि। दूसरी ओर कुछ लेखकों ने इसे;
अंग्रेजों के विरूद्ध मुसलमानों का षड़यंत्र,
असंतुष्ट सामंतों का विद्रोह कहा।

“होम्ज” की उक्ति सबसे प्रसिद्ध रही इसने इसे—
“बर्बरता तथा सभ्यता के बीच युद्ध” कहा।
स्पष्ट है कि इस बारे में अनेकों विचार प्रस्तुत किये गये
हैं। किसी निष्पक्ष निष्कर्ष तक पहुंचने हेतु इन विचारों
का परीक्षण आवश्यक है---


यह सही है कि विद्रोह का आरंभ सैनिक छावनी
से हुआ, कारतूस के मुद्दे ने अवसर को मौका दिया
और सैनिक हिंसक विद्रोह कर दिल्ली पहुँचे जहाँ वहाँ
के सिपाहियों ने उनका साथ दिया लेकिन हमें यह ध्यान
रखना चाहिए की भारतीय सैनिकों का एक बड़ा भाग
अंग्रेजों के साथ में था जिसने इस विद्रोह को कुचलने
में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। दूसरे इस विद्रोह
में मात्र सैनिकों या सामंतों ने भाग नहीं लिया था वरन
जन-साधारण ने भी अपना रोल निभाया था। इसकारण यह
मात्र सैनिक विद्रोह नहीं था…।
जेम्स आउट्रम और डब्ल्यू टेलन ने इसे मुस्लिम षड़यंत्र माना,
जिसमें हिंदू शिकायतों का लाभ उठाया गया किंतु यह
व्याख्या भी अपर्याप्त है क्योंकि वर्तमान में यह स्पष्ट
हो गया है इस विद्रोह का कोई संगठन नहीं था।
इसी प्रकार इसे ईसाइयों के विरुद्ध भी विद्रोह नहीं माना जा
सकता क्योंकि एक तो ईसाइयों ने अपने धर्म प्रचार में
कोई पर्याप्त सफलता नहीं पाई थी दूसरे उनके द्वारा अंग्रेजी
शिक्षा के प्रचार को हिंदू-मुस्लीम दोनों समाजों के शिक्षितों
ने सहर्ष स्वीकार किया था।
आर सी मजुमदार का मानना है कि तथाकथित “प्रथम राष्ट्रीय
स्वतंत्रता संग्राम” ( जिसे "सावरकर" ने माना है) न तो प्रथम,
न राष्ट्रीय और ना ही स्वतंत्रता संग्राम थामार्क्सवादियों के
अनुसार यह सैनिक व कृषकों का प्रजातांत्रिक गठजोड़ था जो
विदेशी तथा सामंती दासता से मुक्त होना चाहता था।


उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न विचारकों
के मत में आंशिक सत्यता ही है, कोई भी मत पूर्णतया
सत्यता की कसौटी पर खड़ा नहीं उतरता…यह एक
जन आंदोलन अर्थात “पापुलर रिवोल्ट” था जो सैनिकों
के मूल से शुरु हुआ एवं असंतुष्ट सामंतों ने इसका नेतृत्व
किया…। यह एक सरकार कि नीतियों के विरुद्ध जन विद्रोह
था जिसमें दोनों ने मिलकर हिस्सा लिया।


इस गंभीर विश्लेषण से पता चलता है, हाँलाकि “1857 का
विद्रोह” असफल रहा मगर यह व्यर्थ नहीं गया, यह हमारे
इतिहास का एक शानदार पड़ाव था; यह पुरातन भारतीय
नेतृत्व को बचाने का एक हताशा-पूर्ण प्रयास जरूर था परंतु
यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए भारतीयों का
प्रथम महान संघर्ष था। इसने आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन
को नींव प्रदान किया तथा विदेशी शक्ति को समाप्त करने
के लिए जिस वीरता व बलिदान की भावना का परिचय
दिया वह आने वाले भारतीय जन-नायकों की प्रेरणा का
अक्षुण्ण स्रोत बना रहा…।
मैं इस लेख के माध्यम से उन समस्त वीरों को
सादर प्रणाम करता हूँ…।
भाइयों ;
“महात्मा बुद्ध” से एक प्रश्न पूछा गया कि
“मनुष्य को सबसे समान रुप से प्रेम क्यों करना चाहिए?
“बुद्ध” का उत्तर बड़ा अनूठा था—“क्योंकि प्रत्येक मनुष्य
के असंख्य और विविध जन्मों में कभी-न-कभी अन्य प्रत्येक
जीव किसी-न-किसी रूप में उसे प्रिय रहा है।

यह हमें याद दिलाता है कि हमें व्यवहार में कैसा
परिवर्तन करना चाहिए…मुझे आप अपना कोप-भाजन
न बनाये इस कारण यह लिखना पड़ा JJ
2:39 PM
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2:39 PM

Divine India

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प्रश्नों की भौतिक भूमि पर खड़ा “द्रष्टा”




“हमेशा चाहना यही होती है कि पूछा जाये मुझसे मेरी निकटता
के दो प्रश्न…उलझु न जिसमें ‘मैं’ और दंभ पुलकित होता हो,
शायद ही कभी अपने सपनों की दो-चार पंक्तियाँ लिखता हूँ…
इच्छाओं व तृष्णाओं के जो शिखर बुनता जाता हूँ…
वह अंतस्थ तृप्त उदगारों में ही विसर्जित कर देता हूँ…
कहीं खुल न जाये भीतरी भेद मेरे अवचेतन मन के वातायन से
और सुन कर जान साथी मित्र मुझे छोड़ दूर न हो जाएँ…”॥

  • मैंने मिश्रित प्रश्नों के उत्तर दिये हैं जिसे “राजीव जी”,
    “राकेश जी” और “मान्या जी” ने मुझसे पूछा था…

    प्रश्नदो प्रिय पुस्तकें और दो प्रिय चलचित्र…।

  • कोई भी विचारशील पुस्तक जिसकी पंक्तियों पर रुककर
    चिंतन किया जा सके और जो मानसिक कोष्टकों को भी
    चोट पहुँचाए…ऐसी पुस्तकों में “Indian Philosophy”
    by S RadhaKrishn & M Hiriyanna और
    “रश्मिरथी”—राष्ट्रकवि "दिनकर" विरचित।
  • 'सिनेमा' समाज और मानव कुंठा का दर्पण है…आगे
    निकलता समाज पीछे मुड़कर देखना नहीं चाहता क्योंकि
    उसकी मानसिकता नीचे देखने नहीं देती तो इसपर रहनेवाले
    भूमि पर न खड़े होकर सदा आसमान में विचरण करते रहते
    हैं…। इन आधारों को माना जाए तो “प्यासा” बेहतरीन फिल्म
    है और समाज की कुंठा का परिणाम “अंकुर” में दिखता है।

    प्रश्नक्या लिखना पसंद करते है और क्या प्रेरित करता है?

  • आनंद और Romance न हो तो यह जिंदगी बोझिल
    हो जाए… दबी-दबी सी, घुटन भी होगी…चाहता हूँ बंदिशों से
    पार भीतर उतर कर बाहर को टटोलूँ…प्रकृति के ताजे नूपुरों
    पर बस एकबार खुल कर थिरकूँ “परमात्मा” की कलाकृतियों
    में छिपे रहस्यों को पहचान सकूँ…जरा देख सकूँ कि उन
    पत्तों पर क्या लिखा है…॥

    प्रश्नक्यों लिखते हो…?

  • मैं लिखता नहीं…!!! लिखना बड़ा चतुराई का काम
    है… और फिर लिखते तो सारे हैं…कोई कलम से तो कोई
    तन्हाई में तो कोई बातों से…। मैं तो बस मानसिक तरंगों
    और शब्दों का व्यापारी हूँ।

    प्रश्नजीवन की कोई सनसनीख़ेज़, धमाकेदार और
    रोमांचकारी घटना…।

  • जीवन बनाम गति…अर्थात इसके साथ-साथ
    कथाएँ, कहानियाँ, घटनाएँ चलती रहती हैं…बस वही घटनाएँ
    स्मरण में रहती हैं जो बहुत दु:ख या चरम सुख के स्तर
    पर ठहर जाती हैं, लेकिन छोटे-छोटे वाक्यांश जो सदा हमारे
    साथी होते हैं वही भूला हो जाता है और दूर के शोर याददाश्त
    बन जाते…लेकिन प्रश्न के लिहाज से जब मैं 14 साल पहले
    संन्यास लेने निकला था और मेरा “अनुज” मेरे साथ था…
    उसकी पलकों से बंधे सलील ने स्नेह की नई परिभाषा मुझे
    सिखलाई, हाथ पकड़ कर तो रोक नहीं सकता था; वो आँसू
    जेल बन गये थे।

    प्रश्नकिस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसंद हैं…।

  • सच कहा जाए तो कोई भी चिट्ठा अपने-आप में
    पूरा या उत्कृष्ट नहीं होता, हाँ उसकी कुछ पोस्ट जिसे आप
    Topic कह सकते हैं अच्छा लगता है और उसपर ही टिप्पणी
    भी करता हूँ…अभी तो हिंदी ब्लागिंग स्वयं रास्ता ढूंढ़ रहा है…
    तो इसकी सीमाएँ संकुचित हैं।
  • चूंकि मेरे करीबी मित्र भी हैं इसमें और गुरूजन
    भी और ठहरा मानव तो पूर्वाग्रह होना स्वभाविक ही है तो
    उनकों बिल्कुलअलग मानता हूँ। सीखना चाहता हूँ तो
    सभी को पढ़ना भी होताहै जो अच्छा लगा
    “बस ओढ़ ली चदरिया उसकी”

    प्रश्नआपकी स्व-रचित पसंदीदा रचना कौन सी है?

  • प्रत्येक लेखनी पुत्र के समान होती है एक लेखक
    के लिए, लेकिन कुछ भावनाएँ हमेशा तैरती रहती हैं और
    जब उन्हें शब्द मिल जाते हैं तो वह जीवंत हो उठती हैं…
    ऐसी ही रचना हैं “वो कौन है” जिसे अभी पोस्ट नहीं किया
    है किंतु मौका मिलने पर डाल दूँगा।

    प्रश्नकला पक्ष का भाव पक्ष से रिश्ता कितना महत्वपूर्ण है?

  • एक प्रकार से कला पक्ष भाव पक्ष ही है…शब्द
    अलग-अलग हैं पर संस्कार एक है…।

    प्रश्नलिखने से ज्यादा पढ़ना मन-पसंद क्यों विधा है?

  • भाई यह तो दो-धारी तलवार है…ज्यादा पढ़ना व्यक्ति
    को विचार संपन्न बनाता है…अज्ञान को ज्ञान से जोड़ता है
    लेकिन साथ में अहंवाद को भी प्रश्रय देता है जब हम स्वयं
    को विद्वान समझने की भूल करने लग जाते हैं।

    प्रश्नआपके जीवन के दो महत्वपूर्ण व्यक्ति…।

  • प्रत्येक के जीवन में सामान्यत: माता-पिता से
    ज्यादा महत्वपूर्ण कोई नहीं हो सकता लेकिन मेरे लिए
    “मेरी पगली’या” और “मेरा अनुज”!! एक सत्य है तो
    दूसरा सार्थक!!!

    प्रश्नअपनी एक अच्छाई और बुराई…।

  • मेरी जो अच्छाई है वही बुराई भी है यानि जो मैं
    चरम रुप में करता हूँ वह बुराई है ऐसा मानता हूँ और
    शांत आश्रय मेरी अच्छाई॥

    प्रश्नमूड खराब होने पर कौन सा गाना सुनते हैं?

  • मूड खराब होने पर कोई गीत सुन भी कैसे सकता है!!
    अंधेरे कमरे में तन्हाइयों पर अकेले-पन का सर रखकर
    निरीह और निर्बल भावनाओं को आँखे बंद कर घंटों देखना
    और तलाश उस स्थिती की जहाँ मैं रुक जाऊँ।

    प्रश्नआप किसी साथी चिट्ठा-कार से प्रत्यक्ष मिलना
    चाहते हैं, तो वह कौन है और क्यों?

  • बिल्कुल नहीं!!! कितने सुंदर-सुंदर भावनात्मक
    चिट्ठे रोज़ लिखे जाते हैं, हर दिन उनकी सुंदरता
    व्यक्तित्व की प्रखरता उनके भाव में अनुभूत होती हैं…जो मेरे
    मन को आमोद-प्रमोद से खिलखिलाती हैं, मेरा चित्रकारी मन
    आवेश की ब्रुश से बहुतों के Sketch बना रखे हैं तो कृपया
    जीने दे मुझे मेरे जाने तस्वीरों के सहारे जो परम पाकीज़ा और
    परम पुनीत भी है…।!!!अवर्णनीय!!!
    जो मजा अदृष्ट में है दृष्टता तो महज खेल है…।

मेरा प्रश्न…सभी ब्लागर मित्रों से है--

आपको अपने भीतर की "शून्यता" में क्या दिखता है जिसे

पाकर खो दिया…।

3:44 PM
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3:44 PM

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Satyagraha औR महात्मा…।

Satyagraha R महात्मा…।

राष्ट्रपिता…महात्मा…गांधी…'बापु'…भारतीय इतिहास के
महानतम व्यक्तित्व…विश्व नेता…दार्शनिक व एक प्रवर्तक…
जिन्होंने मंथन कर 'सत्याग्रह' (सत्य का आग्रह करते हुए किसी
भी परिस्थिती का मुकाबला करना…Total devotion surrender to
the will of Truth...
No matter!Come what may I stick to the honesty of Truth.) के आधार पर विश्व को अनूठा मार्ग दिया
की अहिंसा के आधार पर 30cr जनता को बांधा जा सकता
है…जन-आंदोलन के लिए। इससे पूर्व किसी प्रवर्तक या भारतीय राजनेताओं ने ऐसा नहीं कहा था…।

क्रांति हो सकती है…! बिना वर्ग-संघर्ष के;
वर्ग-विहिन क्रांतिका बिगुल फूंका…बापु यह जानते थे कि इन सबों में कुछ तो साम्यता होगी,जो सहयोग का आधार बन सकता है…वे राजनैतिक आधार पर संघर्ष नहीं चाहते
थे…उनका आधार था 'सत्याग्रह' पर आधारित शाश्वत नैतिक विचारधारा। एक ऐसी
प्रणाली जो विशेष वर्ग का हृदय परिवर्तन कर सहयोग के लिए वाध्य कर दे…
यानि हृदय परिवर्तन के आधारपर क्रांति !!!


हिंसा के आधार पर सामान्य जन को आकर्षित नहीं किया जा
सकता था…जबकि विभिन्न वर्गों को अहिंसा के माध्यम से जोड़ा जा सकता था; इसी यथार्थवादिता ने महात्मा को व्यापक जनाधार दिया उस समय जब यह देश टुकड़ों में
बँटा था।गांधी जी ने 'सत्याग्रह' के आधार पर जन-आंदोलन का चित्र खींचा-----
"एक नियंत्रित जन-आंदोलन" जिसमें साहस व समग्रता हो किंतु प्रहार के लिए नहीं…सहनशीलता के लिए।

साध्य कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो लेकिन साध्य की श्रेष्ठता का यही प्रभाव
हो सकता है…साधन की श्रेष्ठता…,तात्पर्य यदि साधन श्रेष्ठ होगा तो विचार पवित्र होगा…
कार्य में शुद्धि आएगी…क्योंकि जलता हुआ भारत जलती मानसिकता से नहीं बुझ सकता था।वे सहयोग के आधार पर परिवर्तन कर रहे थे…एक ऐसा साहस…! जो विपक्ष को भी अपनी रणनीति बता दिया करते थे…यहाँ तक की जगह और तारीख कि वो क्या करने
वाले हैं---यह थी उनके रणनीति की पारदर्शिता!!!
.....
महात्मा यह जानते थे कि किसी आंदोलन को दीर्धावधी तक नहीं ले
जाया जा सकता है क्योंकि कृषक-कामगार को काम के लिए बाध्य रुप से जाना
पड़ता है, इससे पहले कि जन-आंदोलन स्पष्टत: विफल हो वे पहले ही सफलता के
चरमविंदु पर वापस ले लेते थे…"उनके विचारों में एकप्रकार का लचीलापन था"…
आंदोलन वापस लेने के उपरांत भी वे संवाद के लिए तैयार रह्ते थे…यानि
संवाद से क्रांति!!!

आंदोलन की असफलता के बावज़ूद वे असफल नहीं कहे जा सकते…
क्योंकि विश्व इतिहास में इसप्रकार का यह प्रथम अहिंसात्मक आंदोलन था जिसमें
सभी-ने मिलकर हिस्सा लिया था जो निश्चय ही अद्भुत था…।साम्राज्यवाद के अंत
के उद्देश्य के साथ-साथ सुधारों का प्रयास किया जा सकता है…यह था 'सत्याग्रह' का रचनात्मक स्वरुप। मैं अभी-भी यही सोंचता हूँ कि गांधी जी को अंग्रेजों ने मार क्यों
नहीं दिया.…?द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब गांधी जी जेल में थे उस समय "चर्चिल"
ने कहा था कि यह "नंगा फकीर" अबतक मरा क्यों नहीं…।लेकिन गांधी जी के लाख
उकसाने पर भी अंग्रेज यह जानते थे कि यह "मलंग बाबा" दो निशाना साध कर बैठा
है…एक कि अगर उनकी मृत्यु अंग्रेजों के हाथों हुई तो यह व्यापक जनाधार उनको पूरी
तरह से बाहर खदेड़ देगा…गांधी की मृत्यु अर्थात अंग्रेजों की मृत्यु; नहीं तो आजादी तो मिलनी ही थी…तो क्यों नहीं ज्यादा से ज्यादा लोगों को खुन खराबे से बचाया जाए…
यह थी उनकी युद्ध नीति!!!


युवा Suppression को वह समझते थे कि यह वर्ग असहनशील होता
है…जिसे ज्यादा दबाया नहीं जा सकता…'भगत सिंह ' भी तो असहयोग आंदोलन की
असफलता की उपज थे…जिसे इस आंदोलन ने मार्ग दिया बढ़ने का…वे जानते थे कि
फांसी पर चढ़कर आजादी नहीं मिल सकती…हमें आंदोलन को पूरा करना है वैसे भी
भारत एकराष्ट्र नहीं बना है अगर नेतृत्वकर्ता ही न रहे तो आंदोलन को विखंडित होने
में कितना समय लगेगा… अपने सिद्धांतों के सहारे आजादी को छूना बहुत अलग है…
जिन लोगों ने कुर्बानियाँ दी महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के द्वारा उन सभी को
श्रद्धांजलि दी.…!!!

इंसान चाहे जितना ही महान क्यों न हो वह हमेशा अधूरा ही होता
है…।गलतियाँ हर इंसान से होती हैं, एक सामान्य आदमी की गलतियों को कोई
नहीं देखता पर बड़े लोगों की छोटी गलतियाँ भी बहुत बड़ी दिखती है---हमें यह
नहीं भुलना चाहिए कि वे हमारी तरह बिल्कुल सामान्य मानव थे।
उनका 'सत्याग्रह'…सृजनात्मकता का अनमोल दृष्टांत था…समन्वय
सहृदयतासंयमसमानतामर्यादा उनके दर्शन का मूल था वे स्पष्टत: जानते
थे कि जबतक समन्वय नहीं होगा शांति नहीं आएगी…॥


"दर्शन जिनका काल से आगे…सत्य था पीछे-पीछे
टेक चला था राम रे…
नि:संग अहिंसा की कर्मठता का पाठ पढ़ाते अपने
जीवन काल में…
जिसके निर्भीक पांव से पड़ा मलीन था क्षत्र ब्रिटिश
का राज रे…
भारत के क्षितिज पर बनकर पिता चंदा के जैसे चमकते
हैं बापु बनकर राम रे…
अनुनयपूर्वक लड़ा संग्राम, उतार फेंका अपने चीवर को
मानवता के आदर्श में…
दिया विश्व को अनूठा ज्ञान ऐसे थे वह महात्मा.…
जिनकी दुनियाँ करती गान रे…
सभी आधारों का समन्वय कर दे दिया वतन आजाद
हमारे हाथ रे…
वे महान नहीं आदर्श ,गर्व- स्वाभिमान यही थी उनकी
पहचान रे…
वह मानव थे या महा-मानव पर थे
भारत के लाल रे…
आओ याद करें उस पुण्य आत्मन को
शत-शत नमन आदर-प्रणाम के साथ रे…
कि विश्वास हो पर्वत के जैसा जो ढ्केले
चक्रावात रे…
पूरा हो लक्ष्य हमारा बढ़े देशाभिमान रे…"
2:41 PM
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2:41 PM

Divine India

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Incredible India...! अतुल्य भारत…???

Incredible India...! अतुल्य भारत…?

अचानक मैं घोड़े की टाप से रौंदा जाने लगा, चेहरे से रक्त की धार फूटने
लगी, मेरा हरा-भरा बाग जिसमें मैनें पौधे लगाए थे सब सूखते जा रहे थे दीमक ने उनके जड़ों को खोंखला कर दिया था,मैं इस दृष्य को देख तड़पने लगा कि किसी ने मेरा गला दबा दिया...मैं...मैं ! उठ बैठा,शायद कोई सपना था लेकिन बहुत अटपटा कुछ समझ में नहीं आ रहा था क्या......? सुबह के छः बजे थे और आदतन उठते ही दोनों
हाथों की हथेलियों को देखते हुए अपूर्ण तस्वीर, कार्य, थोड़े अपराध के लिये क्षमा मांगता
परमात्मा से और जोड़ से अंगड़ाई लेते हुए "Good Morning India" कहता उठा, सामनेके वातायन से आते उषा-किरण की तरफ गया...झांक कर देखा तो वही भागम-भाग जिंदगी,
वही पुरानी लकीर, ढाक के तीन पात...। मैं कुछ असमंजस में ही था कि देखा एक भीखाड़ी
किसी-से कुछ मांग रहा था थोड़ी देर बाद वह शक्स उगलियों से इशारे करता जाता दिखा
चुकिं मैं दुसरे महले पर था,कुछ सुन न सका पुनः देखा कि वही भीखाड़ी किसी दूसरे के
सामने उसी तरह खड़ा था मुझे दिख रहा था कि यह भीखाड़ी जो दिखने में तो ठीक ही
था, इसका आत्म-सम्मान गली मे भटक रहे कुत्ते के समान हो गया है दुत्कारो फिर भी
सस्ती रोटी की खातिर दरवाजे पर दुम हिलाएगा ही । अस्त हुआ मानव स्वाभिमान
पथ-प्रदर्शक देश की फटेहाल नियति को गा रहा है।
मुझे अत्यतं अकुलाहट हो रही थी कि पराधीनता की दहलीज को
पार किये ५० वर्षों से ज्यादा हो चुके हैं--और निश्चित ही अंग्रेजों को गये भी किंतु आश्चर्य
इस बात का है कि अंग्रेजों की विंदाश और सलीक़ेदार शैली को तो आज तक नहीं सीख
पाए हाँ...उनकी हड़पनीति में...भाई क्या बात है...! घुड़दौड़ लगा रखी है।शायद हम कहीं
अपनी पराधीनता को इस उल्लास से कि हम Modern हो रहे हैं, भुनाने का प्रयास तो नहीं
कर रहे हैं...? आज हम स्वतंत्र हैं...लेकिन स्वाधीन (स्व+अधीन) नहीं हो पाए हैं क्योंकि जिस
स्वतंत्रता की बात बारंबार की जा रही है वो तो मात्र व्यक्तिक स्वतंत्रता से ज्यादा कुछ भी
नहीं जबकि स्वाधीन होना यानि हम समाज-संस्कार-संस्कृति-परिवेश में उच्चोत्तर विकास
करते हुए 'स्व' के उपर 'अधीन' रहकर देश को पटल पर रख सकें। स्वाधीनता इस अर्थ में
कि हम स्वतंत्र जरुर हैं लेकिन मानसिक रुप से रुग्न और पराधीन--अनुसरण बुरा नहीं है
किंतु उसमें अगर देश का जज्वा ना हो तो रंग बदल जाता है। मात्र व्यक्तिक विकास ही
देश का विकास नहीं है--चाहे हम लाख चिल्ला-चिल्ला कर विकसित होने का धौंस...बुद्धिजीवी
होने का छोटे और कमजोर लोगों पर जमा सकें किंतु जैसे ही हम विकसित राष्ट्र की श्रेणी में
खड़े होते हैं, हमारी धीधी बंध जाती है। न तो साहित्य, न विज्ञान, न मेडिसिन, न खेल किसी
भी प्रतिस्पर्धा में हम कही नहीं ठहरते-- भारत की सांस्कृतिक उपलब्धियों में रमने पर
अंतःकरण गीता और शंकराचार्य के दर्शन, चरक की आयुर्वेद एवं आध्यात्मिक उन्नति की
सुगंध से आज भी महक उठता है। मैनें यहाँ के कई महात्माओं-माताओं के शिविर में जाकर
देखा है, अन्य विश्व से आए बृहत संख्या में ये वही लोग हैं जो अपना सबकुछ छोड़कर
शांति मांग रहे हैं-- यही सब देखकर उज्जवल-आनंद तथा असीम गौरव का बोध हम करते ही हैं।
भारत का "संन्यास" उस महान दार्शनिक 'प्लेटो' के लिये भी अज्ञात ही था,जब 'सिकंदर महान'
से अपनी गुरुदक्षिणा में भारत से एक "संन्यासी" लाने को कहा था। यह भी ठीक है की
ब्राह्मणवाद ने धर्म की आढ़ मे कई सामाजिक कुरितियों को जन्म दिया लेकिन हमारा
आध्यात्मिक दर्शन आज भी शांति की राह विश्व को दिखा ही रहा है--चाहे रजनीश हो या
रामदेव या दीपक चोपड़ा (इनके शिष्य तो राष्ट्रपति बुश ही हैं) या श्री श्री रविशंकर अनेकों
बाहरी लोग इनके आश्रम में देखे जा सकते हैं। लेकिन जिसके रहस्य को संसार देखने निकला है,
उसे हमने ही भुला दिया है-- अमेरिका ने अब्राहम लिंकन, मार्टिन लुथर किंग; अफ्रिका ने
मंडेला; जर्मनी ने विस्मार्क आदि को महान से महानतम बनाया है...और हम इस बात पर
लड़-कट रहे हैं कि महात्मा गांधी महान या अंबेदकर--पटेल या नेहरु, यह एक विचित्र स्थिति
है,आने वाले १०० वर्षों में निश्चय हीं हम उस अवस्था में पहुँच चुके होंगे जब हमें अपने
धर्म-मातृभूमि पर शर्म आने लगेगी। इस देश को आजाद हुए ५० वर्ष से ज्यादा हो चुके हैं
और हम बारंबार इसी प्रश्न में उलझे हैं कि क्या वह सपना साकार हुआ जो हमारे राष्ट्रपिता
ने,हमारे पूर्वजों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देखा था...यानि वह सपना जिसमें स्वतंत्र भारत
उन तमाम अभिशापों से मुक्त होगा जो पराधीनता की देन थे और हम भीतरी और बाहरी
समृद्धि की आभा से खिल उठेगें गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, असमानता,भ्रष्टाचार,अराजकता आदि
प्रेतों से मुक्त होकर एक सुंदर और अखंड भारत का स्वरुप उभरेगा।
ऐसा नहीं है कि हमने उपलब्धियाँ प्राप्त नहीं की हैं--आर्थिक
व सामाजिक रुप से हम काफी समृद्ध हुए हैं;आम आदमी की बेहतरी के लिये अनेकों
योजनाओं एवं परियोजनाओं का निर्माण हुआ है;गांव उन्नति की ओर हैं;वैज्ञानिक व तकनीकि
स्तर पर भी काफी कुछ किया जा रहा है। हमारा राष्ट्र निश्चित ही विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा… की धुन में है पर इसमें अपने जैसा क्या है मैं समझ नहीं पाता
अगर बड़ी-बड़ी पार्टियों में,रोड पर नंगा नाच,खुलेआम शराब पीना अगर आधुनिकता है तो
दिखाओ इन तस्वीरों को उन राष्ट्रों को जो इनको बहुत पहले कर चुके हैं,हँसते हैं वो
हमपर...अनुकरण करते-करते नकलची बन गये हैं हम, शिल्पा के साथ क्या हुआ…
उन्होनें कहा मैं भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हूँ और आप भी देखें हम कितने Modern
हो चुकें हैं, किंतु वे किस आधुनिकता की गुहार लगाने गईं हैं, वही... जहाँ लज्जा व स्थिरता है
ही नहीं यह सोचनीय पहलु है; जिस विवेकानंद ने 1893 शिकागो में भारत की सांस्कृतिक
संस्कारों को गौरवान्वित किया था,जहाँ विश्व के अनेकों महान चिंतकों ने उठकर, अंतत:
अभिनन्दन किया……।क्या लगता नहीं उस स्तर को हमने कितना उठाया है…, हमें
अपनी माँ के उपर गर्व होने की बजाए शर्म आती है आज...धिक्कार है ऐसे सपूतों पर...।
पंजाबी-मराठी, बंगाली-राजस्थानी, बिहारी आदि में कौन सम्पन्न...होड़ लगी है। मात्र
हमारा स्वरुप निर्मम दया की अभिव्यक्ति बोल रहा है,इतने सालों में देश की राजनीति
भ्रष्ट आचरण के मनुष्यों की बेढ़ियों में जकड़ चुका है---नीजी स्वार्थों की पूर्ति में देश और
समाज क्षेत्रवाद- जातिवाद- संप्रदायवाद में बुरी तरह झुलस रहा है,मूल्य गिरते जा रहे हैं,
हमारी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक मूल्य खंडित होकर राजनीतिक बजबजाहट में
डूब रही है। हमें यहाँ तक अपनी भाषा-संस्कृति-साहित्य-परंपरा और राष्ट्रीयता के प्रति
गौरव बोध रहा ही नहीं।
कहते हैं मीडिया हर देश की आँखे होती है पर यहाँ तो वह भी
पहले अपना अस्तित्व खोज रही है--कई जगहों पर मैंने देखा है,काफी बड़े-बड़े लोगों का
Interview लिया जाता है लेकिन यह वे लोग हैं जिसने आम आदमी से अपने को जोड़ा
ही नहीं है उनकी बातो को अगर सुनें, देश का सच Five Star Hotel और इनके जश्न में
छुपा होता है। The problem of indian elit class is only that कि वो जब तक आम होते
है विचारवान होते है जैसे ही उपर स्तर पर पहुँचते हैं अपना वह चोला उतार फेंकते हैं,
विदेशी लिबास,विदेशी भाषा, विदेशी संस्कार और भारतीयता एक शर्मनाक......।बाहर से
हम चाहें जितना समृद्धि का डोंग कर लें अपनी अस्मिता को निरंतर खोते ही जा रहे है।
राखी सावंत, दीपल शाह आदि अगर आज के युवावर्ग की Role Model हों तो समझा जा
सकता है की तस्वीर कैसी है--इस रुप मे INDIA को भी बदलकर AMRENDIA रख देना
चाहिए और कहना चाहिए कि न अच्छा लगे तो कान बंद कर लो...!याद रखें की जिस
Poised India और Incredible India की तस्वीर हम पेश कर रहे हैं वह ,वह आधुनिकता
नहीं है जो वाह्य दिखावों पर टीका है…वह्…तो शौम्य भारत का…गंभीर सर्वसमावेशीत
आत्माभिमान है। और निश्चित हीं हम इसे अलग पहचान,अलग आलिंगन दे सकते हैं…॥

"हमें कुछ नाज़ है... इस माटी पर कुछ गर्व छुपा है इसमें
मेरा दिव्य- भारत महान... कुछ कर्ज चुकाना है तुझ-पे...
बदल डाली है तेरी आवरु... को एक ऐसे महफील में
झुकी हैं टूट कर पलकें... कहीं उन्हीं के दामन पर
हमें तो याद ही नहीं... हमारी यही वह माता है
यही उसका आँचल है यही उसकी लाज...पड़े हैं फूल
उसके...शहीदों की शाहादत पर...खिलेंगे फूल चौखट
पर मुझे मालूम है एक दिन...कहीं तो अंत होगा ही...
हमारी वासनाओं का...है सलाम उसे जो मेरा है हमारा है
शायद अपनों से भी थोड़ा ज्यादा ही प्यारा है...। "

हमारा देश…हमारा हक, हमारा विश्वास, हमारी पहचान है…
3:33 PM
Post Was Published On

3:33 PM

Divine India

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