न देखे विश्व पर मुझको घृणा से, मनुज हूँ सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं।
सुनूँ क्या सिंधु!! मैं गर्जन तुम्हारा स्वयं युग-धर्म का हुंकार हूँ मैं।
इन पंक्तियों की प्रखरता को देखकर सहज ही अनुमान लगाया
जा सकता है कि मैं बात किसकी करने वाला हूँ… इसकारण
बताना भी उचित नहीं समझता… आप स्वयं विद्वान हैं।
बड़े दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि इतना बड़ा आयोजन
दिल्ली शहर में ही हुआ और सभी ब्लागर मित्र इससे वंचित
रह गये… मैंने काफी प्रयास किया कि आप सभी को
अवगत कराया जा सके पर सभी व्यर्थ। मैंने चिठ्ठाकार
को कम से कम 5-6 पत्र लिखे होंगे पर वह क्यों नहीं पहुंच पाया,
एक हास्यास्पद स्थिती उत्पन्न करता है… नित्य दिन
एक हल्की सूचना देता पत्र भी मेल बाक्स में आ जाता
है मगर जब इस आयोजन की सूचना मैं………???
कुछ लोगों के Email मिल जाने के कारण मैं व्यक्तिगत
रुप से संपर्क साध पाया…कुछ आये भी…।
मेरा उद्देश्य मात्र यह था कि राष्ट्रकवि दिनकर पर,
जिनके भी अच्छे काम हों वह अपनी लेखनी भेज सकें…
स्मारिका "समर शेष है" के लिए जिसमें स्वयं प्रधानमंत्री और
कई सारे मंत्रीगण ने अपना बौद्धिक सहयोग दिया है…
इस विचित्र स्थिती पर एक ही पंक्ति याद आती है---
"सच है, सत्ता सिमट-2 जिनके हाथों में आयी
शान्तिभक्त वे साधु-पुरुष क्यों चाहें कभी लड़ाई???"

इस समारोह का उद्घाटन स्वयं माननीय गृहमंत्री जी
ने किया…।

मुरली मनोहरजोशी, शिंदे जी, वशिष्ठ नारायण सिंह,
पूर्व सांसद डा0 रत्नाकर पांडे व श्री अरुण कुमार आदि कई
महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने भाग लिया…।

ज्योति प्रज्वलन कार्यक्रम माननीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल
के कर-कमलों द्वारा…।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मारिका " समर शेष है…"
का विमोचन।

इस स्मारिका में मेरी भी कविता "दिनकर-एक बलंद आवाज"
को जगह मिली साथ ही हमारी प्रिय ब्लागर एवं प्रेम शिक्षिका
रंजना भाटिया जी ( रंजू) की भी रचना प्रकाशित हुई है…।

"मानव जब जोर लगता है,
पत्थर पानी बन जाता है।"
काफी बड़ी संख्या में सरल और विद्वत-जनों ने भाग लिया…।

"शान्ति खोलकर खड्ग क्रांति का जब वर्जन करती है,
तभी जान-लो, किसी समर का वह सर्जन करती है…।"
जैसी महान गीत रचना का आनंद उठाते जन…।

"मैं विभा-पुत्र जागरण गान है मेरा
जग को अक्षय आलोक, दान है मेरा।"
समारोह का अंत भी होना ही था… जब गीता का
अंत आ गया तो यह तो आम सभा ही थी…

पापी कौन? मनुज से उसका न्याय चुरानेवाला?
या कि न्याय खोजते विघ्न का शीश उड़ानेवाला?

इस चित्र में मेरा अपना परम प्रिय अनुज अदिति नंदन जी
( दाहिने से चौथे मुंड चश्मा लगाए), तथा इस समारोह के
प्रमुख आयोजक श्री नीरज जी (अध्यक्ष, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह
दिनकर स्मृति न्यास)…तस्वीर में बांयें से दूसरे व्यक्ति।

इसप्रकार से समारोह का अंत हुआ तथा मिडिया वालों
ने भी काफी सहयोग दिया सहारा समय, दूरदर्शन, जी न्यूज
E tv से इसका सीधा प्रसारण किया जा रहा था तथा आज तक
और स्टार न्यूज से खबरें दिखाई गईं। जिसप्रकार राष्ट्रकवि
"दिनकर" को लोगों ने याद किया वह अद्भुत था…।
मैं तो हमेशा ही यही कहता आया हूँ कि---
"वह कवि नहीं उन जैसे जो नारी में एक नई नारी
प्रकृति में भी सुंदरा नारी ही देखा करते थे…
वह कवि नहीं महाकवि थे जो जन-जन में
हुंकार देखा करते थे… भारत का नव -भविष्य
कंप- कपाते लबों पर ओज घोला करते थे…।"
दिनकर जी की एक सुंदर पंक्ति से इसका अंत करना
चाहूंगा…
"फूलों की क्या बात? बाँस की हरियाली पर मरता हूँ।
अरी दूब, तेरे चलते, जगती का आदर करता हूँ।
इच्छा है, मैं बार-बार कवि का जीवन लेकर आऊँ,
अपनी प्रतिभा के प्रदीप से जग की अमा मिटा जाऊँ॥"
वैसे दिसम्बर माह में नीरज जी ने लाल किला
में पुन: इसका अयोजन करने का निर्णय लिया है
जिसका शुभारंभ प्रधानमंत्री जी के हाथों द्वारा किया जाएगा…
इसके लिए अभी से तैयारी
शुरू कर दी गई है…।
पता नहीं कुछ तकनीकी कारणों से मेरी पहले की रचना मिट गई…
चूंकि मैं अभी अपनी पहली Short Film ---
"The Man In The Mirror" की वजह से काफी
व्यस्त चल रहा हूँ… ब्लाग पर भी आने का मौका
कम ही मिल पाता है… उपर से पुरानी रचना मिट गई
खैर कुछ-2 तो लिखता ही रहेगा मन।
सुनूँ क्या सिंधु!! मैं गर्जन तुम्हारा स्वयं युग-धर्म का हुंकार हूँ मैं।
इन पंक्तियों की प्रखरता को देखकर सहज ही अनुमान लगाया
जा सकता है कि मैं बात किसकी करने वाला हूँ… इसकारण
बताना भी उचित नहीं समझता… आप स्वयं विद्वान हैं।
बड़े दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि इतना बड़ा आयोजन
दिल्ली शहर में ही हुआ और सभी ब्लागर मित्र इससे वंचित
रह गये… मैंने काफी प्रयास किया कि आप सभी को
अवगत कराया जा सके पर सभी व्यर्थ। मैंने चिठ्ठाकार
को कम से कम 5-6 पत्र लिखे होंगे पर वह क्यों नहीं पहुंच पाया,
एक हास्यास्पद स्थिती उत्पन्न करता है… नित्य दिन
एक हल्की सूचना देता पत्र भी मेल बाक्स में आ जाता
है मगर जब इस आयोजन की सूचना मैं………???
कुछ लोगों के Email मिल जाने के कारण मैं व्यक्तिगत
रुप से संपर्क साध पाया…कुछ आये भी…।
मेरा उद्देश्य मात्र यह था कि राष्ट्रकवि दिनकर पर,
जिनके भी अच्छे काम हों वह अपनी लेखनी भेज सकें…
स्मारिका "समर शेष है" के लिए जिसमें स्वयं प्रधानमंत्री और
कई सारे मंत्रीगण ने अपना बौद्धिक सहयोग दिया है…
इस विचित्र स्थिती पर एक ही पंक्ति याद आती है---
"सच है, सत्ता सिमट-2 जिनके हाथों में आयी
शान्तिभक्त वे साधु-पुरुष क्यों चाहें कभी लड़ाई???"

इस समारोह का उद्घाटन स्वयं माननीय गृहमंत्री जी
ने किया…।

मुरली मनोहरजोशी, शिंदे जी, वशिष्ठ नारायण सिंह,
पूर्व सांसद डा0 रत्नाकर पांडे व श्री अरुण कुमार आदि कई
महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने भाग लिया…।

ज्योति प्रज्वलन कार्यक्रम माननीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल
के कर-कमलों द्वारा…।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मारिका " समर शेष है…"
का विमोचन।

इस स्मारिका में मेरी भी कविता "दिनकर-एक बलंद आवाज"
को जगह मिली साथ ही हमारी प्रिय ब्लागर एवं प्रेम शिक्षिका
रंजना भाटिया जी ( रंजू) की भी रचना प्रकाशित हुई है…।

"मानव जब जोर लगता है,
पत्थर पानी बन जाता है।"
काफी बड़ी संख्या में सरल और विद्वत-जनों ने भाग लिया…।

"शान्ति खोलकर खड्ग क्रांति का जब वर्जन करती है,
तभी जान-लो, किसी समर का वह सर्जन करती है…।"
जैसी महान गीत रचना का आनंद उठाते जन…।

"मैं विभा-पुत्र जागरण गान है मेरा
जग को अक्षय आलोक, दान है मेरा।"
समारोह का अंत भी होना ही था… जब गीता का
अंत आ गया तो यह तो आम सभा ही थी…

पापी कौन? मनुज से उसका न्याय चुरानेवाला?
या कि न्याय खोजते विघ्न का शीश उड़ानेवाला?

इस चित्र में मेरा अपना परम प्रिय अनुज अदिति नंदन जी
( दाहिने से चौथे मुंड चश्मा लगाए), तथा इस समारोह के
प्रमुख आयोजक श्री नीरज जी (अध्यक्ष, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह
दिनकर स्मृति न्यास)…तस्वीर में बांयें से दूसरे व्यक्ति।

इसप्रकार से समारोह का अंत हुआ तथा मिडिया वालों
ने भी काफी सहयोग दिया सहारा समय, दूरदर्शन, जी न्यूज
E tv से इसका सीधा प्रसारण किया जा रहा था तथा आज तक
और स्टार न्यूज से खबरें दिखाई गईं। जिसप्रकार राष्ट्रकवि
"दिनकर" को लोगों ने याद किया वह अद्भुत था…।
मैं तो हमेशा ही यही कहता आया हूँ कि---
"वह कवि नहीं उन जैसे जो नारी में एक नई नारी
प्रकृति में भी सुंदरा नारी ही देखा करते थे…
वह कवि नहीं महाकवि थे जो जन-जन में
हुंकार देखा करते थे… भारत का नव -भविष्य
कंप- कपाते लबों पर ओज घोला करते थे…।"
दिनकर जी की एक सुंदर पंक्ति से इसका अंत करना
चाहूंगा…
"फूलों की क्या बात? बाँस की हरियाली पर मरता हूँ।
अरी दूब, तेरे चलते, जगती का आदर करता हूँ।
इच्छा है, मैं बार-बार कवि का जीवन लेकर आऊँ,
अपनी प्रतिभा के प्रदीप से जग की अमा मिटा जाऊँ॥"
वैसे दिसम्बर माह में नीरज जी ने लाल किला
में पुन: इसका अयोजन करने का निर्णय लिया है
जिसका शुभारंभ प्रधानमंत्री जी के हाथों द्वारा किया जाएगा…
इसके लिए अभी से तैयारी
शुरू कर दी गई है…।
पता नहीं कुछ तकनीकी कारणों से मेरी पहले की रचना मिट गई…
चूंकि मैं अभी अपनी पहली Short Film ---
"The Man In The Mirror" की वजह से काफी
व्यस्त चल रहा हूँ… ब्लाग पर भी आने का मौका
कम ही मिल पाता है… उपर से पुरानी रचना मिट गई
खैर कुछ-2 तो लिखता ही रहेगा मन।













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