मैं हूँ यही मेरा है नव-निर्माण…



नियती नहीं मेरा किसी सोये हुए इतिहास का
उद्घोषणा प्रकृति का नवीन वर्तमान हूँ…

मन की उदास वृत्ति बेचैन शोक का नाद नहीं
राह दृष्टांत धवल ज्योति का पूँज हूँ

गहन अंधकार निस्तेज आवरण अविद्या शरणार्थी नहीं
प्रस्फुटित काया प्रज्ञा भूषित क्रांति का पुत्र हूँ

हारा हुआ संग्राम कोई मृतकों की परिपाटी नहीं
शिखर मुकुट उद्देश्य जीत का जागा हुआ कटाक्ष हूँ…

पंचरत्नों की माया मात्र जीव सकल निर्माण नहीं
निर्गुण शांत प्रार्थना का परम आनंद हूँ…

मात्र मृदा की संतान उसकी तामसी चेतना नहीं
थोड़ा उपर बहुत उपर अनंत का विस्तार हूँ…

क्रंदन कोलाहल सृष्टि का केवल पंख नहीं
सात्विक प्रेम परमात्मा का अद्भुत श्रृंगार हूँ

विपद तपस्चर्या शून्य योग खंडित जिज्ञासा स्वयं नहीं
जीवन में बहता राग-उल्लास…महान संन्यासी हूँ मैं…।

13 comments:

राकेश खंडेलवाल said...

मेघों के कफ़न ओढ़ चन्दा ढाया करता था सितम कभी
सांसों के गर्म समन्दर एं रहती थी नर्म चांदनी भी
हममें भी थ वह जोश, आशिया~म रचने का संकप्ल युवा
कटु प्यास, गये मधुमासों का अनुभव, हासों परिहासों का
सूरज ने हमसे पूछा था, जगने वाला है कब जहान
हम आदी थे अंधियारे के , हम वहीं रहे बदला वितान
हम आदी थे अंधियारे के, अब भी आदी अम्धियारों के
हम राजपथों से विमुख रहे, हैं दीवाने गलियारों के

premlata said...

बहुत दिन बाद !!!

Parul said...

पंचरत्नों की माया मात्र जीव सकल निर्माण नहीं
निर्गुण शांत प्रार्थना का परम आनंद हूँ…

कितनो को आत्मज्ञान हो पाता है ऐसा?जिन्हे होता है वही इतना प्रखर व्यक्त कर पाते हैं शायद्…आभार- ज़माने बाद आपको पढ़ा आज--

रचना said...

बहुत दिन बाद !!!

Reetesh Gupta said...

पंचरत्नों की माया मात्र जीव सकल निर्माण नहीं
निर्गुण शांत प्रार्थना का परम आनंद हूँ…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है दिव्याम भाई...रचना और शब्द दोनो ही गहरे हैं.. बधाई

DR.ANURAG ARYA said...

बहुत देर तक जाने क्या सोचता रहा ....आपको पढ़कर पता नही आपने इतना सोचा था की नही .....पर आपकी रचना अदभुत है....बधाई

rakhshanda said...

bahot achhi lagi par is se pahle vaali is se bhi achhi thi..

रवीन्द्र प्रभात said...

जीवन का सुंदर सच प्रस्तुत किया है आपने ,शब्द और कथ्य में गज़ब का तालमेल ,सुंदर अभिव्यक्ति , बधाईयाँ !

aditinandan said...

adbhut!
gazab ka oz aur gazab ki bhavabhivyakti...shabd ki seema ke karan purn roop se kuch bhi kehna is shashwat pravah ko baandh dene jaisa hoga...

महावीर said...

दिव्याभ
बहुत ही सुंदर रचना लगी। प्रत्येक पद की पहली पंक्ति में जीवन के सुख-दुखमयी अनुभूतियों के चित्र बड़ी कुशलता से अंकित किए हैं और विशेषता यह है कि कहीं भी पलायनवादी स्वर नहीं सुना।
नव-अभिव्यंजनावाद का अच्छा उदाहरण है जहां अभिव्यंजना की अनूठी पद्धतियों और नई नई उक्तियोंका उपयोग किया है। शब्दों का चुनाव भावानुकूल हुआ तथा शब्द-विधान उच्च कोटि का है। कहीं कहीं अर्थ-क्लिष्टता भी आ गई है किंतु
काव्य-सौष्ठव, उसकी सरसता एवं उत्कृष्टता में कोई बाधा नहीं है और सर्वत्र एक प्रौढ़ शैली के दर्शन होते हैं।
महावीर शर्मा

अनूप भार्गव said...

बहुत सुन्दर रचना, दिव्य अनुभूति से परिपूर्ण।

रजनी भार्गव said...

आपकी पूरी कविता बहुत सुन्दर है खासतौर पर
ये पंक्तियाँ,
मन की उदास वृत्ति बेचैन शोक का नाद नहीं,
राह दृष्टांत धवल ज्योति का पूँज हूँ

कुमार आशीष said...

परमात्मा का अद्भुत श्रृंगार हूँ...
सुन्‍दर बधाई।