माँ तू कहाँ हैं...?
चार कौए उर्फ़ चार हौए
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खाएँ और गाएँ
वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनाएँ।
कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में
दुनिया-भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गए
इनके नौकर चील, गरूड़ और बाज हो गए।
हंस मोर चातक गौरैयें किस गिनती में
हाथ बाँधकर खड़े हो गए सब विनती में
हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगाएँ
पिऊ-पिऊ को छोड़ें कौए-कौए गाएँ।
बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को
कौओं की ऐसी बन आयी पाँचों घी में
बड़े-बड़े मनसूबे आये उनके जी में
उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उड़ने वाले सिर्फ़ रह गए बैठे ठाले।
आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं चार कौओं का दिन है
उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना
लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना!
भवानीप्रसाद मिश्र
Broken Eyes 1
नया साल मुबारक!!!!
आज आ गया है मुझसे मिलने और नया आरंभन,
बस दो पल के लिए बिखर जाऊँ उस घने आगोश में,
रोज नया आरोहन हो ऐसे सघन आगोश में॥
नये साल की मेरी तरफ से ढेरों शुभकामनाएँ।
HAPPY NEW YEAR TO ALL MY FRIENDS
मेरा गीत, मेरी मधुशाला…!!!
"काफी समय बीत गया रुह चुराने में…
शायद जीवन और लगे उसे पास लाने में"।
इस दौरान मेरे एक मित्र मधुमये जी जो संगीतकार हैं,
उन्होंने मुझे प्रेरित किया गीत लिखने के लिए और बस
कलमबद्ध गीत की संगीतमय रुपरेखा तैयार हो गई…
वैसे तो ये बहुत पहले ही संगीतबद्ध हो चुका था किंतु
समयाभाव के कारण पोस्ट नहीं कर पा रहा था…
लीजिए प्रस्तुत है मेरा लिखा और मधुमये जी का संगीत
आप सबके सामने…
कैसा लगा ये जरुर बताएँ… वैसे भी पहला प्रयास था मेरा गीत
लिखने का…।
धन्यवाद!!
प्रीत की लगन या मुक्ति मार्ग
आगोश में निशा के करवटें बदलता रहता है सवेरा
लिपटकर उसकी संचेतना में बिखेरता है वह प्रांजल प्रभा…
संभोग समाधि का है यह या अवसर गहण घृणा का
फिर-भी तरल रुप व्यक्त श्रृंगार, उद्भव है यह अमृत का…
उत्साह मदिले प्रेम का…
जागते सवेरे में समाधि…
अवशेष मुखरित व्यंग…
या व्यंग इस रचना का…
शायद मेरे अंतर्तम चेतना का गहरा अंधकार
जो अव्यक्त सागर की गर्जना का उत्थान है…
सालों से इतिहास बना वो कटा-फटा चेहरा
कहना चाहता है कुछ मन की बात…
दिवालों की पोरों में थी उसके सुगंधी की तलाश
प्रकृति के संयोग में आप ही योग बन जाने की पुकार…
विस्तृत संभव यथा में लगातार संघर्ष कर पाने का यत्न
किसके लिए… उस एक संभव रुप लावण्य की प्रतीक्षा…
सारा दिवस बस भावनाओं की सिलवटों में बदल ले गई
आराम की एक शांत संभावना…
शायद इस कायनात में रंजित नगमों की वर्षा में सिसकियों
की अभिलाषा ही टिक सकी हैं…
आज इस निष्कर्ष पर जाकर ठहर गया है मन
ना अब किसी की प्रतीक्षा ना किसी की अराधना
खोल दृष्टि पार देख गगन के वहाँ कोई नहीं है
किसी के पीछे…
वहाँ उन्मुक्त सिर्फ मैं हूँ…"मैं"
खोकर एक संभावना आगई देखो कितनी संभावना…
मधुर प्रीत का सत्य संकरे मार्ग से होकर मुक्ति में समा गया…
नजरे उठकर जाते देख तो रही हैं उस उर्जा को पर
अब चाहता नहीं की वो वापस उतर आये मेरे अंतर्तम में…।
=> आप सभी को मेरी ओर से बीते दिपावली की ढेरों बधाइयॉ
क्या करूँ अपनी फिल्म को लेकर बहुत व्यस्त था… बस खुशी इस बात की
है कि मुझे दो फिल्में और मिल गई हैं, जिसका निर्देशन और लेखन मैं ही
कर रहा हूँ…। मेरी पहली Commercial Film, "AUR- Life Is A Story"
है जिसमें संभवत: Kon-Kona-Sen Sharma को लिया जाए… अभी बात
चल रही है… इसकी Shooting लंदन में मार्च में शुरु होगी जिसकी बजह से
व्यस्तता बढ़ गई है … बस आप सब दुआ करें की मैं अपने लक्ष्य को पूरा कर
लूँ… चूंकि इसका निर्देशन मेरा है तो मुझपर काफी बोझ भी है…।कुछ मन में
भावनाएँ उठी सो पता नहीं क्या लिख दिया है…।
आशा का नभ है विशाल…।
जाने कितनी ही सुबह बीत गई रातको तकने के बहाने पर याद रहा
मेरा यही साथी जो साथ चला था
तन्हाइयों में उस वक्त…
अपने फिल्म को लेकर इतना व्यस्त
हो गया हूँ कि कब रात आती है
और चली जाती है पता ही नहीं चलता।
वैसे मेरी फिल्म का Promo
सीरिफोर्ट ऑडिटोरियम में 20 मई को
दिखलाया गया था जिसमें दिल्ली की
मुख्यमंत्री ने भी शिरकत ली थी…
कुछ तकनीकी पक्ष का काम बचा है
सो उसी को पूरा करने में लगा हूँ।
आज बहुत दिनों बाद आप सब से
कुछ कहने का दिल हुआ तो आशा
(Hope) को साथ ले आया…।
स्वयं के अंतस में अपने को गहरे उतार कर देखो,
वहाँ अंजन की काली रेखा में भी आंनद घटित होता
ही होगा…
जाग हो जाये अगर जाग से ज्यादा,
वहाँ स्वप्नों के आंगन में भविष्य सार्थक होता
ही होगा…
स्वतंत्र हो कर निर्भीक नये आवरण में झांक कर देखो
वहाँ पार सीमाओं के परम विराट जागरित होता
ही होगा…
बाहर निकल कर सघन अंधकार से आसमान में देखो,
वहाँ आशा के नभ-मंडल में उल्लास योग का संगम होता
ही होगा…
"मात्र सुख की आशा में कहाँ जीवन का हर्ष बहता है,
वह तो सत्य प्रवाह है… जो अनंत गहरे में भीतर ही भीतर
इठलाता है…।"
मैं हूँ यही मेरा है नव-निर्माण…

नियती नहीं मेरा किसी सोये हुए इतिहास का
उद्घोषणा प्रकृति का नवीन वर्तमान हूँ…
मन की उदास वृत्ति बेचैन शोक का नाद नहीं
राह दृष्टांत धवल ज्योति का पूँज हूँ…
गहन अंधकार निस्तेज आवरण अविद्या शरणार्थी नहीं
प्रस्फुटित काया प्रज्ञा भूषित क्रांति का पुत्र हूँ…
हारा हुआ संग्राम कोई मृतकों की परिपाटी नहीं
शिखर मुकुट उद्देश्य जीत का जागा हुआ कटाक्ष हूँ…
पंचरत्नों की माया मात्र जीव सकल निर्माण नहीं
निर्गुण शांत प्रार्थना का परम आनंद हूँ…
मात्र मृदा की संतान उसकी तामसी चेतना नहीं
थोड़ा उपर बहुत उपर अनंत का विस्तार हूँ…
क्रंदन कोलाहल सृष्टि का केवल पंख नहीं
सात्विक प्रेम परमात्मा का अद्भुत श्रृंगार हूँ…
विपद तपस्चर्या शून्य योग खंडित जिज्ञासा स्वयं नहीं
जीवन में बहता राग-उल्लास…महान संन्यासी हूँ मैं…।
प्रेम पंथ है…आत्म प्रतीति।

पता नहीं मुझे इस जिंदगी के और कितने मायने हैं…
समझ नहीं आता कौन दु:ख के, कौन सुख के हैं…
सभी को साथ लेकर परखना……? संभव नहीं,
वक्त निकलता जाता है, कई उलझे मोड़ छोड़ देता है
मदिले संरचना में इसके फिर देवदास चला आता है
अपने को भींगाकर रस में पतला सा दर्द फैला जाता है
तन्हाई है…इंतजार भी…प्रतीक्षा है अपने-आप की
तलाश लेकिन करता है मन… दूर रह रहे साथी की
एकांत मन जो मानता ही…नहीं!!!
जाकर ले आ उसे… अब छोड़ भी यह मायूस बिस्तर
भाग उधर…चल दौड़ भी जा… खो न जाये यह सुहाना मंजर
साथ है जबतक साथी का अम्बर सौरभ बरसाता है
मूल रुप में प्रकृति विकास क्रीड़ा में रम जाती है…
सभ्यता का पथ रुककर थोड़ी देर…
संस्कार देवी से पूछेगा…वो कौन दिव्य संगत में है
किसकी यह रचना होगी…
विस्तार सत्य का मनन हृदय में… कोलाहल संयत वातावरण होगा
जटिल भावना… लम्बी उदासीनता में भी
चाँद नयनों में खिला होगा…
आगोश में लिपट कर दिवा-रात्री
सपनों के सुमधुर गीत… पागल शमा…
घायल कामना का अंतरंग प्रीत...
आशाओं के चादर में लिपटा वह सिकुड़ा मेरा प्रेम।
सात्विक कर्म मुझसे अलग होने की, आज आज्ञा मांगता है
फिर से नये मदिरालय को नया दास दे जाता है…
खुद से अलग होकर उसमें…खुद को ही ओझल कर दूं
सौ बार डूबना हो फिर तो क्या, संग्राम सार्थक कर दूं
आनंद ढूँढने निकला था कोसो दूर गगन में
आज मगन हूँ अपने ही इस नीले शांत मन में…।
Nalanda -- हमारी धरोहर है।
"नालंदा" जिसका अर्थ है ज्ञान बाँटने वाला, जहाँ से भारत में सांस्कृतिक व
दार्शनिक विचारधारा का सूत्रपात हुआ। जिस समय विश्व अपने अस्तित्व को
अंधकार में तलाश रहा था, हमारी नालंदा अपनी ज्ञान गंगा से जगत के
पाप-पंकिल-शरीरी को पवित्र करने में जुटा था। उस जमाने में विश्व ध्यान-योग
की शिक्षा इसकी गोद में बैठकर पूरा कर रहा था। पटना (बिहार) से लगभग
90 km की दूरी पर स्थित यह महान धरोहर अपने कर्णधारों की राह तक
रहा है, जो कभी हमारे ज्ञान-गौरव का साधन हुआ करता था आज स्वयं की
विगति से त्राण कर रहा है…।
भारत का गौरवशाली इतिहास शक्तिशाली मगध शासन के नेतृत्व में शुरु हुआ,
जिसकी राजधानी राजगृह थी; यहीं से विश्व के दो महान धर्मों का
जन्म हुआ, जहाँ से एक राष्ट्र की भावना, समन्वय सौहार्द व आध्यात्मिक
जीवन का प्रचार-प्रसार आरंभ हुआ आज अपने अस्तित्व की तलाश कर
रहा है जो निश्चित ही एक बड़ा आश्चर्य है। और यही क्रिया विश्व के प्रथम
आवासीय विश्वविद्यालय नालंदा के साथ भी घटा। हम मात्र हाथ पर हाथ
रखे एक दूसरे की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहे हैं…।
सामान्यत: ऐसा माना जाता है की नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना पाँचवीं
शताब्दी के आसपास कुमार गुप्त के द्वारा हुई पर इतिहास के पन्नों को
और खंगाला जाए तो पता चलता है कि इसका अस्तित्व द्वितीय शताब्दी से
ही बना हुआ था क्योंकि नागार्जुन जो यहाँ के विद्यार्थी व बाद में शिक्षक भी रहे
उनका काल यही माना जाता है…। हर्षवर्धन व पाल शासन काल में यह अपनी
प्रज्ञा से फलता-फूलता रहा किंतु इसके उपरांत धीरे-धीरे यह गहरे अंधकार में
समाता चला गया जहाँ से पुन: बाहर नहीं निकल पाया।
महान चीनी यात्री हुयेनसांग और इत्सिंग ने कई वर्षों तक यहाँ सांस्कृतिक व
दर्शन की शिक्षा ग्रहण की, नालंदा के विषय में काफी कुछ कहा है--- "उस
जमाने में विश्व के कई जगहों, सुमात्रा, चीन, थाइलैंड कोरिया, श्रीलंका आदि
जगहों से विद्यार्थी ज्ञानार्जन करने आते थे पर इस विश्वविद्यालय की नामांकन
प्रक्रिया बहुत मुश्किल थी… विद्यार्थियों को तीन कठीन परीक्षा स्तरों से
होकर गुजरना पड़ता था जो शायद विश्व की पहली ऐसी प्रणाली थी। यहाँ
10000 विद्यार्थियों एवं 2000 शिक्षक के रहने की व्यापक व्यवस्था थी
जिसके लिए 300 कमरे बने थे तथा साथ और अकेले रहने की भी
अलग से व्यवस्था की गई थी। यहाँ की नौ तलीय पुस्तकालय में 3
लाख से ज्यादा जनरल व पुस्तकें मौजूद थी जो अपने विनाश के समय
लगभग 6 महिनों तक जलती रही। इसके गौरव पर पहला आघात
हूण शासक मिहिरकुल के द्वारा किया गया बाद में बंगाल का तुर्क शासक
बख्तियार खिलजी ने 1199 के आसपास इसे पूरी तरह से समाप्त कर
दिया…। जिसकी बेड़ियों में वह आज भी बंधी हुई अपनी मुक्ति के उस
उज्जवल दिव्य प्रकाश की आस में आँख फाड़े बैठी है। यह हमारे देश
का दुर्भाग्य है कि हम अपने इतिहास की भूलों को सुधारने के बजाये
लगातार दोहराते जा रहे हैं।
मैं इसकी पुनर्स्थापना के लिए किए जा रहे प्रयास में ज्यादा विस्तार में
नहीं जाऊँगा पर हमारे पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब ने जरुर इसे रास्ता दिया
आगे आने का। सिंगापुर, चीन, जापान व दक्षिण-कोरिया ने भी सहयोग
देने का वादा किया है और 2009 तक इसके पुनर्जीवन को अमल में लाने
का प्रयास किया जाएगा…। पर अगर ध्यान से देखा जाए तो नालंदा आज
भी धूल में पड़ा अपनी मलिनता पर अश्रु बहा रहा है। कोई छोटा प्रयास भी
विकास का अभी तक सरकार के द्वारा नहीं देखने को मिला है… आज
मैं जब कभी टेलिविज़न देखता हूँ तो "अतुल्य भारत" के विज्ञापन
पर मेरी दृष्टि पड़ती है तो थोड़ी खुशी भी होती है पर अफसोस इसबात
का है कि आजतक नालंदा के विषय को न तो लोगों तक पहुंचाया
गया न कभी दिखलाया गया और आज सरकार इसके विकास पर
बड़ी-2 बातें करती नजर आती है… वहाँ न तो बाहर से आये लोगों
के लिए रहने की व्यवस्था है ना ही कोई पुस्तकालय है जहाँ
बैठकर नालंदा के इतिहास पर दृष्टिपात कर सकें।
आज कुछ मित्रों की सहायता से इस महान संपदा की रक्षा के लिए
थोड़े कदम बढ़ाये गये हैं, जिसमें पहला प्रयास इसके उपर चलचित्र
बना कर किया जा रहा है और इसका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है
जिसका उद्देश्य है जन-जन तक इसके गौरव तत्वों को पहुंचाना
जिससे इसपर कुछ काम किया जा सके… और भी कई सारे ऐसे
काम हैं जो हमारे मित्रगण रात-दिन एक कर उसे क्रियान्वित करने
में जुटे हैं… सरकार का प्रयास आजतलक तो नकारात्मक ही रहा है
पर हम अपने सामर्थ के अनुसार क्या ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते
जिससे इसके विकास में एक ईंट जुड़ जाए चाहे वो वैचारिक सहायता
ही क्यों न हो…।सबसे बड़ा आश्चर्य तो आप सभी को यह जानकर
होगा की मुझे अपनी फिल्म बनाने में कितनी परेशानी हो रही है
क्योंकि नालंदा के उपर इंटरनेट पर कुछ एक पेज के सिवा कोई
सामग्री ही उपलब्ध नहीं है…। ये है असल दुर्भाग्य हमारे वर्तमान
का जो हम इतिहास को सहेज ही नहीं पा रहे हैं… कहा जाता है
की इतिहास की महत्ता ही ये होती है कि भविष्य में दोबारा वो
गलतियॉ न की दोहराई जाए जो हमने की हैं।
"कब तक घुटेगी तू इन संस्कारों में,
कब तक बहेगी इन उपेक्षाओं में
सालों से खड़ी है तू यहीं अवशेषों पर
जो प्रकट है क्षण-क्षण वर्तमान पर
मुरझा गई है तू एक याचक बनकर,
ज्ञान-देवी तू साधना सागर
चिंतन का तू अंकुरण है,
सत्य सजाया हृदय महल में
विश्व जागरण का तू प्रस्रवण है
एक तू ही तो सुंदरा है वन में
मेरे राज्य की गहरी धुंध में
गिर जाने दे अपने सजल अश्रु
इन विखंडित शिलाओं पर,
त्याग निस्तब्धता सांझ की
आध्यात्म-वाणी का आह्वान कर,
उठ जाग अभी महानिद्रा से,
बढ़ा दो कदम बोधि-वृक्ष की तरफ
स्वयं की अलौकिक वसुंधरा पथ पर
जीवांत सुरभि… शांत लहर में,
गीत रच ले अनंत स्पर्श मधुर ध्वनियों की
सत्य यही है दिव्य देवी…
तेरा आदिकाल ही तेरा, वास्तविक उषाकाल है।"
"मेरा आज आपसे इस लेख के लिए टिप्पणियों की प्रतीक्षा
नहीं है वरन यह की आप अपने वैचारिक तत्वों को मुझसे
बांटें कि वहाँ पर और क्या किया जा सकता है विकास
के संदर्भ में। मुझे जरुर अपनी योजना से अवगत कराएँ
शायद कुछ एक तत्वों को मैं अपनी फिल्म में भी शामिल
कर पाऊँ।"
धन्यवाद।
आगाज़ सजग; वास्तविकता मौन…।

कतरा-कतरा जीवन की डोर सिमटती
जाती है संध्या के लाल गर्भ में…
बेख़ौफ नाचती आहिस्ते से
घटती जाती है सांसों में…
दौड़ अंधी, भाग दुनियाँ की
बैचैन चेहरों में उगती है
मायूस पल तृष्णा की कैद
आजाद मन पर चढ़ती जाती है…।
सभी भाग रहे बस औरों से आगे-आगे,
किस ओर कहाँ किसलिए?? है यह बस प्रारब्ध!!!
खुद से या वक्त को छोड़
बोझिल झुके कंधे अपने अस्त की
राह तकते हैं…
नहीं छूटती गति चक्र की खाली वृत
आगे वक्त से जाकर जीने में
वर्तमान रुद्ध हो जाते हैं…
तत्पर है जो, साथ वक्त के चलने को
पागल विक्षिप्त कहे जाते हैं…।
भाग ओ दुनियाँ!!! भाग किधर भी…
भागेगा कितना तू उसी चक्र में
घूमता-घूमता कई बार वहीं…फिर और वहीं
संताप, अविद्या में घुटता ही जाएगा…।
विमुख पतित आवरण, संस्कार घसीटता
सभ्यता की चौखट पर अपना त्राण मांग रहा…
दोष है किसका? नहीं जानते हम,
दोषों के पिछे भागते हम, मूल स्वरुप
स्वच्छंद वयस को रौंदते जाते हैं…
होती है अज्ञान की अज्ञानता से भिड़ंत
लहूलुहान निस्तेज होकर लथपथ
विशाल नीले चादर में रेंगना जानते हैं…।
भरता नहीं ये जख्म कभी…अपनी सलाख़ों
से ही गोद-गोद कर जो बनाएं हैं…
भाव-प्रेम-स्नेह-करुणा डूबती है इस लहू-आंगन में
शोर तड़पते रुह की…
तिमिर-गहराई में लुप्त हो जाती है,
बढ़ती तपीस… धधकती ज्वाला में
प्रतिबद्धता अकुलाई है… बढ़ते हुए इस
अनजाते दर्द से मानवता भरमाई है…
कोई जागे…जाग से आगे, लाकर दे
आनंद-पुष्प के पुलकित हार…
सशंकित हतप्रभ नयनों में भर दे
आशा-गंगा की धार…
रोपे वह ऐसा अंकुरण जो करे सार्थक
यह नव-निर्माण… ।
सभी को दीपावली की बहुत सारी शुभकामनाएँ।

एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में अचानक मुझे मुंबई से बाहर जाना
पड़ रहा है… कुछ दिन तो लग ही जाएँगे आने में, तबतक
आप सभी को मेरी ओर से----
"सभ्यता-संस्कृति-संस्कारों का है यह प्रज्ज्वलन
या भूत से वर्तमान का है यह संवरण
मेरे लिए तो यह दीपक भविष्य का है परावर्तन॥"
"दीपावली" की बहुत-2 शुभकामनाएँ।
"दिनकर"… एक बलंद आवाज ।

"बढ़कर विपत्तियों पर छा जा, मेरे किशोर! मेरे ताजा!
जीवन का रस छन जाने दे,तन को पत्थर बन जाने दे।
तू स्वयं तेज भयकारी है,
क्या कर सकती चिनगारी है?"
राष्ट्रकवि 'दिनकर' विरचित ये पंक्तियाँ आम मानव में
भी विशिष्टता का बोध कराने सकने में सक्षम है… विगत
कुछ दिनों पहले ही राष्ट्रकवि 'दिनकर' जन्मशताब्दी
समारोह में विमोचित पुस्तक "समर शेष है" में मेरी जिस कविता को स्थान
मिला वही यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ… मेरी इस कविता के संदर्भ में
"मुरली मनोहर जोशी" ने भी आयोजकों से पूछा कि यह कविता किसकी लिखी
हुई है… जिससे निश्चय ही, आत्म-गौरव सा प्रतीत हुआ…।
"कहीं दूर नक्षत्रों से वह चेहरा
संकेत अनेकों प्रेषित करता है
अपने देदीप्यमान संस्कारों के
करवटे बदला करता है…
समझें जो अभिव्यक्ति उसकी
आधार विनय का वह देता है…
व्यक्तित्व था वह क्षितिज सकल
अप्रतिम ज्ञान की दीर्घ लकीर
वैशिष्ट्य ओजमय काव्य दृष्टि से
भारत का जिसने सुप्रभात देखा
सिमरिया गाँव से टाँग वह झोला
पन्नों में कुछ सांसें छोड़ा…
बीज क्रांति का लिए हृदय में
दिनकर बन वीरों का आह्वान किया
हिंदी का गौरव मसाल जला
भावी जगत का उद्घोष किया
उत्साह विद्यार्थियों का कलमबद्ध कर
राष्ट्राभिमान भवितव्य की ओर मुखरीत किया…
उर्वशी की आत्म-सौंदर्य से संस्कृति
के कई गंभीर अध्याय लिखे…
कुरुक्षेत्र में बिखरे ज्ञान महिमा को
चुनकर बनाया आध्यात्म महल
चिंतन जो बन गये अक्षर…शोध
संस्कृति में व्याप्त होकर उद्देश्य
लिए राष्ट्र पीढ़ी का उत्थान…
गुंज रही आज-भी काव्य शैली उनकी
चंचल किशोरों के तन-मन में
हुंकार करता हुआ नवयुवक अग्रसर है
अपने दिव्य क्रांति के पथ पर
जीवन लक्ष्य साध्य हुआ था
शब्द खिला जब पंखुड़ियाँ बनकर
गहन आदर्श शांत ज्वाला का
संधान किया कर्ण बनकर...
रश्मिरथी है वह मनोविज्ञान
कविवर का अंतर्दृष्टिविस्तार
युवकों के भीतर नित्य होते महाभारत
कुंठीत उमंग अज्ञान भूमि में
चैतन्य का वह महा-अवसान
रुंधा हुआ कल आच्छादित भविष्य
रोज ही करते एक विषपान…
खोला द्वार कर्ण के द्वारा
विचलित मन को शांत किया
जख्मों से फूटते फव्वारे…लेप स्नेह का
लगाकर उपासना से मानवता में मुस्कान दिया…
पीढ़ी-दर-पीढ़ी जब कभी सुनेगी उनकी
रचनाओं के हर्ष गीत
प्रेरणा पंकिल शब्दों में ऊर्जा की
अभिव्यक्ति उधेल उदासी शिखर पर
कर्मठ स्वरुप निहित वीरता का सूत्रधार करेगी…
राष्ट्रकवि वह नूतन दीपक
भारत का सच्चा महानायक
सागर जैसी गर्जना थी उनमें
विद्यार्थियों के लिए नया जागरण
सत्य… कोलाहल बनकर उफनता था
साहस का समर बांधे हुए…
आवाज भविष्य की मौन प्रेम का
गौरव और प्रतीक शांति का
अवर्णनीय सक्षम उद्यमी कदम बढ़ाया
तीसरे विश्व… नई राह की ओर...
उद्घोषक थे क्रांति के वह शाश्वत ज्ञान की पराकाष्ठा भी
समग्रता के प्रतिबिंब थे वह आत्म-सिक्त आगाज भी
याद करें उनकी कार्यशैली और गहराई टटोलें आत्मन की
लेकर चले कलम उनकी ही जोड़े कड़ी अभिनव जीवन की।"
महात्मा…Gandhi...।

हमारे परम पिता, गुरु एवं कर्णधार
कई मायनों में हमसे बिल्कुल समान
और थोड़े जुदा-जुदा भी। आज विश्व
अहिंसा दिन भी घोषित किया गया जो
इस महान पुरुष के लिए विश्व श्रद्धांजलि
है। भारत ही ऐसा देश है जहाँ इस महा-
पुरुष की सबसे ज्यादा आलोचना की गई
मगर वह आज भी अपनी प्रज्ञा से शोभित
है… आज जो कविता मैं प्रस्तुत करने जा
रहा हूँ, वह मेरे पूर्व लेख "महात्मा और सत्याग्रह" का ही विस्तृत
रुप है…चूंकि यह कविता "महात्मा" पर लिखी मेरी प्रिय कविता है, जो उस लेख में
छिप-सी गई थी…।
“जन्मा था हमारा भविष्य आज ही साधारण शरीरी ले
विश्वास समेटे नेत्रों में देखा दासत्व, युग का रे…
दर्शन जिनका काल से आगे…सत्य था पीछे उनके
टेक चला था राम रे…
नि:संग अहिंसा की कर्मठता का पाठ पढ़ाते अपने
उषा काल में…
जिसके निर्भीक पांव से पड़ा मलीन था छत्र ब्रिटिश
का राज रे…
भारत के क्षितिज पर बनकर पिता चंदा के जैसे चमकते
हैं बापू बनकर राम रे…
अनुनय-पूर्वक लड़ा संग्राम, उतार फेंका अपने चीवर को
मानवता के आदर्श में…
कई चेहरों में अद्भुत वह चेहरा बनकर उतरे थे
प्राणों में स्वाभिमान रे…
तस्वीर बनाई नये भारत की जीवंत किया उसे
विश्व-इतिहास में…
दिया अनूठा ज्ञान सत्याग्रह का विश्व को, ऐसे थे वह महात्मा.…
जिनकी दुनियाँ करती गान रे…
सभी आधारों का समन्वय कर दे दिया वतन आजाद
हमारे हाथ रे…
वे महान नहीं आदर्श ,गर्व- स्वाभिमान यही थी उनकी
पहचान रे…
वह मानव थे या महा-मानव, पर थे
भारत के लाल रे…
पारितोषिक है यह स्वतंत्रता… जीते जा रहे… उल्लास इसकी
सुगंध दिशाओं में फैला है, ऐसा आश रे…
आओ याद करें उस पुण्य आत्मन को
शत-शत नमन आदर-प्रणाम के साथ रे…
कि विश्वास हो पर्वत के जैसा
जो ढकेले चक्रवात रे…
पूरा हो लक्ष्य हमारा बढ़े देशाभिमान रे…"
हे राम, हे राम, हे राम
राष्ट्रकवि "दिनकर" जन्मशताब्दी समारोह- एक झलक
सुनूँ क्या सिंधु!! मैं गर्जन तुम्हारा स्वयं युग-धर्म का हुंकार हूँ मैं।
इन पंक्तियों की प्रखरता को देखकर सहज ही अनुमान लगाया
जा सकता है कि मैं बात किसकी करने वाला हूँ… इसकारण
बताना भी उचित नहीं समझता… आप स्वयं विद्वान हैं।
बड़े दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि इतना बड़ा आयोजन
दिल्ली शहर में ही हुआ और सभी ब्लागर मित्र इससे वंचित
रह गये… मैंने काफी प्रयास किया कि आप सभी को
अवगत कराया जा सके पर सभी व्यर्थ। मैंने चिठ्ठाकार
को कम से कम 5-6 पत्र लिखे होंगे पर वह क्यों नहीं पहुंच पाया,
एक हास्यास्पद स्थिती उत्पन्न करता है… नित्य दिन
एक हल्की सूचना देता पत्र भी मेल बाक्स में आ जाता
है मगर जब इस आयोजन की सूचना मैं………???
कुछ लोगों के Email मिल जाने के कारण मैं व्यक्तिगत
रुप से संपर्क साध पाया…कुछ आये भी…।
मेरा उद्देश्य मात्र यह था कि राष्ट्रकवि दिनकर पर,
जिनके भी अच्छे काम हों वह अपनी लेखनी भेज सकें…
स्मारिका "समर शेष है" के लिए जिसमें स्वयं प्रधानमंत्री और
कई सारे मंत्रीगण ने अपना बौद्धिक सहयोग दिया है…
इस विचित्र स्थिती पर एक ही पंक्ति याद आती है---
"सच है, सत्ता सिमट-2 जिनके हाथों में आयी
शान्तिभक्त वे साधु-पुरुष क्यों चाहें कभी लड़ाई???"
इस समारोह का उद्घाटन स्वयं माननीय गृहमंत्री जी
ने किया…।
मुरली मनोहरजोशी, शिंदे जी, वशिष्ठ नारायण सिंह,
पूर्व सांसद डा0 रत्नाकर पांडे व श्री अरुण कुमार आदि कई
महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने भाग लिया…।
ज्योति प्रज्वलन कार्यक्रम माननीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल
के कर-कमलों द्वारा…।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मारिका " समर शेष है…"
का विमोचन।
इस स्मारिका में मेरी भी कविता "दिनकर-एक बलंद आवाज"
को जगह मिली साथ ही हमारी प्रिय ब्लागर एवं प्रेम शिक्षिका
रंजना भाटिया जी ( रंजू) की भी रचना प्रकाशित हुई है…।
"मानव जब जोर लगता है,
पत्थर पानी बन जाता है।"
काफी बड़ी संख्या में सरल और विद्वत-जनों ने भाग लिया…।
"शान्ति खोलकर खड्ग क्रांति का जब वर्जन करती है,
तभी जान-लो, किसी समर का वह सर्जन करती है…।"
जैसी महान गीत रचना का आनंद उठाते जन…।
"मैं विभा-पुत्र जागरण गान है मेरा
जग को अक्षय आलोक, दान है मेरा।"
समारोह का अंत भी होना ही था… जब गीता का
अंत आ गया तो यह तो आम सभा ही थी…
पापी कौन? मनुज से उसका न्याय चुरानेवाला?
या कि न्याय खोजते विघ्न का शीश उड़ानेवाला?
इस चित्र में मेरा अपना परम प्रिय अनुज अदिति नंदन जी
( दाहिने से चौथे मुंड चश्मा लगाए), तथा इस समारोह के
प्रमुख आयोजक श्री नीरज जी (अध्यक्ष, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह
दिनकर स्मृति न्यास)…तस्वीर में बांयें से दूसरे व्यक्ति।
इसप्रकार से समारोह का अंत हुआ तथा मिडिया वालों
ने भी काफी सहयोग दिया सहारा समय, दूरदर्शन, जी न्यूज
E tv से इसका सीधा प्रसारण किया जा रहा था तथा आज तक
और स्टार न्यूज से खबरें दिखाई गईं। जिसप्रकार राष्ट्रकवि
"दिनकर" को लोगों ने याद किया वह अद्भुत था…।
मैं तो हमेशा ही यही कहता आया हूँ कि---
"वह कवि नहीं उन जैसे जो नारी में एक नई नारी
प्रकृति में भी सुंदरा नारी ही देखा करते थे…
वह कवि नहीं महाकवि थे जो जन-जन में
हुंकार देखा करते थे… भारत का नव -भविष्य
कंप- कपाते लबों पर ओज घोला करते थे…।"
दिनकर जी की एक सुंदर पंक्ति से इसका अंत करना
चाहूंगा…
"फूलों की क्या बात? बाँस की हरियाली पर मरता हूँ।
अरी दूब, तेरे चलते, जगती का आदर करता हूँ।
इच्छा है, मैं बार-बार कवि का जीवन लेकर आऊँ,
अपनी प्रतिभा के प्रदीप से जग की अमा मिटा जाऊँ॥"
वैसे दिसम्बर माह में नीरज जी ने लाल किला
में पुन: इसका अयोजन करने का निर्णय लिया है
जिसका शुभारंभ प्रधानमंत्री जी के हाथों द्वारा किया जाएगा…
इसके लिए अभी से तैयारी
शुरू कर दी गई है…।
पता नहीं कुछ तकनीकी कारणों से मेरी पहले की रचना मिट गई…
चूंकि मैं अभी अपनी पहली Short Film ---
"The Man In The Mirror" की वजह से काफी
व्यस्त चल रहा हूँ… ब्लाग पर भी आने का मौका
कम ही मिल पाता है… उपर से पुरानी रचना मिट गई
खैर कुछ-2 तो लिखता ही रहेगा मन।
वंदेमातरम्… Vande Maatram...।

शक्ति है… विश्वास है…
आजाद भारत का वरदान है
यह शब्द हमारी "आन" है
इसकी उन्माद हमारी "जान" है
उद्घोष हमारी "शान" है…
आत्मा के अंतरतम में गुंजता यह
पावन गीत मेरे हर्ष का आधार है…
वंदेssssss मातरम…………………
अखंड भारत का गौरव…एक पवित्र जाग है…।
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आओ मिलकर जोड़ कर को गा लें हम भी गीत नया,
बुन लें मन के साजों से आज कोई संगीत नया…
बांध शमा इस पावन पर्व पर नतमस्तक हो
चरणों में माता के अर्पण अपना द्वेष करें…
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अभी तक आसमां अधुरा है
तकता राह अपने कर्णधारों का…
सभी सितारे टिमटिमाते…इशारा
कुछ संदेश हमें हैं दे रहे…
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बढ़ो… और बढ़े चलो…
भर दो सौमनस्य-सौहार्द अश्रुरुद्ध राह संकेतों पर
व्यथित दुखद इस जीवन की सिसकियों पर…
ध्यये निष्ठ होकर तन्मयता से खोदो एक
रास्ता आनंद विस्फारित उजले उपवन तक
फैलाकर अपने शांती का उज्जवल पंख
दु:स्वपन में डुबे भाग्य पर कुछ ललित पंक्तियाँ पढ़ दो…।
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बढ़कर सीना तान सामने विपत्तियों के
बना लें रास्ता भाव रचना की अटल होकर
नियति की कस्ती को अयाचित करूणा, स्निग्ध प्रेम
से थामे… खुशहाली की अभिव्यक्ति देकर…
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सौंदर्य प्रेम का अनुसरण ही
मानव में सत्य का अवतरण है
इस नश्वर जगत का यह प्रकाश
प्रेरणादायक मुस्कान का प्रज्वलन है
बेचैन मन के अनवरत संघर्ष में ही
उस नवयुग का उत्थान समर है…
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संताप अग्नि में जलकर ही
पैदा होता है एक प्रेम मशाल
दुर्बलताओं पर विजय करने का
द्वार खोलता है यह अविष्कार…
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अनुगमन करते अपने संस्कृति-संस्कार का
बढ़ चलें आशा का हर्ष दीप लिए
आनंद के सिंचन से धो दें कलुषित दामन को
अंधकाराच्छादित यौवन में प्रकाश स्थित करें…
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संग्राम बड़ा यह विकट है पर
गहराई इसमें अनंत खुशियॉ पूरित है
फूलों की सेज सजा, दर्शन का ओढ़ उढ़ौना
भीतर के प्रभापूर्ण गरिमा से अंधे युग का
नाश… अभिनव क्रांति का शिलान्यास करें
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फैला शक्तिशाली भुजाओं को
आलिंगन दें हम अनेकों प्राणों को
बढ़ायें अपने कदम आशा के नभ मंडल की ओर
मानवता के उत्थान उसके अज्ञानों की ओर…
जीवन की निस्तब्धता से आगे ही तो
स्वाधीनता का महान उषाकाल है…।
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वंदेमातरम…वंदेमातरम…वंदेमातरम
जय हिंद!!!
इतना सबकुछ बाहर है…"फिर-भी"……

अज्ञानों पर बैठी गीता-गान है,
नि:सीम शून्य अनंत में
पंखों पर उड़ती आशा है,
उत्सव ही उत्सव मदिरालय में उसके,
क्यों अंतरतम खाली है…
इतना सबकुछ बाहर है, फिर-भी भीतर खाली है…।
ममता और करूणा है, कण-कण में
बहती लहरों की तरह परिवर्तित संसार,
नया-नवीन-नूतनता लिए नित्य एक पतवार,
स्तर पर स्तर स्थापित,
क्यों विपन्नता धन कुबेर है…
इतना सबकुछ बाहर है, फिर-भी भीतर खाली है…।
अंतहीन क्षितिज की विधा में
अबाध दृष्टि दौड़ती जाती है,
आवरण-आवरण में आनंद
मदीले सौरभ में घुलती जाती है
क्यों सदियाँ परेशान…मन भयभीत आँचल सूना है…
इतना सबकुछ बाहर है, फिर-भी भीतर खाली है…।
प्रकृति की कोख में पुलकित ज्ञान-विज्ञान
तत्वों के भीतर कई और तत्वों के उत्सव हैं,
व्यापक युक्ति-युक्त गाम्भीर्य
चरणों से बहती पवित्र गंगा
घट-घट में विराजे विराट हैं,
क्यों अंतस में कृशता…गहरा अंधकार स्थित है…
इतना सबकुछ बाहर है, फिर-भी भीतर खाली है…।
पत्थरों से भी पाषाण बनी नियति
हृदय में कुंठित स्वतंत्रता है,
कर्म-योग है पार जाने का रास्ता
पर अनुमानों में स्थित विनाश है,
कल्पना की उड़ान आच्छादित जीवन, माया बनी सारथी है…
इतना सबकुछ बाहर है, फिर-भी भीतर खाली है…।
देख नहीं पाता सौंदर्य… विक्षिप्तता
दर्शन का आयाम है,
लगातार भागता "मौन"… कोलाहल
हलचल का आभास है,
उपर वर्षा नीचे नदियाँ, फैला सागर
अत्यंत विशाल है,
क्यों मानव का हर कोना ही बना अभिशाप है…
इतना सबकुछ बाहर है, फिर-भी भीतर खाली है…।
"हमारे विचारों में गहनता है,
मगर देख जरा सजग नेत्रों से
बाहर कितनी सघनता है
फिर भी एक सरलता है,
यही तो परमात्मा कृत जगत की
अद्भुत प्रखरता है…"
"अविद्या बैठी है भीतरी नक्षत्रों पर
आकांक्षा की काली स्याही है
महाभारत होती है नस-नस में
तृष्णा की प्यास ललचाई है
बाहर तो भेद में ही अभेद छिपा है
मानव में ही तो ईश्वर बैठा है…"
सांझ में ही भोर भी है,
स्वप्न में ही साकार भी है
जिज्ञासा में ही आशा भी है,
आकार में ही निराकार छवि,
पुकार में ही वह आत्मन है…।
इतना सबकुछ मेरे चारों ओर फिर-भी भीतर का कोना खाली है…।
Weeping Hormony...

Before I say anything I would like to introduce
एक "BIHARI" सौ बीमारी…।

हम भी भारत माता के वक्ष हैं
देखो न…कैसे गंगा बह रही है दूध की तरह…
'सफर' का कोई कारण तो होता नहीं…राह सामने हो तो कदम
कुछ पाने की लालसा में आगे बढ़ ही जाते हैं…इस सफर में
और लोग भी कदम साथ कर लें तो हैरानी का कोई कारण नहीं,
थोड़ी दूर तलक चलें साथ तो काफ़िला बन जाता है…रस-आनंद,
वाद-विवाद का शोर हो जाता है…यही इस माया नगरी (नगर तो
जान पड़ता है पर माया नहीं दिखी अबतक) मुंबई के गहरे काले
सागर की व्यथा है…महासागर में आधे तक समाये हुए भी पानी
की बोतलों से सागर को ही नहलाए हुए हैं…यहाँ हिंदी की सारी
कहावतें चरितार्थ होती दिखती हैं…किसी को माया मिलती है तो
राम नहीं…राम मिलें तो माया नहीं, अब परेशान दोनों हैं…।
हमें तो लग रहा है कि जो संदेश सुनाने यहाँ आये थे वह
बंबईया अंधी-दौड़ में ही कहीं न खो जाए सो सचेत होते हैं और काम
पर ध्यान ज्यादा…भटकाव पर कम देते हैं…अब क्या किया जाए
जब कदम ही भटने लगे तो कलम स्वयं ही भटक जाएगी तो
आश्चर्य न करना…।इस भीड़ में (नहीं समझे…मुंबई कीSSS) एक बिंदु
मैं भी हूँ (खुद की तारीफ क्या करना…इतनी तो हैसियत है ही) जो
सफर का राही है, वह भी "मुंबई लोकल"…यहाँ के लोगों को बड़ा फक्र
है इस पर कि आधी जिंदगी इसी 'लोकल' में आते-जाते कट जाती है,
बाकि करने को कुछ ज्यादा बचता नहीं, मगर मुझे अफसोस है कि
मेरे पास तो आधी जिंदगी ही पड़ी है उसका क्या होगा…।तो भाई
हम भी कई मुंड में से एक झुल रहे थे 'लोकल' की कमर की लचक पर
तभी एक 'शब्द' जो ऊर्जा का रुप होता है, बचपन में पढ़ा था कि अमर
होता है, कहीं से उड़ता हुआ मेरे कानों में पहुंचा किसी ने 2-4 मिनट पहले
कहा होगा " एक बिहारी सौ बीमारी"। अब तो बिहारी होने के झूठे दंभ
(जो खतरनाक ज्यादा होता है) ने मेरे कान के रिसिवर का एंटिना खड़ा
कर दिया…आँखें खोजी जासूस बन गईं…मन रुपी फोन का 'कालर आइडी'
चमकने लगा कि यह कौन साहब हैं…अब खड़े थे लोकल में तो गर्दन
के अलावा कुछ भी हिला नहीं सकते थे तो वही मेरा 'रडार-स्केल' का
काम भी कर रहा था…तभी पड़ी निगाह तोते की चोंच जैसे मुख वाले
बंधु पर जो अपने सामने वाले साथी प्रेमी को हुल दे रहे थे…होंगे कोई
50-55 साल के, माथे पर पसीना हाथ नहीं हिलने के कारण स्वरुप
फर्श रुपी चहरे पर बह रहा था…तो परेशानी शुरु और ऐसी स्थिति में
जो सबसे पहला शब्द याद आता है वह है "बिहारी"!!! क्यों भाइयों…
बिहारी…बिहारी लोग…बिहारी भाषा…सब-के-सब अनोखे हैं इस राष्ट्र के लिए
जैसे बाकियों को आजादी पहले मिली हो तो अनुसंधान बिहार पर ही…।
लगता नहीं कि हमारी मानसिकता कितनी पतित और ओछी है…
इस देश की सीमा को पार करते हीं…हमारा सारा गर्व पंजाबी-बंगाली-मराठी-
गुजराती-डेलाइट होने का पेट की पंखुड़ियों में ही कैद होकर रह जाता है; वहाँ
भारतीय होना ही काम को और ज्यादा कठिन बना देता है। इंग्लैंड
बहुत सभ्य है…ऐसा मैंने सुना और पढ़ा है, वहाँ पहुंच "शिल्पा" चिल्लाई
भेद हो रहा है, भेद हो रहा है…वह भी रंगभेद!!! मगर हमें तो अपने
देश के भीतर हो रहे इस भेद की छाया नहीं दिखती…कर तुम भी वही
रहे हो लेकिन तुम्हें सूझता नहीं…हमारे देश में यह भी एक तबका है
जो नस्ल भेद से परेशान है…अब तो यह कौम भी बन रहा है "बिहारी कौम"
आने वाले 50 सालों में यह हो जाए तो आश्चर्य नहीं। तो भारत में इस रुप
में दो कौम ही आतंकवादी हैं (ऐसा सामान्यत: माना जाता है) एक मुसलमान…
दूजा बिहारी…कई भाइयों को यह शब्द नागवार गुजरे पर "बिहारी धर्म" जो धर्म
होने के समस्त कारक को पूरा करता है…जिसे देखो चेहरा…भाषा…ढंग इत्यादि
से ही भांप जाता है…बिहारी!!! हमें तो नाज है अपनी भाषा पर जो भारत
की सबसे मधुरतम भाषा है( लयबद्ध संगीतमय हिंदी) हमारे पिछड़ेपन का
जिम्मेदार कौन??? पर जितना हम नहीं रोये अपनी इस स्थिति पर सारा
महान भारत हंस रहा है…कोई दंगा हो तो जिम्मेदार "मुसलमान"… कोई भी
घोटाला हो तो जिम्मेदार "बिहारी"…बड़ा उपकार किया है रे सांवा हमरा उपर
जरा बताई दो इनका भी कि ऐसे ही हम गब्बर ना बने हैं…हम तो औरों के
परिणामी कारण है रे…।
आज भी मैं यह सोचता हूँ कि अगर नौकरशाही तबकों में हमारा वर्चस्व
कायम नहीं होता तो बिहार की हालत अफ्रीकी काले लोगों से ज्यादा नहीं होती…
जबकि आने वाले वक्त में अगर भारत को रोटियाँ कोई खिलाएगा तो वह राज्य
"बिहार" ही है, यह मैं नहीं कह रहा वर्ल्ड बैंक चटका लगा रहा है…। एक लड़ाई
बिहारियों को और लड़नी है वह है अपने ही देश में ही अपनी आजादी की…
"Struggle For Self respect, FREEDOM"






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