Saturday 26 February 2011

Broken Eyes 1












गहरे आकाश पर चलकर फिसल गया हूँ कई बार,
उदास नम आँखों से टपक गया हूँ कई बार,
तन्हाइयाँ बेचैन कर जाती हैं या बेचैनी में तन्हा रह जाता हूँ कई बार…
बहुत सोंचा… बहुत चाहा…
कोई दर्पण उठाकर देखूं खुद को, थोड़ा अपने से समझूं खुद को…
मगर ज्योंही उठाया, दर्पण चनक गया…
अफसोस मेरा थोड़ा हिस्सा और भूला रह गया…
और भूला रह गया…।

2 comments:

आशा जोगळेकर said...

ये फिसलना, बरसना, टपकना सार्थक हो जाता है जब किसी और के लिये हो ।

Divine India said...

true