"सच तो ये है कि हम अपने अंतस की आकांक्षाओं से
आगे कुछ-भी नहीं देख पाते; सचमुच...ये निगाहें
ही हमारी पथप्रदर्शक हैं, इन मन की विभूतियों से
आगे न हम कुछ जान पाते हैं और न ही समझ पाते हैं,
जिसने परम अनुभूति की आकृति को अपने अंतस में
स्थान दिया ही न हो वह नास्तिकता के पथ पर चला जाए,
कोई आश्चर्य नहीं. काम-ज्वाला और भौतिक-आवरण ने
इंसान के भीतरी चक्षुओं को इस तरह से कैद कर रखा है
कि स्वतः यह आभास होता है-- मेरा दृष्टिकोण ही सत्
और सर्वमान्य है किंतु यह सोंच गलत या सही नहीं है,
अंधकार मात्र इसकारण से है क्योंकि दूसरा मत भी हो
सकता है, इसे नकारते हैं-- मन की वास्तविक दुनियाँ को
अगर विस्तार दे सकें तो बाह्य सत्ता अपने-आप बृहत हो
जाएगी."
Tuesday 2 January 2007
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4 comments:
बढियां ज्ञान की बात. धन्यवाद.
बहुत अच्छी-अच्छी बताते हैं आप चिन्तन में। धन्यवाद !
नववर्ष की शुभकामना यदि पहले नहीं दे पाया होऊं।
अभी से इतना गहन चिंतन.....
nihsandeh aapki bhavana chintan ke madhyam se nikalti dikhai deti hai,per itni gehanta...aap badhai ke patr hain..
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