पुत्र का ख़त पिता के नाम…!!!



अनायास ही मन हो आया लिखूं आपको
अपनी भाषा का एक ख़त, पिता हैं आप !
शायद समझेगें पुत्र का दर्द…।

आज जाकर वह वेला आई है जब
उभरे है कागज पर अक्षर…
मेरे परम आदरणीय पिता श्री,
कैसे हैं आप!

जमाना बदल गया…हमारा साथ बदल गया,
तरीके और हालात बदल गए…
बाते तो दूरभाष पर हो ही जाती थीं
आप भी सोंचेगे यह पत्र मैं लिख रहा हूँ…क्यों ?

मगर शब्दों की आकृति में जो भावनाएँ
उठती हैं वह कलमों के सहारे पन्नों पर
छपती जाती हैं…
लिखते हुए कम-से-कम एहसास में डूबा
होता हूँ…इसकारण मैं यह पत्र लिख रहा हूँ।

लाख हठ थे मेरे, कुछ जो मेरे लिए होते थे
और कई जिसे करने को चाहता था यह 'मन'
उस पर आपका अंकुश बहुत बुरा लगता था…

स्कूल में जब मैं भटकता जा रहा था,
अपने रास्तों से लगातार दूर होता जा रहा था…
उस वक्त मेरा हाथ थाम कर या यों कहें
मेरा लक्ष्य टांग कर कंधों पर, पाने को
मंजिल रास्ता आंखों में दृष्ट किया.…

बढ़ता आकार मेरा चिंता बढ़ा रहा था…
जिस प्रदेश (बिहार)का था विद्यार्थी…वहाँ
अवसरों की कमियाँ आपका हृदय व्यथित
कर रहा था…

मैं जो था आपके सपनों का पंछी…जो
पूरा कर सकता था सारे अधूरे सपने को…
इसलिए भेजना चाहते थे कोई और परदेश
को…सुना दिया "माँ" ने आपकी बड़ी आकांक्षा
को और देख रहा था उस परदेश में,
अनेकानेक हाथों से खुद को होता तौल।

सहमा था मैं डरा हुआ…भीतर-भीतर आँसू थे,
वह वक्त भी जल्द आ गया जब मैं रेलगाड़ी
पर बैठा खिड़की से हाथ हिला रहा था…आज
सभी को छोड़ मैं कहीं और जा रहा था…
खुद को अकेला महसूस कर आपको
मन-ही-मन बहुत कोस रहा था…

आखिरकार उतर आया मैं अलबेले महफिल में,
बदला हुआ नजारा…परिवेश बदला था…
भाषा बदल गई थी…सब नया-नया सा था…
आँखें चमक जाती थीं दर्पण उभरा आता था

अपने कोमल हृदय पर अब बोझ महसूस
कर रहा था,जिम्मेदारियों को लाद कर यहाँ
जो आ पहुँचा था…सच करने को वह अधूरा सपना!

वक्त और स्थान बदला तो ढंग बदला रंग और
सैलाव भी…मैं उमंगों की धुन में बढ़ता चला गया
और पीछे छोड़ आया आपके पुराने क्षण…

अब आपके विचार मेरे सिद्धांतों को गवारे नहीं थे,
मैं यह समझने लगा था, अब जमाने की मैं तस्वीर
बनाऊँगा…अब आपके सपनों में कोई करतब नहीं
दिखता था.…

आया था मैं "IAS" बनने, जो बिहारियो का
सिद्ध अधिकार है…कई बार यहाँ की रंगीन छटा
में भटक भी जाता था…मगर 'कलक्टर' बनने के
जोश से दौड़ भी पड़ता था…

प्रोफेसर हैं आप और गुरु भी हैं
बनाना चाहते थे पुत्र को एक "IAS";
अब अलग तो होने थे न विचार हमारे
और अलग हो रहा था मैं…

घर की समस्त परेशानियों से दूर
न कभी पैसे - न कोई चिंता
जी लगा रहे पढ़ाई मे मेरा मात्र यही
थी न आपकी मंशा.…

सच कहूँ ! मैं अब सब भुला रहा था
ना ही पढ़ने से खुद को जोड़ पा रहा था
और ना ही आपको नजदिक लाकर कोई
अंकुश चाहता था…

कभी आश्रमों में कभी योगियों के
संगत में पड़ गया था मैं…पता नहीं क्यों
इस राह निकल आया था…

आया वह भी वक्त जब "IAS" बनने को मन
मचला और शुरु हुई तैयारी…कोचिंग जाने लगा
वहाँ भी मन भटकने लगा और मैं…
बालाओं के नाज़ उठाने लगा…।

घर से दूर आकर भी इतना गमगीन
कभी नहीं हुआ था…जितना उसे याद कर-करके
तकीया भींगोता था…रात-रात भर अंजनों में
उसको संवारा करता था…
प्रत्येक पल न जाने क्यों बेचैन सा रहता था।

लेकिन कभी न सोंचा, आपको "एक दिन" के किसी
अंतरे में…जिस सपने को पूरा करने आया था
भूला चुका था इस मैख़ाने में…

दो प्रयास तो ईमानदार था मेरा "IAS" का
उस वक्त साथ थी मेरी 'प्रेरणा' भी बहुत करीब से
मगर जो बीता वक्त था उसे लौटा न पाया मैं…।
मेरे जीवन का उद्देश्य बदल गया परिभाषाएँ
अलग हो गईं…

अब आपको याद करना भी बेईमानी लगता था,
कहाँ याद आता था वह सबेरा…जब परेशान होता
देख मुझे सीने में भींच कर पुचकारा करते थे,
बारिश में छाते को मुझपर डाल देते थे
गोद में मुझे उठाकर मीलों चला करते थे
मैं आराम से हाथों को झूला मान हिल्लोरियाँ
लेता था…

पर अब सबकुछ उलट-पलट गया है…किंतु
गुनहगार आपको भी मैं मानता हूँ…
क्यों नहीं फट्कारा आकर थप्पड़ की गुंज
क्यों नहीं सुनाई आपने…मुझे आपसे ज्यादा और
कौन जान सकता है…
हक है आपका इतना तो मुझपर वैसा ही जब
पहली बार स्टेशन पर गाड़ी चढ़ाया था…
क्यों समेट लिया उस हक को मुझ नादान की
भूलो से…

अत्यंत लज्जित हूँ मैं पिता जी…नहीं लाज
आपकी सपनों की रख पाया…
आपके सपनों का यह पंछी बहुत ऊँचा नहीं
उड़ पाया…।

लेकिन फिर भी मैं एक पंछी हूँ और
उड़ना मेरा धर्म…आसमान के उस छोर
तक तो नहीं पर पुन: नये ठौर को पाने
मैं कहीं और निकल गया………


आपका प्रिय आत्मजात
"दिव्याभ"

21 comments:

Swarna Jyothi said...

मित्र दिव्याभ
आप का चिट्ठा देखा पढा अच्छा लगा
आप की कविता पुत्र का खत पिता के नाम युवा मन के भावनाओं को प्रकट करती है
आप से एक बात कहनी है आप की कविताएँ लम्बी होती हैं और मैं चंद पँक्तियाँ ही लिखती हूँ
शायद मेरी हिन्दी इतनी अच्छी नही ंहै कि मैं आप के स्तर की कविताएँ समझ सकूँ
भाषा शैली और भाव का अति उत्कृष्ट संगम है आप की कविताएँ

महावीर said...

अंतरद्वंद्व का मार्मिक चित्रण किया है इस पत्र में! मन के विस्तृत अंतरिक्ष के अंदर
बादलों का गंभीर घोष गूंज रहा है। हृदय में गूंजने वाले दुःख, शोक, हर्ष, विषाद
आदि भावनाओं ने अंतर-द्वंद्व का रूप ले लिया है।
पिता जी अपनी जगह ठीक थे, किंतु उनके सपनों को तुम साकार ना बना सके तो इस
में लज्जा और खेद को जीवन के सुखद क्षणों में समावेश करना भी अनुचित है। यदि
'अतीत' का मन के संतुलन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तो उस 'अतीत' को भूलना ही
उचित है। भूतकाल कभी लौटता नहीं है।
दूसरी ओर भविष्य का निर्माण वर्तमान की दीवारों पर खड़ा होता है। अतः वर्तमान
की दीवारों को मजबूत और उपयोगी बनाओगे तो पिता जी का वह सपना तो नहीं किंतु
उसी के समानांतर अन्य सपने भी साकार बनाने का अवसर तुम्हारी झोली में है। यही तो पिता जी के
स्वप्न हैं कि तुम्हारा भविष्य उज्जवल हो।
महावीर

antarman said...

दीव्याभ,जी,
नमस्ते !

बडा मार्मिक लगा ये आपका पन्ना -- ह्रद्य द्रवित हो गया - जो हर सत्य अनुभूति की पहचान है --
आगे बढते रहो - खुश रहो , हमेशा -- देखो ना, महावीर जी कितने स्नह से ये जीवन के अनुभव सिध्ध गुर बता रहे हैँ तुम्हे !
महावीरजी की बातोँ को जावन मेँ स्थान दोगे तो अवश्य गति मिलेगी --
स स्नेहाशिष,
लावण्या

Divine India said...

स्वर्ण ज्योति,आप यहाँ आईं बहुत शुक्रिया--हाँ थोड़ी लम्बी कविता तो होती है मेरी लेकिन यह न कहें की आपकी हिंदी अच्छी नहीं है…भाषा का क्या है यह तो हाथ की कठपुतियाँ है प्रमुख तो गहरी भावना होती है…संगीत को थोड़े ही किसी काले अक्षर का मोहताज होता है वह तो हृदय आवृतियों को स्पंदित तरंगों के माध्यम से कर जाता है।

Divine India said...

महावीर सर नमस्कार,
अब क्या कहुँ!!आपकी यही दृष्टि मार्ग निर्धारण में हमेशा मेरी सहायता करती रहेगी…।जितना हो सका मैने सत्य को उजागर करने का प्रयास किया है…आपको अच्छा लगा…शुक्रिया!

Hello Lavanya Madam,
सर की बाते हमेशा एक अभिभावक की तरह संकेत करता रहता है…आप लोगों का आशीर्वाद रहा तो जिस मोड़ पर मैं चल रहा हूँ वह निश्चित ही मंजिल को पा लेगा।बहुत शुक्रिया!!

ghughutibasuti said...

दिव्याभ,
आपकी इस कविता ने मेरे माँ के मन को भिगा सा दिया । आपने पिता को लिखा है , किन्तु अधिकतर ऐसे पत्र जो कि लगभग सदा अनलिखे रहते हैं माँ की झोली के लिए होते हैं । अधिकतर पिताओं के पास अपने बच्चों के लिए स्वप्न देखने का समय ही नहीं होता । आप भाग्यवान हैं कि आपके पिता आपको लेकर स्वप्न देखते थे ।
दिव्याभ, आपके पिता के स्वप्न का लक्ष्य केवल एक कलैक्टर बनाना ही नहीं था, कलैक्टर एक चिन्ह था सफल होने का । आप कुछ भी बनें , यदि उसमें सम्मान है , आर्थिक स्वतंत्रता है , आपकी खुशी है तो वह आपके पिताजी को भी प्रसन्न कर देगी । वे केवल आपको सफल होते व आत्मगौरव से जीवन बिताता देखना चाहते होंगे ।
जीवन में बहुत सी राहें हैं जो आपको सफलता तक ले जाएँगी । राहें कभी बन्द नहीं होती , बस आपको उनमें से एक को चुनकर उसपर निरन्तर चलना है , लक्ष्य को सामने रखकर । ग्लानि को छोड़ दीजिये । ग्लानि जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप हैं ।
हाँ, यह पत्र आपका निजी न होकर किसी भी संतान का हो सकता है । ऐसे में आप शब्द को किसी भी संतान के लिए उपयोग किया जा सकता है ।
क्षमा करना, आपकी कविता ही कुछ ऐसी थी कि मैं इतना अधिक कह गई ।
माँ का हृदय समझ, क्षमा कर देना । मैंने भी एक कविता पुत्र के नाम लिखी है,जो परिचर्चा में दे चुकी हूँ , शीघ्र ही अपने चिट्ठे में प्रेषित करूँगी । वह भी माँ से दूर रहते पुत्र के लिए है ।
घुघूती बासूती
ghughutibasuti.blogspot.com

Nirmal T V said...

Thanks for leaving a comment on my blog...U have a gr8 hindi blog..by the way which software do u use to get hindi fonts?

Beji said...

दिव्यभ जी,

आपके पत्र को साहित्य की दृष्टी से नहीं देखना चाहती।

कहते हैं
खुशी = परीश्रम/ अपेक्षा

यह पुत्र और पिता दोनों पर ही लागू होती है।
हर मनुष्य की अपनी सीमायें होती हैं । पर हम अपने माता पिता को किसी भी सीमाओं के भीतर नहीं सोच सकते । एक पुत्र के लिए एक पिता विधाता जितना सक्षम, समर्थ एवं शक्तिमान होता है । पुत्र के मन में पिता की यह छवी.....पिता की स्वयं से अपेक्षा बढ़ा देता है । इस अपेक्षा पर खरा उतरने के लिए जो निर्णय सबसे सही लगता है लागू किया जाता है ।
पर निर्णय सही था या गलत परिणाम जानने पर ही पता लगाया जा सकता है ।

जब परिणाम अपेक्षाओं के विरुद्ध होता है....तो निराशा स्वाभाविक है ।

किन्तु यह किस के निर्णय का परिणाम है ?!!ज़ाहिर है उस की पीडा ही अधिक होगी । गलत निर्णय की पीड़ा गलत परिणाम से अधिक ही होती है । आखिर निर्णय का दायित्व निर्णय लेने वाले पर ही होता है ।

यह पत्र इस बात का साक्षी है कि आपने स्थिती का विश्लेशन किया । आप पुत्र और पिता दोनों को कटघरे तक पहुँचाने में भी सक्षम हो गये । तो फिर निर्णय का समय आ गया । पर दायित्व अब पुत्र पर है ।

हर अहम को तीन भाग में विभाजित किया जा सकता है । बच्चा, मातापिता और व्यस्क ( child, parent and adult ego states) हर व्यक्तित्व में समयानुसार एक भाग प्रबल होता है । अधिकांश हमारा व्यक्तित्व माता पिता समान ही हो जाता है । शायद इसलिए भी हमें उनके व्यक्तित्व को समझना चाहिए । अगर जज्बातों को नज़रंदाज़ कर के सही, गलत, सामर्थ्य और बेबसी का हिसाब ईमानदारी से किया जाये तो खुद के व्यक्तित्व में निखार लाने का यह उपयुक्त अवसर है ।

पिता के निर्णय का मूल स्नेह था । पुत्र की व्याकुलता का आधार भी स्नेह है ।

तो फिर अब का निर्णय भी स्नेह ही होना चाहिए । निर्मल स्नेह....अपेक्षाओं के परे....बेशर्त...जहाँ गल्तियाँ करने की, उन्हे स्वीकार करने की.....उन्हे सही करने की सक्षमता और साहस होना चाहिए ।

अस्तित्व की तलाश गलत नहीं है । मार्गदर्शन भी पिता का कर्तव्य है ।

गलत कौन है ? .......कोई भी नहीं।

बात अहम और अहंकार की है । अपने व्यस्क अहम को प्रबल कर इस सच को स्वीकार कर जीवन की ड़ोर विवेक को देनी चाहिए । अपने अहम को एक बार विनम्र कर स्नेहासिक्त होने का मौका दीजिए....आप पायेंगे की आप सफलता की ओर अग्रसर होंगे ।

जितनी भी बेडियाँ जिन्दगी ने हम पर डाली हैं....सबसे कड़ा वही है जो हमने स्वयं पर ड़ाली है । आप स्वयं को इससे आज़ाद कर सके ऐसी हमारी मंगल कामना है।

शुभकामनायें !!!

manya said...

सिर्फ़ इतना कहूंगी .. शायद थोङा अजीब लगे.. रूला दिया तुमने.. काश! मैं कह पाती'मम्म-पापा' से ये सब.. आत्मा में झांक सऊं उस प्रेरणा के लिये धन्यवाद...

आशीष said...

दिव्याभ भाई
मार्मिक कविता है आपकी !

एक निवेदन है आप अपने चिठ्ठे की पृष्ठभूमी का रंग बदल दिजिये ! पढने मे काफी असुविधा होती है

Udan Tashtari said...

अत्यंत मार्मिक चित्रण. तारीफ को शब्दों मे बाँधना उचित नहीं इस दिल की आवाज को. बहुत बढ़िया.

Divine India said...

निर्मल भाई,
आपने इतना जल्द Reply किया…आपका बहुत-2 शुक्रिया…हिंदी के लिय तो काफी Softwares पर मैं जो use कर रहा हूँ उसके लिए आप यहाँ जाएँ-- http://devendraparakh.port5.com/

घुघती बसूती जी,
आपने इतना वक्त दिया…मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं बचा है…आपके "माँ" वाली प्रविष्टि का इंतजार रहेगा…धन्यवाद!!

बेजी जी,
आप्की भावनाएँ उच्च कोटी की हैं…और जो कहा बहुत अच्छा लगा…मैंने उन हर भावी पीढ़ी को इंगीत करने का प्रयास किया है जो आपना ज्यादातर किमती समय गंवा देते हैं और असफलता मिलने पर घोर निराशा में चले जाते है…बात पिता की आकांक्षा का नहीं है…बात है दृष्टिकोण का क्योंकि पिता
तो उद्देश्यमार्गी हैं लेकिन आज की युवा…परेशान ज्यादा रह्ती है और जब वक्त निकल जाता है तो उसी पिता के समक्ष बैठकर हालिया बयान करते हैं।

मान्या,
मैं सफल रहा इतना ही कह सकता हूँ।

आशीष भाई,
मेरी रचना को सराहा इसका धन्यवाद!
आपको थोड़ी पढ़ने में कठिनाई हुई क्षमाप्रार्थी हूँ,जो मैं टेम्पलेट चाहता हूँ वह मिल नहीं रहा अब काला मेरा सबसे प्रिय रंग है तो काम चला रहा हूँ…फिर भी आप-सबके कहने पर थोड़ा हल्का कर दिया है…

समीर भाई,
हौसला अफ़जाई का शुक्रिया…आप पुन: इसबार विजयी हो यही कामना कर रहा हूँ!!!

ranju said...

मार्मिक कविता .......
पढ़ के बस दिल कही खो सा गया ..सही लिखू तो तारीफ़ के लिए शबाद नही मिल रहे हैं सबने इतने अच्छे क्मेंट्स दिए हैं की शायद अब मेरे लायक केहने को कुछ नही बचा है सिर्फ़ यही की बस ऐसी ही सुंदर दिल को छ्हू लेने वाली रचना आप लिखते रहे ..इनको पढ़ना बेहद सुखद लगता है

Anupama Chauhan said...

divyaab ji......aapki khaatir kya likhu kuch samajh nahi aata...kintu aapse kaafi prabhaavit hu...aapse contact karne ka tarikaa bataaiye.....

Divine India said...

Thnx Ranju,
I m So Impressed by ur feeling...Thnx again.

Hello Anupama,
Thnx 4 coming n appreciating my work...do come...!!!
U Can mail me on
divyabh.aryan@gmail.com

rachana said...

दिव्याभ, शब्द नही हैं मेरे पास! आपने अन्दर के कोलाहल को बखूबी शब्दों मे ढाला है आपने!

Divine India said...

रचना जी,
क्या कहूँ… ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया…बस इतना ही कहूंगा…शुक्रिया आपका…।

Anonymous said...

Mitra,
Kya kahun thora late ho gaya padhne me ...lekin kafin emotional kar diya aapne...ek to ghar se itni door upar se aapki aisi bhawatmak rachana...aap samajh hi gaye honge apne is mitra ki haalat ko..

Keep it up..atleast for us

Manish

Divine India said...

Hello Sirrrrrrrrrrr,
ki haal hai...mazaaja aayaa naa...vaise bhi US ki chataa me meraa yah prayaas thodaa kaam hai...par pasanad aayaa.Mitr to Mitr hai...nahi bhi hotaa to achaha kahataa.
Dhanyabad...

aditi nandan said...

wah!astounding exploration of that 'feel' which in one way or the other we all experience..people r so true here..u made really ur all readers honest n provided them chance to accept wat was still burning deep inside thm as guilt..
the quality lies in the way u expressed n we all now r able to relate with it..

RASHMI MANDHANYA.BANGALORE said...

DIVYABH PUTRA KA KHAT PITA KEI NAAM MAI TUMHARI MANOBHAVA KA ITNA SAJEEV CHITRAN HAI KI MAI TO APNEY HI AKS KO DEKH RAHI HUIN.COMENT DENA ITNA AASAAN NAHI HOTA HAI PER MADHYAMVARGIYA PARIVAAR MAI PITA APNEY SAPNEY PUTRA MAI HI DEKHTEY HAI.PITA KEI SAPNEY,PUTRA KEI MANOVYATHA KI GAHARAI MAI TAHEDIL SEI MEHSUS KARTI HUIN.INSAAN APNA ATIT KABHI NAHI BHULTA.BHALEY HI KITNA MATBHED KYON NA HO AUR HAMARI RAHEN ALAG KYON NA HO JAYEN TUM JAISEY PUTRA PITA KEI LIYE VARDAAN HI HAI BURHAPEY MAI HI EK PITA KO YEH EHSAS HOTA HAI KI USNEY KYA PAYA AUR KYA KHOAA.MUJHEY KHUSHI HAI YEH KEHTEY KI EK PITA NAI DIVYABH JAISA[PUTRA PAYA HAIJO ANMOL HAI.BHALEY HI SAPNEY ALAG HO GAYEY HOGAYEY PER VO SAPNEY BHI KITNEY APNEY HI HAI.TUMHARI MANOVYATHA TUMHARI
KARUNA KO HI PARILIKSHIT KARTI HAI, MAI TAHEDIL SEI PRARTHANA KARTI HUIN KI TUM SAPNO KI URAAN MAI US UNCHAAI PER PAHUNCHON JISKI NEENV MAI PITA KEI TYAG KI SHAHDAT BHI SHAMIL HAI.APNO KO DOOR KARNA ITNA ASSAN NHI HAI,MANJILEY BHALEY HI PRITHAK HO JAYEY PER SAPNO KI UUNCHI URAAN JARUR TUM BHAROGEY AUR APNEY PRADESH KA GAURAV TUM BARHAOGEY.GOD BLESS U.