चला मुरारी "Director" बनने…!!!


बिहार के ग़र्द से
दिल्ली की ज़र्द तक और
मुंबई के "अर्ज़" पर चला
यह 'मुरारी' अब "Director"
बनने...!!!
UPSC(IAS)छोड़ने के
एक साल बाद भारी मुसक्कत
और मानसिक दुविधाओं को
परास्त करते हुए अंतत:
"Film Making"
के ग्लैमर के आकाश में उड़ने
को चाहा मन… थोड़ा परिवार
और अनेकानेक महानुभावों की
असफल आपत्तियों के बाबजूद…मेरे पैतृक गाँव
"जहानाबाद" से प्रथम,पूरे बिहार में से कुछ की
श्रेणी में आना भी रोमांचक लगने लगा और
मेरे कंधे इस बोझ से इतने दबे हैं कि कोशिश
के सहारे उस विशाल अनजाने मंच पर बेदियों
का निर्माण करने निकला हूँ…कहाँ पढ़ने लिखने
वाला यह शक्स दुसरे चेहरे में अपने स्वरुप
तलाशने निकला है…।
कुछ दिनों तक शायद मेरी अंतर्जाल पर उपस्थिति
न हो पर जल्द मैं अपना कैमरा MOVE करूँगा और
जल्द वापस आऊँगा तबतक बिदा "आपकी
दुआओं के सहारे"… लेकिन…
चला मुरारी "Director" बनने…!!! तबतक
क्रमश: रहेगा…
उस मंच की कथा का अगला अंक मेरे दोबारा
आने तक…!!!
12:09 PM
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12:09 PM

Divine India

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1857 का "Revolt"


“1857 का विद्रोह” अपने 150 साल पूरा
कर चुका है, मुंबईचौपाल
पर बहस के लिए आमंत्रण किया गया था
बात यहीं से शुरु हुई…मैंने देखा वर्तमान
समय में इतिहास के कुछ पन्ने स्पष्ट हो
चुके हैं तब-भी इतनी अतिश्योक्तिपूर्ण परिचर्चा
हो रही है…अब चुकीं इस क्षेत्र से अपन का
लंबा नाता रहा है तो पूर्व का “मैं” जागा और
जैसे ही लिखने लगा…ये क्या मेरे हाथ कंपकंपा
रहे थे जैसे जड़ता की स्थिति में आ गये हो
Keypad पर कुछ भी टाईप नहीं हो रहा था,
मन भयाक्रांत था सहमा हुआ…अब लिखना था
1857 का विद्रोह और कांप रहा था मैं क्यों?
तो लो जी हम भी मन के अंधकार को प्रकाशित
कर लें नहीं तो मैं काला न रह जाऊँ…।एक दिन
“RSS तालिबान” लिखा लेख पर जा पहुंचा…
मैं इसपर की गई टिप्पणियों को पढ़ पूरी तरह
हतोत्साहित हो गया…वाह मित्रों!!! क्या हालात हैं
तुम्हारे…जब रचना जी ने अपने लेख में ग्रुप की
बातें की तो सारे झंडा लेकर विरोध करने जा
पहुंचें और वहाँ टिप्पणियों की संख्या मासा-अल्लाह!!J
सब सफाई ही देने में लगे थे…लेकिन ये क्या
संप्रदायवाद की दुर्गंध…क्या प्रतिक्रिया
दी है भाइयों भाई वाह!!!!!!
Shrish Bhai
मेरे एक लेख की प्रतिक्रिया में सच कहा था कि
दिव्याभ भाई आज –कल चिट्ठाकार बहुत असहनशील
हो गये हैं…यह अब सच लगने लगा है, कोई
अनाम बनकर टिप्पणी कर रहा है और जब
देखता है कि अभी तो कुछ कहा ही नहीं तो
दोबारा वही शक्स पुन: पहुँच जाता है…हमारे बीच
बौद्धिकता का चोला डाले कुछ मित्र-गण भी
कुछ-से-कुछ लिख कर आ रहे हैं…कई बार इन लोगों
ने “जलते भारत” पर सवाल उठाए पर दिख गया कि
लिखना और वास्तविकता दोनों अलग हैं।


सदाशिव स्वामी ने कहा था कि
जो करने की इच्छा हो वह मत करो,
तब तुम जो चाहोगे वह कर सकोगे।


इस विरोधाभासी कथन का यही अर्थ है कि अपने
“अहं” को मार डालो तभी उच्चता पाओगे।
अब कहीं मैं न इस गाली-गलौज में आ फंसूँ
तो भयभीत हो गया…था।]
तो चर्चा शुरू करते हैं---
1857 का विद्रोह… “क्रांति” था। सबसे पहले
“क्रांति” को समझना आवश्यक है…
“क्रांति” वह होता
है जिसका कोई परिणामी उद्देश्य हो एक निश्चित समीकरण
हो एक गणितीय नियम हो…जो सत्ता के पूर्ण परिवर्तन
व नये शासन की शुरुआत करता हो…बदलाव की
उसी पुरातन पृष्ठभूमि से स्वयं को अलग कर
निर्माण की नई आकांक्षा को पूरा करता हो,
अर्थात सारे स्तरों पर तत्क्षण परिवर्तन।

और इस आधार पर यह अब प्रमाणित हो चुका
है कि 1857 एक विद्रोह था…।


1857 का विद्रोह एक महान जागरण था, जो गहन
“अब्रिटिश” भावनाओं की अभिव्यक्ति स्वरूप उत्तर तथा
मध्य भारत में फूट पड़ा, यद्यपि भारतीय नागरीकों
के असंतोष का सीधा प्रभाव सैनिकों पर पड़ा,
जिसके कारणत: इसका आरंभ सैनिक विद्रोह के
रुप में हुआ तथापि इसका नेतृत्व असैनिकों के हाथों
में और शीघ्र ही इसने अधिकांश जनता एवं किसान
वर्ग को भी सम्मिलित कर लिया। विद्रोह की व्यापकता
इसी-से ज्ञात होती है कि उस समय के कतिपय
पर्यवेक्षकों ने इसे “राष्ट्रीय विद्रोह” की संज्ञा दी।
ईस्ट इंडिया कंपनी की साम्राज्यवादी अराजकतापूर्ण
शोषण की प्रवृति तथा धन की लोलुपता के संचित
प्रभाव से भारत में सभी वर्गों यथा रियासतों के
शासक, सैनिकों, जमींदारों, कृषकों, व्यापारियों तथा
धर्म संस्थापक आक्रांत थे, ब्रिटिश नीतियों के कारण
हिंदू-मुसलमान के धर्म-मान-जीवन सम्पत्ति सभी
को भय उत्पन्न हो गया था। यद्यपि भारतीयों का
रोष समय-समय पर विभिन्न भागों में विद्रोह के रुप
में प्रकट होता रहा; इसी आधार की उपज जो सामान्यत:
भिन्न व व्यापक जन-आंदोलन “1857 के विद्रोह”
के रुप में हुआ।
जहाँ तक 1857 के विद्रोह की “राष्ट्रीय प्रकृति” का प्रश्न है
इस संबंध में इतिहासकारों में मैंतक्य नहीं है।
इसके पक्ष में “बेंजामिन डिजरेली” जो इंगलैंड में
समकालीन रूढ़िवादी दल के एक प्रमुख नेता थे तथा
“अशोक मेहता” आदि विद्वानों ने इसे “राष्ट्रीय विद्रोह”
माना है। डिजरेली के अनुसार
यह सुनियोजित एवं
प्रयत्नों का परिणाम था, जो अवसर की प्रतीक्षा में था।

जहाँ तक राष्ट्रीय विद्रोह का प्रश्न है, किसी विद्रोह
को राष्ट्रीय विद्रोह तब कहा जा सकता है जब;
    • वह संपूर्ण राष्ट्र में एक समान प्रभाव छोड़े
    • उस विद्रोह का कोई एक नेतृत्वकर्ता हो
    • वह राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर लड़ा जा
      रहा हो
    • विद्रोह को सर्वसाधारण एवं सभी वर्गों का
      समर्थन प्राप्त हो।


1857 के विद्रोह में बंगाली, पंजाबी, महाराष्ट्रीय तथा
मद्रासीयों नें यह कभी अनुभव नहीं किया था कि वे
एक राष्ट्र के सदस्य हैं। विद्रोह का नेता कोई राष्ट्रीय
नेता नहीं था। “बहादुरशाह” कोई राष्ट्रीय सम्राट नहीं
था, उसे तो मात्र सैनिकों ने नेता घोषित कर दिया,
नाना साहब का दूत लंदन से पेंशन प्राप्त नहीं कर
सका तब इन्होंने विद्रोह का झंडा उठाया। झांसी का
विद्रोह उत्तराधिकार और विलय के प्रश्नों को लेकर था,
इसमें कोई संशय नहीं कि “रानी झांसी” वीर-गति को
प्राप्त हुईं परंतु इससे स्पष्ट नहीं की वह राष्ट्रीय हित में
लड़ रही थीं। अवध का नवाब एक बेकार एवं व्यभिचारी
व्यक्ति था, जो राष्ट्रीय नेता नहीं हो सकता था यह तो
अवध के तालुकदारों ने सामंतशाही अधिकारों था अपने
राजा के लिए युद्ध किया ना कि राष्ट्रीय-हित में। इसमें
जनता के सभी वर्गों ने हिस्सा नहीं लिया आधुनिक
शिक्षा प्राप्त वर्ग, मध्यम एवं उच्चवर्ग तथा सम्पत्तिशाली
वर्ग इस आंदोलन से अलग ही रहा। विद्रोह का प्रसार
भी सीमित था, उत्तर व मध्य भारत के अलावा अन्य भागों
में इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।
डा सेन का कथन है:
19 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में भारत केवल
एक भौगोलिक कथन ही था तथा उस समय भारतीय
राष्ट्रीयता भ्रूणावस्था में थी”।
सही जान
पड़ता है।

श्री ताराचंद ने ज्यादा स्पष्ट किया है;
1857 का विद्रोह एक कमजोर व्यवस्था
का अपनी खोई हुई मर्यादा को पाने का अंतिम प्रयास
था।


अत: इस रुप में “1857 के विद्रोह" को राष्ट्रीय विद्रोह की
संज्ञा नहीं दी जा सकती। “क्रांति” तो बिल्कुल नहीं!!


जहाँ तक 1857 के विद्रोह का प्रश्न है, इसके वास्तविक
स्वरूप के संबंध में इतिहासकारों का विभिन्न मत है…
समकालीन अंग्रेज लेखकों ने जिसमें जॉन विलियम,
मालेसन, ट्रेविलियन, लारेन्स ने इसे सिर्फ सैनिकों का
विद्रोह या "म्यूटिनी" कहा। इन लोगों ने असैनिकों के
योगदान की या तो उपेक्षा की या इसे कुछ स्वार्थी
लोगों की स्वार्थपरायणता का परिणाम मानकर महत्वहीन
समझा। कुछ भारतीय इतिहासकार भी इसे सैनिक विद्रोह
मानते हैं—मुंशी ज़ीवन लाल, दुर्गादास, सैयद अहमद ख़ां
आदि। दूसरी ओर कुछ लेखकों ने इसे;
अंग्रेजों के विरूद्ध मुसलमानों का षड़यंत्र,
असंतुष्ट सामंतों का विद्रोह कहा।

“होम्ज” की उक्ति सबसे प्रसिद्ध रही इसने इसे—
“बर्बरता तथा सभ्यता के बीच युद्ध” कहा।
स्पष्ट है कि इस बारे में अनेकों विचार प्रस्तुत किये गये
हैं। किसी निष्पक्ष निष्कर्ष तक पहुंचने हेतु इन विचारों
का परीक्षण आवश्यक है---


यह सही है कि विद्रोह का आरंभ सैनिक छावनी
से हुआ, कारतूस के मुद्दे ने अवसर को मौका दिया
और सैनिक हिंसक विद्रोह कर दिल्ली पहुँचे जहाँ वहाँ
के सिपाहियों ने उनका साथ दिया लेकिन हमें यह ध्यान
रखना चाहिए की भारतीय सैनिकों का एक बड़ा भाग
अंग्रेजों के साथ में था जिसने इस विद्रोह को कुचलने
में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। दूसरे इस विद्रोह
में मात्र सैनिकों या सामंतों ने भाग नहीं लिया था वरन
जन-साधारण ने भी अपना रोल निभाया था। इसकारण यह
मात्र सैनिक विद्रोह नहीं था…।
जेम्स आउट्रम और डब्ल्यू टेलन ने इसे मुस्लिम षड़यंत्र माना,
जिसमें हिंदू शिकायतों का लाभ उठाया गया किंतु यह
व्याख्या भी अपर्याप्त है क्योंकि वर्तमान में यह स्पष्ट
हो गया है इस विद्रोह का कोई संगठन नहीं था।
इसी प्रकार इसे ईसाइयों के विरुद्ध भी विद्रोह नहीं माना जा
सकता क्योंकि एक तो ईसाइयों ने अपने धर्म प्रचार में
कोई पर्याप्त सफलता नहीं पाई थी दूसरे उनके द्वारा अंग्रेजी
शिक्षा के प्रचार को हिंदू-मुस्लीम दोनों समाजों के शिक्षितों
ने सहर्ष स्वीकार किया था।
आर सी मजुमदार का मानना है कि तथाकथित “प्रथम राष्ट्रीय
स्वतंत्रता संग्राम” ( जिसे "सावरकर" ने माना है) न तो प्रथम,
न राष्ट्रीय और ना ही स्वतंत्रता संग्राम था। मार्क्सवादियों के
अनुसार यह सैनिक व कृषकों का प्रजातांत्रिक गठजोड़ था जो
विदेशी तथा सामंती दासता से मुक्त होना चाहता था।


उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न विचारकों
के मत में आंशिक सत्यता ही है, कोई भी मत पूर्णतया
सत्यता की कसौटी पर खड़ा नहीं उतरता…यह एक
जन आंदोलन अर्थात “पापुलर रिवोल्ट” था जो सैनिकों
के मूल से शुरु हुआ एवं असंतुष्ट सामंतों ने इसका नेतृत्व
किया…। यह एक सरकार कि नीतियों के विरुद्ध जन विद्रोह
था जिसमें दोनों ने मिलकर हिस्सा लिया।


इस गंभीर विश्लेषण से पता चलता है, हाँलाकि “1857 का
विद्रोह” असफल रहा मगर यह व्यर्थ नहीं गया, यह हमारे
इतिहास का एक शानदार पड़ाव था; यह पुरातन भारतीय
नेतृत्व को बचाने का एक हताशा-पूर्ण प्रयास जरूर था परंतु
यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए भारतीयों का
प्रथम महान संघर्ष था। इसने आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन
को नींव प्रदान किया तथा विदेशी शक्ति को समाप्त करने
के लिए जिस वीरता व बलिदान की भावना का परिचय
दिया वह आने वाले भारतीय जन-नायकों की प्रेरणा का
अक्षुण्ण स्रोत बना रहा…।
मैं इस लेख के माध्यम से उन समस्त वीरों को
सादर प्रणाम करता हूँ…।
भाइयों ;
“महात्मा बुद्ध” से एक प्रश्न पूछा गया कि
“मनुष्य को सबसे समान रुप से प्रेम क्यों करना चाहिए?
“बुद्ध” का उत्तर बड़ा अनूठा था—“क्योंकि प्रत्येक मनुष्य
के असंख्य और विविध जन्मों में कभी-न-कभी अन्य प्रत्येक
जीव किसी-न-किसी रूप में उसे प्रिय रहा है।

यह हमें याद दिलाता है कि हमें व्यवहार में कैसा
परिवर्तन करना चाहिए…मुझे आप अपना कोप-भाजन
न बनाये इस कारण यह लिखना पड़ा JJ
2:39 PM
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2:39 PM

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प्रश्नों की भौतिक भूमि पर खड़ा “द्रष्टा”




“हमेशा चाहना यही होती है कि पूछा जाये मुझसे मेरी निकटता
के दो प्रश्न…उलझु न जिसमें ‘मैं’ और दंभ पुलकित होता हो,
शायद ही कभी अपने सपनों की दो-चार पंक्तियाँ लिखता हूँ…
इच्छाओं व तृष्णाओं के जो शिखर बुनता जाता हूँ…
वह अंतस्थ तृप्त उदगारों में ही विसर्जित कर देता हूँ…
कहीं खुल न जाये भीतरी भेद मेरे अवचेतन मन के वातायन से
और सुन कर जान साथी मित्र मुझे छोड़ दूर न हो जाएँ…”॥

  • मैंने मिश्रित प्रश्नों के उत्तर दिये हैं जिसे “राजीव जी”,
    “राकेश जी” और “मान्या जी” ने मुझसे पूछा था…

    प्रश्न— दो प्रिय पुस्तकें और दो प्रिय चलचित्र…।

  • कोई भी विचारशील पुस्तक जिसकी पंक्तियों पर रुककर
    चिंतन किया जा सके और जो मानसिक कोष्टकों को भी
    चोट पहुँचाए…ऐसी पुस्तकों में “Indian Philosophy”
    by S RadhaKrishn & M Hiriyanna और
    “रश्मिरथी”—राष्ट्रकवि "दिनकर" विरचित।
  • 'सिनेमा' समाज और मानव कुंठा का दर्पण है…आगे
    निकलता समाज पीछे मुड़कर देखना नहीं चाहता क्योंकि
    उसकी मानसिकता नीचे देखने नहीं देती तो इसपर रहनेवाले
    भूमि पर न खड़े होकर सदा आसमान में विचरण करते रहते
    हैं…। इन आधारों को माना जाए तो “प्यासा” बेहतरीन फिल्म
    है और समाज की कुंठा का परिणाम “अंकुर” में दिखता है।

    प्रश्न—क्या लिखना पसंद करते है और क्या प्रेरित करता है?

  • आनंद और Romance न हो तो यह जिंदगी बोझिल
    हो जाए… दबी-दबी सी, घुटन भी होगी…चाहता हूँ बंदिशों से
    पार भीतर उतर कर बाहर को टटोलूँ…प्रकृति के ताजे नूपुरों
    पर बस एकबार खुल कर थिरकूँ “परमात्मा” की कलाकृतियों
    में छिपे रहस्यों को पहचान सकूँ…जरा देख सकूँ कि उन
    पत्तों पर क्या लिखा है…॥

    प्रश्न—क्यों लिखते हो…?

  • मैं लिखता नहीं…!!! लिखना बड़ा चतुराई का काम
    है… और फिर लिखते तो सारे हैं…कोई कलम से तो कोई
    तन्हाई में तो कोई बातों से…। मैं तो बस मानसिक तरंगों
    और शब्दों का व्यापारी हूँ।

    प्रश्न—जीवन की कोई सनसनीख़ेज़, धमाकेदार और
    रोमांचकारी घटना…।

  • जीवन बनाम गति…अर्थात इसके साथ-साथ
    कथाएँ, कहानियाँ, घटनाएँ चलती रहती हैं…बस वही घटनाएँ
    स्मरण में रहती हैं जो बहुत दु:ख या चरम सुख के स्तर
    पर ठहर जाती हैं, लेकिन छोटे-छोटे वाक्यांश जो सदा हमारे
    साथी होते हैं वही भूला हो जाता है और दूर के शोर याददाश्त
    बन जाते…लेकिन प्रश्न के लिहाज से जब मैं 14 साल पहले
    संन्यास लेने निकला था और मेरा “अनुज” मेरे साथ था…
    उसकी पलकों से बंधे सलील ने स्नेह की नई परिभाषा मुझे
    सिखलाई, हाथ पकड़ कर तो रोक नहीं सकता था; वो आँसू
    जेल बन गये थे।

    प्रश्न—किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसंद हैं…।

  • सच कहा जाए तो कोई भी चिट्ठा अपने-आप में
    पूरा या उत्कृष्ट नहीं होता, हाँ उसकी कुछ पोस्ट जिसे आप
    Topic कह सकते हैं अच्छा लगता है और उसपर ही टिप्पणी
    भी करता हूँ…अभी तो हिंदी ब्लागिंग स्वयं रास्ता ढूंढ़ रहा है…
    तो इसकी सीमाएँ संकुचित हैं।
  • चूंकि मेरे करीबी मित्र भी हैं इसमें और गुरूजन
    भी और ठहरा मानव तो पूर्वाग्रह होना स्वभाविक ही है तो
    उनकों बिल्कुलअलग मानता हूँ। सीखना चाहता हूँ तो
    सभी को पढ़ना भी होताहै जो अच्छा लगा
    “बस ओढ़ ली चदरिया उसकी”।

    प्रश्न—आपकी स्व-रचित पसंदीदा रचना कौन सी है?

  • प्रत्येक लेखनी पुत्र के समान होती है एक लेखक
    के लिए, लेकिन कुछ भावनाएँ हमेशा तैरती रहती हैं और
    जब उन्हें शब्द मिल जाते हैं तो वह जीवंत हो उठती हैं…
    ऐसी ही रचना हैं “वो कौन है” जिसे अभी पोस्ट नहीं किया
    है किंतु मौका मिलने पर डाल दूँगा।

    प्रश्न—कला पक्ष का भाव पक्ष से रिश्ता कितना महत्वपूर्ण है?

  • एक प्रकार से कला पक्ष भाव पक्ष ही है…शब्द
    अलग-अलग हैं पर संस्कार एक है…।

    प्रश्न—लिखने से ज्यादा पढ़ना मन-पसंद क्यों विधा है?

  • भाई यह तो दो-धारी तलवार है…ज्यादा पढ़ना व्यक्ति
    को विचार संपन्न बनाता है…अज्ञान को ज्ञान से जोड़ता है
    लेकिन साथ में अहंवाद को भी प्रश्रय देता है जब हम स्वयं
    को विद्वान समझने की भूल करने लग जाते हैं।

    प्रश्न—आपके जीवन के दो महत्वपूर्ण व्यक्ति…।

  • प्रत्येक के जीवन में सामान्यत: माता-पिता से
    ज्यादा महत्वपूर्ण कोई नहीं हो सकता लेकिन मेरे लिए
    “मेरी पगली’या” और “मेरा अनुज”!! एक सत्य है तो
    दूसरा सार्थक!!!

    प्रश्न—अपनी एक अच्छाई और बुराई…।

  • मेरी जो अच्छाई है वही बुराई भी है यानि जो मैं
    चरम रुप में करता हूँ वह बुराई है ऐसा मानता हूँ और
    शांत आश्रय मेरी अच्छाई॥

    प्रश्न—मूड खराब होने पर कौन सा गाना सुनते हैं?

  • मूड खराब होने पर कोई गीत सुन भी कैसे सकता है!!
    अंधेरे कमरे में तन्हाइयों पर अकेले-पन का सर रखकर
    निरीह और निर्बल भावनाओं को आँखे बंद कर घंटों देखना
    और तलाश उस स्थिती की जहाँ मैं रुक जाऊँ।

    प्रश्न—आप किसी साथी चिट्ठा-कार से प्रत्यक्ष मिलना
    चाहते हैं, तो वह कौन है और क्यों?

  • बिल्कुल नहीं!!! कितने सुंदर-सुंदर भावनात्मक
    चिट्ठे रोज़ लिखे जाते हैं, हर दिन उनकी सुंदरता
    व्यक्तित्व की प्रखरता उनके भाव में अनुभूत होती हैं…जो मेरे
    मन को आमोद-प्रमोद से खिलखिलाती हैं, मेरा चित्रकारी मन
    आवेश की ब्रुश से बहुतों के Sketch बना रखे हैं तो कृपया
    जीने दे मुझे मेरे जाने तस्वीरों के सहारे जो परम पाकीज़ा और
    परम पुनीत भी है…।!!!अवर्णनीय!!!
    जो मजा अदृष्ट में है दृष्टता तो महज खेल है…।

मेरा प्रश्न…सभी ब्लागर मित्रों से है--

आपको अपने भीतर की "शून्यता" में क्या दिखता है जिसे

पाकर खो दिया…।

3:44 PM
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3:44 PM

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A Journey In "Garib Rath"



हमारे रेलमंत्री की उत्कृष्टतम सोंच…"गरीब रथ" वैसे यह
गरीबों की सवारी बिल्कुल नहीं लगती पर शायद रेलमंत्री
अपने जातिवाद की छाया से मुक्त नहीं हैं तो यहाँ गरीबों

में भी स्तरीकृत विभाजन किया गया है…यानि गरीबों में
जो अर्थवान हैं यह उनकी सवारी है…एकदम झकास "ट्रेन"।
यह तो हुई "गरीब रथ" की बात…अब मैं यहाँ क्या कर रहा
था? पेशे से तो मैं पत्रकार हूँ नहीं…!
इधर कुछ दिनों से मैं मुंबई में था कुछ काम के संदर्भ में…
अचानक वह कार्य कुछ दिनों के लिए बढ़ गया और मैं
अपने "अनुज" प्रेम के कारण यहाँ खिंचा चला आया क्योंकि
अपने छोटे भाई को छोड़ पहली दफा दूर गया था।
तुरंत वहाँ से चलने के कारण टिकट आरक्षण मिलना मुश्किल
था अत: मुंबई से पहली दफा रवाना होने वाली "गरीब रथ"
में यह संभव हो गया और मैं स्टेशन पर!!! वहाँ सहारा न्यूज
का Coverage हो रहा था…भाई एक नया न्यूज जो था गरीबों
की राजधानी का और हमेशा नेता-फिल्मी लोग हीं क्यों हर
तरफ छाये रहें अब गरीबों की बारी हैं…इसप्रकार तमाम अटकलों
पर विराम लगाते हुए माननीय रेलमंत्री "लालू प्रसाद यादव"
ने वजट से पूर्व तीसरी "गरीब रथ" मुंबई-से-दिल्ली चला ही दी!!!
मैं अपना स्थान ग्रहण कर चुका था मेरे आस-पास कई लोग
आकर और बैठ गये…बिल्कुल नई उम्दा सुविधाओं से लैस
यह ट्रेन कई मामलों में राजधानी को पिछे छोड़ देती है और
वह है…आधी कीमत में सारी सुविधा यहाँ तक की रफ्तार भी…!!!
17 घंटे में मुंबई से दिल्ली वो भी 3AC में वैसे इसमें Chair Car की
व्यवस्था भी है…और!!! 'क्या बच्चे की जान लोगे'।
well dressed attendant...!!! काफी सारे स्टाफ इत्यादि…इत्यादि।
हाँ यहाँ पर दो स्तर के लोगों के बीच की दूरी भी कम हो गई
जो "National Integration" में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर
सकता है…ऐसा भले रेलमंत्री न चाहते हों की वर्ग संघर्ष मिटे पर
यह उपलब्धि उनकी ही है…!!! बताता हूँ कैसे…
सभी लोग अपना-अपना स्थान ले रहे थे…बहुतों ने लालू जी को
धन्यवाद किया खास कर व्यापारियों ने जिन्हें सप्ताह में 4 बार
मुंबई-दिल्ली आना-जाना पड़ता है…और नई गाड़ी ने प्रस्थान किया
नये सवेरे की ओर… अब--

"'रथ' चला परस्पर बात चली
सम-दम की टेढ़ी घात चली"॥
नये-नये लोग आते गये और कारवां चल पड़ा…।
हमारे आमने-सामने कुल आठ लोग थे-->व्यापारी-डाक्टर-मरीज-
मैनेजर-एक महिला और "मैं" सबसे अलग सिर्फ "साक्षी"
महिला इसकारण की सभी के सामने मात्र सुकुमार तरुणी…
ज्यादा अंग्रेज-कम भारतीय!!! मैं शान से भीतर गया था मेरे
करीब में हरियाणा प्रांत के एक मरीज बैठे थे…जो तंग हाल भी
थे और लकवा से परेशान…पहले मैं अंदर से कुढ़ा लेकिन
व्यावहारिक नैतिकता की बाहों में तुरंत आ गया और मैने बाबा
से संबोधित किया अपना समझ उनकी पत्नी ने मुझसे अपने
सीट के बारे के पुछा कि हम सही जगह पर हैं न…।
व्यापारी महाशय ने कान में मोबाईल FM radio का पीन
लगाया और जोर-जोर से लालू प्रसाद के कहकहे लगाने लगा…
इन रेडियो वाले के साथ क्या बताऊं बैठे हैं सफर में और
कान में टिमटिमा लगा कर अपनी ध्वनी से लोगों को परेशान
भी करते हैं और तन्हाई का एहसास भी दिलाते हैं, सुनने वाला
अच्छे गानों पर सर हिलाता जाएगा और आप मुख खोल
कर उसकी हरकत पर यह सोंचते रहेंगे की कौन सा गना'वा
चल रहा है…ससुर के !! मैनेजर भाई ने कहा कि यार सीट
छोटी है इसका एलाईनमेंट ठीक नहीं है…ससुरा ये महाशय
"दो रुपये में जंगल खरीदने" निकले थे…कुछ लोगों की
यह आदत होती है कि चाहे कुछ भी हो वह शिकायत करने
की अपनी प्रकृति से नहीं चुके'गा…।बात हो ही रही थी तबतक
"जय हिंद" की गुंज पीछे से आने लगी…देखा एक सिपाही
ने कुछ किया हुआ था…। मेरे सीट के पास आने पर…उन्होनें
नये सफर पर बधाई दी…और "जय हिंद" का नारा लगाने को
कहा…पहले मैं भी हिचकिचाया पर तुरंत देश भक्ति का ज्वार
उफान लेने लगा तो चार व्यक्तियों ने यह नारा लगाया बाकी शांत
ही रहे…वह महिला अब थोड़ी परेशानी महसूस करने लगी…उसे
अब यह फुहर लगने लगा था। मेरा प्रथम हिचकिचाना,
दो लोगों का यह नारा न लगाना इस देश का दुर्भाग्य ही है…।
जो मरीज़ थे बहुत परेशान किंतु स्वभावगत अत्यंत सरल…।
सब देख रहे थे मैं पूरी तरह से उनसे Relate कर चुका था…
और उनकी सरलता से प्रभावित भी हुआ और जाना ऐसे
को जितना प्रेम करो उतना नहीं उससे दस गुना ज्यादा
पाओगे…।
गाड़ी वरोदरा में रुकी और मैं कुछ लोगों के
साथ वहाँ का प्रसिद्ध ठंडा दुध पीने को उतरा…बाते भी
हो रही थीं…दिल्ली या मुंबई अच्छा के मुद्दे पर बहस
छीड़ गई…धीरे-धीरे यह बहस हिंदी पर आकर रुकी
की मुंबई के लोग ज्यादा शालीन होते है क्योंकि वहाँ
साधारण आफिस में भी अंग्रेजी बोली जाती है…मुझे
ये शब्दचुभे मैने कहा---भाई साहब विडम्बना यही है
कि वहाँ के लोग मराठी नहीं तो अंग्रेजी बोलना पसंद
करते हैं क्योंकि वे हिंदी को औपनिवेशिक भाषा मानते
है…और तुम उत्तर प्रदेश के होकर भी अंग्रेजी के हिमायती
बने हो…जाकर कुछ अच्छी चीजों को सीखों राष्ट्र भाषा
के सम्मान को बनाये रखना हमारा कर्तव्य भी है…
वह मुझसे नाराज हो अंदर चला गया…मेरे साथ सरदार
जी (डाक्टर) ने मेरे तर्क को सुना और बहुत प्रभावित भी
हुए उन्होंने मुझसे कहा तुम जीवन में जरुर आगे बढ़ोगे…
यह प्रशंसोक्ति सुन कर मैने अपने ब्लागर मित्रों को
धन्यवाद दिया जिसके प्रभाव से यह सब संभव हुआ
था…।गाड़ी आगे बढ़ी खाने का समय हुआ किंतु इस
गाड़ी में Pantry Car न होने के कारण दूसरे स्टेशन से
खाना लिया जाता है…इसके कारण यह ठंडा और थोड़े
विलम्ब से आता है…खाना खाने के बाद बहुत देर बाद
जब उस महिला ने खुद को Relate किया तो बातें शुरु की;
बातें थी--- bc##%%bz##%% आदि अब हमें तो भारतीय
अंग्रेजी आवे है…वही वाली…I can walk english...
I can talk english bcoz english is a very funny language...
भाई यहाँ हाथ तंग है हमारी…फिर भी ठहरे हम "बिहारी"
बोले बिना मानेंगे कैसे सो सिनेमाई बात सफर आरंभ
हुआ…मैडम ने कहा 'कभी अलबिदा न कहना' का Theme
is##%%very##%%good मैनें बात को काटा कहा--
आप अमेरीका से नहीं Hollywood से प्रभावित हैं--
Britney,Angelina,Brad Pitt आदि के रहन सहन से।
वह चुप हो गईं फिर राज कपूर और Big B पर जाकर
बात का अंत हुआ…मैं देख रहा कि ये लोग हिंदी जानते
हुए भी बोलना नहीं चाहते उनको शर्म महसूस होती है…
लेकिन वही बात "National Integration" जो सामने थी
वह यह की नीचला तबका भी हमारी बात को सुन रहा
था और ऊपरी तबका परेशान होकर भी कम-से-कम
17 घंटे तो उनकी बेबसी को करीब से देख रहा था और न
चाह्ते हुए भी स्वयं को जोड़ रहा था…और रात काफी हो चुकी
थी सफर का दंभ मजेदार था मन उलझन में पर प्रसन्न
हुआ था इस नये प्रयोग से और दूसरे को करीब से
जानकर लाचार को देखकर और बाते करके…"गरीब रथ"
का सफर नये उजाले में प्रवेश कर चुका था…मैं मन में कई
भ्रांतियाँ कई कमियों को अंदर पा सर झुकाए मंजिल की
ओर उतर बढ़ चला…मेरे अन्य सह-साथी शायद यही सोंच
उद्देश्य कोटि पर निकल चले…।

"सफर में बहुत कुछ हुआ लेकिन लेख की लंबाई के कारण
यहीं पर कलम रुक गई क्रमश: में लयबद्धता टूट जाने के कारण
भी आगे जारी रखने का मेरा मन नहीं हुआ।
"
धन्यवाद!!!
4:00 PM
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4:00 PM

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अशुभ की समस्या…!!!


ऐसे काफी सारे प्रश्न हैं जो
हमें उद्वेलित करते रहते हैं…
और उनमें सबसे महत्व-
पूर्ण दार्शनिक दृष्टिकोंण से
है कि जब इस जगत का
निर्माता ईश्वर है और जो
परम शक्तिशाली भी है तो इस जगत में अशुभ क्या कर रहा
है…अगर ईश्वर करुणामय व दयालु है…सभी को प्रेम करनेवाला
है तो इस जगत में तो चातुर्दिक आनंद ही आनंद होना चाहिए
था। मानव जीवन में दु:ख-संताप-लोभ की व्यापकता और भयभीत
कर देनेवाली प्राकृतिक विपदा कई रुपों में स्नेही स्रष्टा के विचार
को अविश्वसनीय बना देते हैं।
मेरा मानना है कि एक सर्वशक्तिमान सत्ता से
अशुभ की अपेक्षा नहीं की जा सकती…परमात्मा ने जब इस
प्रकृति को रचा तो मानव को कोरे कागज की तरह ' जगत ' थमा
दिया और साथमें शाश्वत बुद्धि और विवेक को दिया जिसका
उपयोग वह स्वतंत्ररुप में कर सकता था…।लेकिन संतुलन की
जो स्थिती हमें रखनी चाहिए थी वह लोभ-संवरण के कारणत:
टूट गई… जो परमशुभानुभूति है वो अशुभ का निर्माता नहीं हो
सकता !!! ये तय है!!! ईश्वरवादियों के इस तर्क में अभिनंदन पूर्ण
तर्कना विद्यमान है।इस जगत में दृष्टिगत "पाप" कोई अशुभ
नहीं जिसे दार्शनिकों ने इतना महत्व प्रदान किया है…क्योंकि
अशुभ की समस्या तो तब आयेगी जब सच में अशुभ विद्यमान
होगा।जो "पाप" इस जगत में सर्वत्र व्याप्त दिख रहा है…वस्तुत:
वह एक "परम शुभ" ही है, जो मानव जिज्ञासा के लिए रहस्यमय
अंधकार है…जो विश्व विकास की संभावना है, यह न होता तो
संघर्ष की उत्पत्ति संभव ही न हो पाती…यह तो एक " विरोधी शुभ "
है… चूंकि मानव सामान्यत: सीमित ज्ञान वाला प्राणी है जो जिज्ञासा
के कारण ज्ञान को सक्रिय करता रहता है…अगर यह न होता,वह या
तो जड़ बन जाता या इस पृथ्वी के पूर्ण सर्ग के पहले ही प्रलय की
क्रिया आरंभ हो जाती…। अभी तो जगत पूर्णत: खिला ही नहीं है तो
विकास ऊर्ध्वमुखी है लेकिन जैसे ही यह खिल उठेगा यह वापस उसी
स्थिती में लौट आएगा…क्योंकि जन्म और मृत्यु दोनों ही
परम सत्य है…।
11:31 AM
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11:31 AM

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'सपनों' के साथ अठखेलियाँ…!



जीवन की तरंग या किसी सांझ की
शांत... कहानी का उल्लेख, सोंच है वो
मेरी या मेरे अनुमानों की मूर्त गीता...
या फिर मेरी कल्पनाओं के साथ मेरा
अपना जागृत प्रयोग......

सुने...! क्या कुछ कहती हैं ये अंतरंग वीणा...
शिखा से स्वरुप में आनंद निखार
प्रतिवेदनाओं का अदभुत निर्माण
कुछ दिव्य-दिव्य सा भंवर पड़ा है
गहराते हुए अंधकार में...

मात्र उसी के अभिज्ञान में ठहर कर,
जब-से, अबतक सोया हुआ हूँ
जागृत मनु की वृत्तियों में...
बस इंतजार है उस लौ की जिसमें
करवटों पर करवटें हों और निशा के
शांत लहर में स्नेहा-मंथन की बात चले...

कुछ शाम की तन्हाईयों की
कुछ ज्योत्सना के प्रच्छद-पट पर
भावयुक्त संवेदना का अविराम आभास पले,
रुठ जाओगी आज अगर तुम इस
थमे हुए-से अनजाने मोड़ पर
हर पल शायद घुल जाएगा याद
तुम्हें ही कर-कर...

मैं प्रातः था इस जीवन में जब
त्रियमा ने अंधकार रचा...पर...कैसा था...
वो रुप सुहाना जिसके विभिन्न रश्मियों ने
अपना चैतन्य विस्तार किया,

कैसे भूल जाऊँ मैं...
उस पल की अनंत उत्सुक्ताओं को...
उस पल की अनंत गति, धड़कते हृदय
में उठते गहरे श्वास की ज्वार को
कैसे...? कैसे...? मैं छोड़ जाऊँ तुझे...

चाहे कल्पना हो या हक़ीक़त, झाँकना तो
सभी को पड़ता ही है, पीछे जाकर खुद को
तलाशना उन रश्मों को उन वादों को
निभाना तो पड़ता ही है, अनचाहे हृदय से
या कुछ देर से...एक बार ही सही,
पास तो जाना पड़ता ही है.

मेरे प्राणों की साथी मेरे संभावनाओं की संगनी......
वो आकृति ही तो इस मन की ओट से
झाँक-झाँक कर कह रही है---

"पथ हजारों थे जिसपर मैं ठोकर खाकर पड़ा हुआ था,
चलना सीखा ही तेरे आने की गुँज सुनकर,
जो तू चली जाएगी इसकदर...पथ- से,
क्या मैं लौट नहीं आऊँगा...उसी भंवर में..."
1:05 PM
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1:05 PM

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पुत्र का ख़त पिता के नाम…!!!



अनायास ही मन हो आया लिखूं आपको
अपनी भाषा का एक ख़त, पिता हैं आप !
शायद समझेगें पुत्र का दर्द…।

आज जाकर वह वेला आई है जब
उभरे है कागज पर अक्षर…
मेरे परम आदरणीय पिता श्री,
कैसे हैं आप!

जमाना बदल गया…हमारा साथ बदल गया,
तरीके और हालात बदल गए…
बाते तो दूरभाष पर हो ही जाती थीं
आप भी सोंचेगे यह पत्र मैं लिख रहा हूँ…क्यों ?

मगर शब्दों की आकृति में जो भावनाएँ
उठती हैं वह कलमों के सहारे पन्नों पर
छपती जाती हैं…
लिखते हुए कम-से-कम एहसास में डूबा
होता हूँ…इसकारण मैं यह पत्र लिख रहा हूँ।

लाख हठ थे मेरे, कुछ जो मेरे लिए होते थे
और कई जिसे करने को चाहता था यह 'मन'
उस पर आपका अंकुश बहुत बुरा लगता था…

स्कूल में जब मैं भटकता जा रहा था,
अपने रास्तों से लगातार दूर होता जा रहा था…
उस वक्त मेरा हाथ थाम कर या यों कहें
मेरा लक्ष्य टांग कर कंधों पर, पाने को
मंजिल रास्ता आंखों में दृष्ट किया.…

बढ़ता आकार मेरा चिंता बढ़ा रहा था…
जिस प्रदेश (बिहार)का था विद्यार्थी…वहाँ
अवसरों की कमियाँ आपका हृदय व्यथित
कर रहा था…

मैं जो था आपके सपनों का पंछी…जो
पूरा कर सकता था सारे अधूरे सपने को…
इसलिए भेजना चाहते थे कोई और परदेश
को…सुना दिया "माँ" ने आपकी बड़ी आकांक्षा
को और देख रहा था उस परदेश में,
अनेकानेक हाथों से खुद को होता तौल।

सहमा था मैं डरा हुआ…भीतर-भीतर आँसू थे,
वह वक्त भी जल्द आ गया जब मैं रेलगाड़ी
पर बैठा खिड़की से हाथ हिला रहा था…आज
सभी को छोड़ मैं कहीं और जा रहा था…
खुद को अकेला महसूस कर आपको
मन-ही-मन बहुत कोस रहा था…

आखिरकार उतर आया मैं अलबेले महफिल में,
बदला हुआ नजारा…परिवेश बदला था…
भाषा बदल गई थी…सब नया-नया सा था…
आँखें चमक जाती थीं दर्पण उभरा आता था ।

अपने कोमल हृदय पर अब बोझ महसूस
कर रहा था,जिम्मेदारियों को लाद कर यहाँ
जो आ पहुँचा था…सच करने को वह अधूरा सपना!

वक्त और स्थान बदला तो ढंग बदला रंग और
सैलाव भी…मैं उमंगों की धुन में बढ़ता चला गया
और पीछे छोड़ आया आपके पुराने क्षण…

अब आपके विचार मेरे सिद्धांतों को गवारे नहीं थे,
मैं यह समझने लगा था, अब जमाने की मैं तस्वीर
बनाऊँगा…अब आपके सपनों में कोई करतब नहीं
दिखता था.…

आया था मैं "IAS" बनने, जो बिहारियो का
सिद्ध अधिकार है…कई बार यहाँ की रंगीन छटा
में भटक भी जाता था…मगर 'कलक्टर' बनने के
जोश से दौड़ भी पड़ता था…

प्रोफेसर हैं आप और गुरु भी हैं
बनाना चाहते थे पुत्र को एक "IAS";
अब अलग तो होने थे न विचार हमारे
और अलग हो रहा था मैं…

घर की समस्त परेशानियों से दूर
न कभी पैसे - न कोई चिंता
जी लगा रहे पढ़ाई मे मेरा मात्र यही
थी न आपकी मंशा.…

सच कहूँ ! मैं अब सब भुला रहा था
ना ही पढ़ने से खुद को जोड़ पा रहा था
और ना ही आपको नजदिक लाकर कोई
अंकुश चाहता था…

कभी आश्रमों में कभी योगियों के
संगत में पड़ गया था मैं…पता नहीं क्यों
इस राह निकल आया था…

आया वह भी वक्त जब "IAS" बनने को मन
मचला और शुरु हुई तैयारी…कोचिंग जाने लगा
वहाँ भी मन भटकने लगा और मैं…
बालाओं के नाज़ उठाने लगा…।

घर से दूर आकर भी इतना गमगीन
कभी नहीं हुआ था…जितना उसे याद कर-करके
तकीया भींगोता था…रात-रात भर अंजनों में
उसको संवारा करता था…
प्रत्येक पल न जाने क्यों बेचैन सा रहता था।

लेकिन कभी न सोंचा, आपको "एक दिन" के किसी
अंतरे में…जिस सपने को पूरा करने आया था
भूला चुका था इस मैख़ाने में…

दो प्रयास तो ईमानदार था मेरा "IAS" का
उस वक्त साथ थी मेरी 'प्रेरणा' भी बहुत करीब से
मगर जो बीता वक्त था उसे लौटा न पाया मैं…।
मेरे जीवन का उद्देश्य बदल गया परिभाषाएँ
अलग हो गईं…

अब आपको याद करना भी बेईमानी लगता था,
कहाँ याद आता था वह सबेरा…जब परेशान होता
देख मुझे सीने में भींच कर पुचकारा करते थे,
बारिश में छाते को मुझपर डाल देते थे
गोद में मुझे उठाकर मीलों चला करते थे
मैं आराम से हाथों को झूला मान हिल्लोरियाँ
लेता था…

पर अब सबकुछ उलट-पलट गया है…किंतु
गुनहगार आपको भी मैं मानता हूँ…
क्यों नहीं फट्कारा आकर थप्पड़ की गुंज
क्यों नहीं सुनाई आपने…मुझे आपसे ज्यादा और
कौन जान सकता है…
हक है आपका इतना तो मुझपर वैसा ही जब
पहली बार स्टेशन पर गाड़ी चढ़ाया था…
क्यों समेट लिया उस हक को मुझ नादान की
भूलो से…

अत्यंत लज्जित हूँ मैं पिता जी…नहीं लाज
आपकी सपनों की रख पाया…
आपके सपनों का यह पंछी बहुत ऊँचा नहीं
उड़ पाया…।

लेकिन फिर भी मैं एक पंछी हूँ और
उड़ना मेरा धर्म…आसमान के उस छोर
तक तो नहीं पर पुन: नये ठौर को पाने
मैं कहीं और निकल गया………


आपका प्रिय आत्मजात
"दिव्याभ"
1:59 PM
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1:59 PM

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नि:सम्बल "मन"



हर श्लोक में एक मंथन है
हर ओज सत्यं शिवं सुंदरम है,
आज का है यह विकट व्याख्यान
हर भेद में एक अभेद है
हर दृष्ट में कुछ अदृष्ट है;

वो समृद्धि छुप-छुप कर लुभा रही
मेरे चित्त-चितवन को अनंत अलंकारों से
क्या पास वो अपने बुला रही…या
संकेत है उसका निरझर पल;

क्या हो रहा है…इस दिवस में
क्या बीत चुका इस काल से आगे
मत कुरेद ओ मालिक मेरे…
हृदयाकाश को सब ठहर जाता है…
उसके ख़्वाबों में जिज्ञासा बनके…।

प्रयाण पाता या तलाश करता…पर
मन की विस्तार का क्या होगा
इस चिंतित स्वर और व्याकुल चित्त
पर कब और कहाँ हस्ताक्षर होगा

मत पूछ ऐ मन मेरे ठहर जा…
कौन है जो तुझे जो यहाँ पहचानेंगा,
इस काला-युग के अवशेषों पर तेरी
अकुलाहट को कहाँ त्राण मिल पाएगा,

एक हवा का झोंका चल पड़ता है
व्यार बनकर उड़ चलता है…
क्या पता इसे है…उन समयों का
जो साथ यह अपने ले उड़ता है,

हर सांत में एक अनंत छुपाकर
जीवन की डोर को मृत्यु तक ले जाकर
आती है नित्य नये-नये रहस्यों में
आशाएँ-अभिलाषाएँ लेकर…

विश्वास नहीं हो रहा है…इसबार
चली ले उड़ मेरे अनुरागी वृत को
संघर्ष की सूचना पर भी मैं
बैठा रहा स्तब्ध बनकर…

जब सबकुछ बंधा-बंधा सा था
सबकुछ सधा-सधा सा था…
फिर कैसी यह विपदा है आन पड़ी
पिंजरे के पीछे कैसी होगी अभिलाषा मेरी,

यह घनावरण कहाँ से आया
यह सन्नाटा कैसा है…कुछ नजर
यहाँ क्यों नहीं आ रहा…
यह अंधियारा यह आवरण कैसा है,

जाता कहाँ किस ओर किधर मन
सिमट रही बेख़ौफ जिंदगी नि:शब्द रुदन
के आईने में …बिखरती हुई सांसों में,
आज भागना चाहता हूँ मन से…
लेकिन , सफर "समाप्त" हो चुका!!!

2:27 PM
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2:27 PM

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