Satyagraha औR महात्मा…।

Satyagraha R महात्मा…।

राष्ट्रपिता…महात्मा…गांधी…'बापु'…भारतीय इतिहास के
महानतम व्यक्तित्व…विश्व नेता…दार्शनिक व एक प्रवर्तक…
जिन्होंने मंथन कर 'सत्याग्रह' (सत्य का आग्रह करते हुए किसी
भी परिस्थिती का मुकाबला करना…Total devotion surrender to
the will of Truth...
No matter!Come what may I stick to the honesty of Truth.) के आधार पर विश्व को अनूठा मार्ग दिया
की अहिंसा के आधार पर 30cr जनता को बांधा जा सकता
है…जन-आंदोलन के लिए। इससे पूर्व किसी प्रवर्तक या भारतीय राजनेताओं ने ऐसा नहीं कहा था…।

क्रांति हो सकती है…! बिना वर्ग-संघर्ष के;
वर्ग-विहिन क्रांतिका बिगुल फूंका…बापु यह जानते थे कि इन सबों में कुछ तो साम्यता होगी,जो सहयोग का आधार बन सकता है…वे राजनैतिक आधार पर संघर्ष नहीं चाहते
थे…उनका आधार था 'सत्याग्रह' पर आधारित शाश्वत नैतिक विचारधारा। एक ऐसी
प्रणाली जो विशेष वर्ग का हृदय परिवर्तन कर सहयोग के लिए वाध्य कर दे…
यानि हृदय परिवर्तन के आधारपर क्रांति !!!


हिंसा के आधार पर सामान्य जन को आकर्षित नहीं किया जा
सकता था…जबकि विभिन्न वर्गों को अहिंसा के माध्यम से जोड़ा जा सकता था; इसी यथार्थवादिता ने महात्मा को व्यापक जनाधार दिया उस समय जब यह देश टुकड़ों में
बँटा था।गांधी जी ने 'सत्याग्रह' के आधार पर जन-आंदोलन का चित्र खींचा-----
"एक नियंत्रित जन-आंदोलन" जिसमें साहस व समग्रता हो किंतु प्रहार के लिए नहीं…सहनशीलता के लिए।

साध्य कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो लेकिन साध्य की श्रेष्ठता का यही प्रभाव
हो सकता है…साधन की श्रेष्ठता…,तात्पर्य यदि साधन श्रेष्ठ होगा तो विचार पवित्र होगा…
कार्य में शुद्धि आएगी…क्योंकि जलता हुआ भारत जलती मानसिकता से नहीं बुझ सकता था।वे सहयोग के आधार पर परिवर्तन कर रहे थे…एक ऐसा साहस…! जो विपक्ष को भी अपनी रणनीति बता दिया करते थे…यहाँ तक की जगह और तारीख कि वो क्या करने
वाले हैं---यह थी उनके रणनीति की पारदर्शिता!!!
.....
महात्मा यह जानते थे कि किसी आंदोलन को दीर्धावधी तक नहीं ले
जाया जा सकता है क्योंकि कृषक-कामगार को काम के लिए बाध्य रुप से जाना
पड़ता है, इससे पहले कि जन-आंदोलन स्पष्टत: विफल हो वे पहले ही सफलता के
चरमविंदु पर वापस ले लेते थे…"उनके विचारों में एकप्रकार का लचीलापन था"…
आंदोलन वापस लेने के उपरांत भी वे संवाद के लिए तैयार रह्ते थे…यानि
संवाद से क्रांति!!!

आंदोलन की असफलता के बावज़ूद वे असफल नहीं कहे जा सकते…
क्योंकि विश्व इतिहास में इसप्रकार का यह प्रथम अहिंसात्मक आंदोलन था जिसमें
सभी-ने मिलकर हिस्सा लिया था जो निश्चय ही अद्भुत था…।साम्राज्यवाद के अंत
के उद्देश्य के साथ-साथ सुधारों का प्रयास किया जा सकता है…यह था 'सत्याग्रह' का रचनात्मक स्वरुप। मैं अभी-भी यही सोंचता हूँ कि गांधी जी को अंग्रेजों ने मार क्यों
नहीं दिया.…?द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब गांधी जी जेल में थे उस समय "चर्चिल"
ने कहा था कि यह "नंगा फकीर" अबतक मरा क्यों नहीं…।लेकिन गांधी जी के लाख
उकसाने पर भी अंग्रेज यह जानते थे कि यह "मलंग बाबा" दो निशाना साध कर बैठा
है…एक कि अगर उनकी मृत्यु अंग्रेजों के हाथों हुई तो यह व्यापक जनाधार उनको पूरी
तरह से बाहर खदेड़ देगा…गांधी की मृत्यु अर्थात अंग्रेजों की मृत्यु; नहीं तो आजादी तो मिलनी ही थी…तो क्यों नहीं ज्यादा से ज्यादा लोगों को खुन खराबे से बचाया जाए…
यह थी उनकी युद्ध नीति!!!


युवा Suppression को वह समझते थे कि यह वर्ग असहनशील होता
है…जिसे ज्यादा दबाया नहीं जा सकता…'भगत सिंह ' भी तो असहयोग आंदोलन की
असफलता की उपज थे…जिसे इस आंदोलन ने मार्ग दिया बढ़ने का…वे जानते थे कि
फांसी पर चढ़कर आजादी नहीं मिल सकती…हमें आंदोलन को पूरा करना है वैसे भी
भारत एकराष्ट्र नहीं बना है अगर नेतृत्वकर्ता ही न रहे तो आंदोलन को विखंडित होने
में कितना समय लगेगा… अपने सिद्धांतों के सहारे आजादी को छूना बहुत अलग है…
जिन लोगों ने कुर्बानियाँ दी महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के द्वारा उन सभी को
श्रद्धांजलि दी.…!!!

इंसान चाहे जितना ही महान क्यों न हो वह हमेशा अधूरा ही होता
है…।गलतियाँ हर इंसान से होती हैं, एक सामान्य आदमी की गलतियों को कोई
नहीं देखता पर बड़े लोगों की छोटी गलतियाँ भी बहुत बड़ी दिखती है---हमें यह
नहीं भुलना चाहिए कि वे हमारी तरह बिल्कुल सामान्य मानव थे।
उनका 'सत्याग्रह'…सृजनात्मकता का अनमोल दृष्टांत था…समन्वय
सहृदयतासंयमसमानतामर्यादा उनके दर्शन का मूल था वे स्पष्टत: जानते
थे कि जबतक समन्वय नहीं होगा शांति नहीं आएगी…॥


"दर्शन जिनका काल से आगे…सत्य था पीछे-पीछे
टेक चला था राम रे…
नि:संग अहिंसा की कर्मठता का पाठ पढ़ाते अपने
जीवन काल में…
जिसके निर्भीक पांव से पड़ा मलीन था क्षत्र ब्रिटिश
का राज रे…
भारत के क्षितिज पर बनकर पिता चंदा के जैसे चमकते
हैं बापु बनकर राम रे…
अनुनयपूर्वक लड़ा संग्राम, उतार फेंका अपने चीवर को
मानवता के आदर्श में…
दिया विश्व को अनूठा ज्ञान ऐसे थे वह महात्मा.…
जिनकी दुनियाँ करती गान रे…
सभी आधारों का समन्वय कर दे दिया वतन आजाद
हमारे हाथ रे…
वे महान नहीं आदर्श ,गर्व- स्वाभिमान यही थी उनकी
पहचान रे…
वह मानव थे या महा-मानव पर थे
भारत के लाल रे…
आओ याद करें उस पुण्य आत्मन को
शत-शत नमन आदर-प्रणाम के साथ रे…
कि विश्वास हो पर्वत के जैसा जो ढ्केले
चक्रावात रे…
पूरा हो लक्ष्य हमारा बढ़े देशाभिमान रे…"

13 comments:

Shrish said...

सुन्दर लेख में गांधीदर्शन का सार लिख दिया आपने। गांधी जी को हार्दिक श्रद्धांजलि। कोई उनसे लाख असहमत हो लेकिन उनकी देशभक्ति और प्रभाव को नहीं नकार सकता।

rachana said...

दिव्याभ, आपके चिट्ठे की इमानदारी की मै कायल हूँ..लेकिन टिप्पणी मे क्या लिखूँ समझ नही पाती..

Divine India said...

पंडित जी नमस्कार,
सही समझा आपने…धन्यवाद करता हूँ मेरी मनोदर्शन को मह्सूस किया…

रचना जी,
आपने ऐसे शब्द ही कह दिए जो मेरे लिए Compliment है कुछ न कह्ते हुए भी बहुत कह दिया…धन्यवाद जो, मुझे सराहा!!

Udan Tashtari said...

बहुत डूब कर पढ़ा, आनन्द आया. ऐसे ही लिखते रहें. शुभकामना.

manya said...

Pata nahin kya kahun divya.. bas itna ki us mahamaanav ko sahstron baar naman aur tumhe naekanek dhanyawaad.. itni spashtataa aisi imaandaari... really gr8ful.. it touch the soul dear..

संजय बेंगाणी said...

अच्छा लेख. बधाई. कोई शक नहीं गाँधीजी महानत्तम नेता थे.

गाँधीजी को अंग्रेजो ने इसलिए नहीं मारा क्योंकि जिंदा गाँधी से मरा गाँधी ज्यादा नुकसान पँहूचाता.

Beji said...

बहुत अच्छी...और एकदम ईमानदार पोस्ट !!

Divine India said...

समीर भाई,
धन्यवाद जो इतना डूब कर पढ़ा मेरा लिखना सफल हुआ…।

संजय जी,
गाँधी तो महान थे ही उनके कर्म पूजनीय थे…मरे हुए गाँधी ज्यादा नुकसानदेह होते यही तो मैने भी कहने की कोशिश की है…आने बहुत-2 शुक्रिया…।

Beji Ji,
कोशिश की थी की तटस्थ रहूँ लगता है सफल रहा हूँ
धन्यवाद।

Manya,
Thnx 4 ur gr8 compliment.

ranju said...

aapka likha padh ke ek nayi soch aur likhne ki nayi disha milti hai....bahut hi achhe se aapne apne vichaaro ko vayakat kiya hai ....shukriya !!

Divine India said...

Thanku Very Much Ranju!

antarman said...

दिव्याभ जी,
नमस्ते !

आपका लिखा गाँधी जी पर पढा
- सही विश्लेशण किया है
- बापू का समस्त जीवन, पारदर्शक, रहा !
उनकी सूझबूझ, बनिया कौम की सी व्यवहार कुशल थी --

काश, हम भारतीय, उनके जीवन से सीख लेकर बस अमुक अँश ही उन सा, कार्य कर पायेँ तब भी वह एक उपलब्धि रहेगी --

अच्छा किया जो आपने मेरे इस "अन्तर्मन " ~जाल घर " का लिन्क आपके ब्लोग पर रखा --

आपकी प्रतिक्रियाओँ के लिये भी
धन्यवाद !

स - स्नेह,
लावण्या

Divine India said...

Hello Madam,
Thanku for ur coming...n if u really think this one is good than my write ups gets its top.

aditi nandan said...

ah!so beautiful n honest work..hats off to u.u knew that i hvbeen awarded for my writesup on Gandhiji many times but frankly admitting i was no where closer to this work of urs.it's been very easy to abuse MAHATMA now days,it's in fashion..people with no knowledge speak more profoundly on him..but U did a tremendous job by putting things in different yet right perspective..
gr8 work bhaiya..wish u all luck..n expect u to write more on this issues.i know u r richly endowed with in depth understanding,analysis n language.