
हमारे रेलमंत्री की उत्कृष्टतम सोंच…"गरीब रथ" वैसे यह
गरीबों की सवारी बिल्कुल नहीं लगती पर शायद रेलमंत्री
अपने जातिवाद की छाया से मुक्त नहीं हैं तो यहाँ गरीबों
गरीबों की सवारी बिल्कुल नहीं लगती पर शायद रेलमंत्री
अपने जातिवाद की छाया से मुक्त नहीं हैं तो यहाँ गरीबों
में भी स्तरीकृत विभाजन किया गया है…यानि गरीबों में
जो अर्थवान हैं यह उनकी सवारी है…एकदम झकास "ट्रेन"।
यह तो हुई "गरीब रथ" की बात…अब मैं यहाँ क्या कर रहा
था? पेशे से तो मैं पत्रकार हूँ नहीं…!
इधर कुछ दिनों से मैं मुंबई में था कुछ काम के संदर्भ में…
अचानक वह कार्य कुछ दिनों के लिए बढ़ गया और मैं
अपने "अनुज" प्रेम के कारण यहाँ खिंचा चला आया क्योंकि
अपने छोटे भाई को छोड़ पहली दफा दूर गया था।
तुरंत वहाँ से चलने के कारण टिकट आरक्षण मिलना मुश्किल
था अत: मुंबई से पहली दफा रवाना होने वाली "गरीब रथ"
में यह संभव हो गया और मैं स्टेशन पर!!! वहाँ सहारा न्यूज
का Coverage हो रहा था…भाई एक नया न्यूज जो था गरीबों
की राजधानी का और हमेशा नेता-फिल्मी लोग हीं क्यों हर
तरफ छाये रहें अब गरीबों की बारी हैं…इसप्रकार तमाम अटकलों
पर विराम लगाते हुए माननीय रेलमंत्री "लालू प्रसाद यादव"
ने वजट से पूर्व तीसरी "गरीब रथ" मुंबई-से-दिल्ली चला ही दी!!!
मैं अपना स्थान ग्रहण कर चुका था मेरे आस-पास कई लोग
आकर और बैठ गये…बिल्कुल नई उम्दा सुविधाओं से लैस
यह ट्रेन कई मामलों में राजधानी को पिछे छोड़ देती है और
वह है…आधी कीमत में सारी सुविधा यहाँ तक की रफ्तार भी…!!!
17 घंटे में मुंबई से दिल्ली वो भी 3AC में वैसे इसमें Chair Car की
जो अर्थवान हैं यह उनकी सवारी है…एकदम झकास "ट्रेन"।
यह तो हुई "गरीब रथ" की बात…अब मैं यहाँ क्या कर रहा
था? पेशे से तो मैं पत्रकार हूँ नहीं…!
इधर कुछ दिनों से मैं मुंबई में था कुछ काम के संदर्भ में…
अचानक वह कार्य कुछ दिनों के लिए बढ़ गया और मैं
अपने "अनुज" प्रेम के कारण यहाँ खिंचा चला आया क्योंकि
अपने छोटे भाई को छोड़ पहली दफा दूर गया था।
तुरंत वहाँ से चलने के कारण टिकट आरक्षण मिलना मुश्किल
था अत: मुंबई से पहली दफा रवाना होने वाली "गरीब रथ"
में यह संभव हो गया और मैं स्टेशन पर!!! वहाँ सहारा न्यूज
का Coverage हो रहा था…भाई एक नया न्यूज जो था गरीबों
की राजधानी का और हमेशा नेता-फिल्मी लोग हीं क्यों हर
तरफ छाये रहें अब गरीबों की बारी हैं…इसप्रकार तमाम अटकलों
पर विराम लगाते हुए माननीय रेलमंत्री "लालू प्रसाद यादव"
ने वजट से पूर्व तीसरी "गरीब रथ" मुंबई-से-दिल्ली चला ही दी!!!
मैं अपना स्थान ग्रहण कर चुका था मेरे आस-पास कई लोग
आकर और बैठ गये…बिल्कुल नई उम्दा सुविधाओं से लैस
यह ट्रेन कई मामलों में राजधानी को पिछे छोड़ देती है और
वह है…आधी कीमत में सारी सुविधा यहाँ तक की रफ्तार भी…!!!
17 घंटे में मुंबई से दिल्ली वो भी 3AC में वैसे इसमें Chair Car की
व्यवस्था भी है…और!!! 'क्या बच्चे की जान लोगे'।
well dressed attendant...!!! काफी सारे स्टाफ इत्यादि…इत्यादि।
हाँ यहाँ पर दो स्तर के लोगों के बीच की दूरी भी कम हो गई
जो "National Integration" में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर
सकता है…ऐसा भले रेलमंत्री न चाहते हों की वर्ग संघर्ष मिटे पर
यह उपलब्धि उनकी ही है…!!! बताता हूँ कैसे…
सभी लोग अपना-अपना स्थान ले रहे थे…बहुतों ने लालू जी को
धन्यवाद किया खास कर व्यापारियों ने जिन्हें सप्ताह में 4 बार
मुंबई-दिल्ली आना-जाना पड़ता है…और नई गाड़ी ने प्रस्थान किया
नये सवेरे की ओर… अब--
well dressed attendant...!!! काफी सारे स्टाफ इत्यादि…इत्यादि।
हाँ यहाँ पर दो स्तर के लोगों के बीच की दूरी भी कम हो गई
जो "National Integration" में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर
सकता है…ऐसा भले रेलमंत्री न चाहते हों की वर्ग संघर्ष मिटे पर
यह उपलब्धि उनकी ही है…!!! बताता हूँ कैसे…
सभी लोग अपना-अपना स्थान ले रहे थे…बहुतों ने लालू जी को
धन्यवाद किया खास कर व्यापारियों ने जिन्हें सप्ताह में 4 बार
मुंबई-दिल्ली आना-जाना पड़ता है…और नई गाड़ी ने प्रस्थान किया
नये सवेरे की ओर… अब--
"'रथ' चला परस्पर बात चली
सम-दम की टेढ़ी घात चली"॥
नये-नये लोग आते गये और कारवां चल पड़ा…।
हमारे आमने-सामने कुल आठ लोग थे-->व्यापारी-डाक्टर-मरीज-
मैनेजर-एक महिला और "मैं" सबसे अलग सिर्फ "साक्षी"
महिला इसकारण की सभी के सामने मात्र सुकुमार तरुणी…
ज्यादा अंग्रेज-कम भारतीय!!! मैं शान से भीतर गया था मेरे
करीब में हरियाणा प्रांत के एक मरीज बैठे थे…जो तंग हाल भी
थे और लकवा से परेशान…पहले मैं अंदर से कुढ़ा लेकिन
व्यावहारिक नैतिकता की बाहों में तुरंत आ गया और मैने बाबा
से संबोधित किया अपना समझ उनकी पत्नी ने मुझसे अपने
सीट के बारे के पुछा कि हम सही जगह पर हैं न…।
व्यापारी महाशय ने कान में मोबाईल FM radio का पीन
लगाया और जोर-जोर से लालू प्रसाद के कहकहे लगाने लगा…
इन रेडियो वाले के साथ क्या बताऊं बैठे हैं सफर में और
कान में टिमटिमा लगा कर अपनी ध्वनी से लोगों को परेशान
भी करते हैं और तन्हाई का एहसास भी दिलाते हैं, सुनने वाला
अच्छे गानों पर सर हिलाता जाएगा और आप मुख खोल
कर उसकी हरकत पर यह सोंचते रहेंगे की कौन सा गना'वा
चल रहा है…ससुर के !! मैनेजर भाई ने कहा कि यार सीट
छोटी है इसका एलाईनमेंट ठीक नहीं है…ससुरा ये महाशय
"दो रुपये में जंगल खरीदने" निकले थे…कुछ लोगों की
यह आदत होती है कि चाहे कुछ भी हो वह शिकायत करने
की अपनी प्रकृति से नहीं चुके'गा…।बात हो ही रही थी तबतक
"जय हिंद" की गुंज पीछे से आने लगी…देखा एक सिपाही
ने कुछ किया हुआ था…। मेरे सीट के पास आने पर…उन्होनें
नये सफर पर बधाई दी…और "जय हिंद" का नारा लगाने को
कहा…पहले मैं भी हिचकिचाया पर तुरंत देश भक्ति का ज्वार
उफान लेने लगा तो चार व्यक्तियों ने यह नारा लगाया बाकी शांत
ही रहे…वह महिला अब थोड़ी परेशानी महसूस करने लगी…उसे
अब यह फुहर लगने लगा था। मेरा प्रथम हिचकिचाना,
दो लोगों का यह नारा न लगाना इस देश का दुर्भाग्य ही है…।
जो मरीज़ थे बहुत परेशान किंतु स्वभावगत अत्यंत सरल…।
सब देख रहे थे मैं पूरी तरह से उनसे Relate कर चुका था…
और उनकी सरलता से प्रभावित भी हुआ और जाना ऐसे
को जितना प्रेम करो उतना नहीं उससे दस गुना ज्यादा
पाओगे…।
सम-दम की टेढ़ी घात चली"॥
नये-नये लोग आते गये और कारवां चल पड़ा…।
हमारे आमने-सामने कुल आठ लोग थे-->व्यापारी-डाक्टर-मरीज-
मैनेजर-एक महिला और "मैं" सबसे अलग सिर्फ "साक्षी"
महिला इसकारण की सभी के सामने मात्र सुकुमार तरुणी…
ज्यादा अंग्रेज-कम भारतीय!!! मैं शान से भीतर गया था मेरे
करीब में हरियाणा प्रांत के एक मरीज बैठे थे…जो तंग हाल भी
थे और लकवा से परेशान…पहले मैं अंदर से कुढ़ा लेकिन
व्यावहारिक नैतिकता की बाहों में तुरंत आ गया और मैने बाबा
से संबोधित किया अपना समझ उनकी पत्नी ने मुझसे अपने
सीट के बारे के पुछा कि हम सही जगह पर हैं न…।
व्यापारी महाशय ने कान में मोबाईल FM radio का पीन
लगाया और जोर-जोर से लालू प्रसाद के कहकहे लगाने लगा…
इन रेडियो वाले के साथ क्या बताऊं बैठे हैं सफर में और
कान में टिमटिमा लगा कर अपनी ध्वनी से लोगों को परेशान
भी करते हैं और तन्हाई का एहसास भी दिलाते हैं, सुनने वाला
अच्छे गानों पर सर हिलाता जाएगा और आप मुख खोल
कर उसकी हरकत पर यह सोंचते रहेंगे की कौन सा गना'वा
चल रहा है…ससुर के !! मैनेजर भाई ने कहा कि यार सीट
छोटी है इसका एलाईनमेंट ठीक नहीं है…ससुरा ये महाशय
"दो रुपये में जंगल खरीदने" निकले थे…कुछ लोगों की
यह आदत होती है कि चाहे कुछ भी हो वह शिकायत करने
की अपनी प्रकृति से नहीं चुके'गा…।बात हो ही रही थी तबतक
"जय हिंद" की गुंज पीछे से आने लगी…देखा एक सिपाही
ने कुछ किया हुआ था…। मेरे सीट के पास आने पर…उन्होनें
नये सफर पर बधाई दी…और "जय हिंद" का नारा लगाने को
कहा…पहले मैं भी हिचकिचाया पर तुरंत देश भक्ति का ज्वार
उफान लेने लगा तो चार व्यक्तियों ने यह नारा लगाया बाकी शांत
ही रहे…वह महिला अब थोड़ी परेशानी महसूस करने लगी…उसे
अब यह फुहर लगने लगा था। मेरा प्रथम हिचकिचाना,
दो लोगों का यह नारा न लगाना इस देश का दुर्भाग्य ही है…।
जो मरीज़ थे बहुत परेशान किंतु स्वभावगत अत्यंत सरल…।
सब देख रहे थे मैं पूरी तरह से उनसे Relate कर चुका था…
और उनकी सरलता से प्रभावित भी हुआ और जाना ऐसे
को जितना प्रेम करो उतना नहीं उससे दस गुना ज्यादा
पाओगे…।
गाड़ी वरोदरा में रुकी और मैं कुछ लोगों के
साथ वहाँ का प्रसिद्ध ठंडा दुध पीने को उतरा…बाते भी
हो रही थीं…दिल्ली या मुंबई अच्छा के मुद्दे पर बहस
छीड़ गई…धीरे-धीरे यह बहस हिंदी पर आकर रुकी
की मुंबई के लोग ज्यादा शालीन होते है क्योंकि वहाँ
साधारण आफिस में भी अंग्रेजी बोली जाती है…मुझे
ये शब्दचुभे मैने कहा---भाई साहब विडम्बना यही है
कि वहाँ के लोग मराठी नहीं तो अंग्रेजी बोलना पसंद
करते हैं क्योंकि वे हिंदी को औपनिवेशिक भाषा मानते
है…और तुम उत्तर प्रदेश के होकर भी अंग्रेजी के हिमायती
बने हो…जाकर कुछ अच्छी चीजों को सीखों राष्ट्र भाषा
के सम्मान को बनाये रखना हमारा कर्तव्य भी है…
वह मुझसे नाराज हो अंदर चला गया…मेरे साथ सरदार
जी (डाक्टर) ने मेरे तर्क को सुना और बहुत प्रभावित भी
हुए उन्होंने मुझसे कहा तुम जीवन में जरुर आगे बढ़ोगे…
यह प्रशंसोक्ति सुन कर मैने अपने ब्लागर मित्रों को
धन्यवाद दिया जिसके प्रभाव से यह सब संभव हुआ
था…।गाड़ी आगे बढ़ी खाने का समय हुआ किंतु इस
गाड़ी में Pantry Car न होने के कारण दूसरे स्टेशन से
खाना लिया जाता है…इसके कारण यह ठंडा और थोड़े
विलम्ब से आता है…खाना खाने के बाद बहुत देर बाद
जब उस महिला ने खुद को Relate किया तो बातें शुरु की;
बातें थी--- bc##%%bz##%% आदि अब हमें तो भारतीय
अंग्रेजी आवे है…वही वाली…I can walk english...
I can talk english bcoz english is a very funny language...
भाई यहाँ हाथ तंग है हमारी…फिर भी ठहरे हम "बिहारी"
बोले बिना मानेंगे कैसे सो सिनेमाई बात सफर आरंभ
हुआ…मैडम ने कहा 'कभी अलबिदा न कहना' का Theme
is##%%very##%%good मैनें बात को काटा कहा--
आप अमेरीका से नहीं Hollywood से प्रभावित हैं--
Britney,Angelina,Brad Pitt आदि के रहन सहन से।
वह चुप हो गईं फिर राज कपूर और Big B पर जाकर
बात का अंत हुआ…मैं देख रहा कि ये लोग हिंदी जानते
हुए भी बोलना नहीं चाहते उनको शर्म महसूस होती है…
लेकिन वही बात "National Integration" जो सामने थी
वह यह की नीचला तबका भी हमारी बात को सुन रहा
था और ऊपरी तबका परेशान होकर भी कम-से-कम
17 घंटे तो उनकी बेबसी को करीब से देख रहा था और न
चाह्ते हुए भी स्वयं को जोड़ रहा था…और रात काफी हो चुकी
थी सफर का दंभ मजेदार था मन उलझन में पर प्रसन्न
हुआ था इस नये प्रयोग से और दूसरे को करीब से
जानकर लाचार को देखकर और बाते करके…"गरीब रथ"
का सफर नये उजाले में प्रवेश कर चुका था…मैं मन में कई
भ्रांतियाँ कई कमियों को अंदर पा सर झुकाए मंजिल की
ओर उतर बढ़ चला…मेरे अन्य सह-साथी शायद यही सोंच
उद्देश्य कोटि पर निकल चले…।
साथ वहाँ का प्रसिद्ध ठंडा दुध पीने को उतरा…बाते भी
हो रही थीं…दिल्ली या मुंबई अच्छा के मुद्दे पर बहस
छीड़ गई…धीरे-धीरे यह बहस हिंदी पर आकर रुकी
की मुंबई के लोग ज्यादा शालीन होते है क्योंकि वहाँ
साधारण आफिस में भी अंग्रेजी बोली जाती है…मुझे
ये शब्दचुभे मैने कहा---भाई साहब विडम्बना यही है
कि वहाँ के लोग मराठी नहीं तो अंग्रेजी बोलना पसंद
करते हैं क्योंकि वे हिंदी को औपनिवेशिक भाषा मानते
है…और तुम उत्तर प्रदेश के होकर भी अंग्रेजी के हिमायती
बने हो…जाकर कुछ अच्छी चीजों को सीखों राष्ट्र भाषा
के सम्मान को बनाये रखना हमारा कर्तव्य भी है…
वह मुझसे नाराज हो अंदर चला गया…मेरे साथ सरदार
जी (डाक्टर) ने मेरे तर्क को सुना और बहुत प्रभावित भी
हुए उन्होंने मुझसे कहा तुम जीवन में जरुर आगे बढ़ोगे…
यह प्रशंसोक्ति सुन कर मैने अपने ब्लागर मित्रों को
धन्यवाद दिया जिसके प्रभाव से यह सब संभव हुआ
था…।गाड़ी आगे बढ़ी खाने का समय हुआ किंतु इस
गाड़ी में Pantry Car न होने के कारण दूसरे स्टेशन से
खाना लिया जाता है…इसके कारण यह ठंडा और थोड़े
विलम्ब से आता है…खाना खाने के बाद बहुत देर बाद
जब उस महिला ने खुद को Relate किया तो बातें शुरु की;
बातें थी--- bc##%%bz##%% आदि अब हमें तो भारतीय
अंग्रेजी आवे है…वही वाली…I can walk english...
I can talk english bcoz english is a very funny language...
भाई यहाँ हाथ तंग है हमारी…फिर भी ठहरे हम "बिहारी"
बोले बिना मानेंगे कैसे सो सिनेमाई बात सफर आरंभ
हुआ…मैडम ने कहा 'कभी अलबिदा न कहना' का Theme
is##%%very##%%good मैनें बात को काटा कहा--
आप अमेरीका से नहीं Hollywood से प्रभावित हैं--
Britney,Angelina,Brad Pitt आदि के रहन सहन से।
वह चुप हो गईं फिर राज कपूर और Big B पर जाकर
बात का अंत हुआ…मैं देख रहा कि ये लोग हिंदी जानते
हुए भी बोलना नहीं चाहते उनको शर्म महसूस होती है…
लेकिन वही बात "National Integration" जो सामने थी
वह यह की नीचला तबका भी हमारी बात को सुन रहा
था और ऊपरी तबका परेशान होकर भी कम-से-कम
17 घंटे तो उनकी बेबसी को करीब से देख रहा था और न
चाह्ते हुए भी स्वयं को जोड़ रहा था…और रात काफी हो चुकी
थी सफर का दंभ मजेदार था मन उलझन में पर प्रसन्न
हुआ था इस नये प्रयोग से और दूसरे को करीब से
जानकर लाचार को देखकर और बाते करके…"गरीब रथ"
का सफर नये उजाले में प्रवेश कर चुका था…मैं मन में कई
भ्रांतियाँ कई कमियों को अंदर पा सर झुकाए मंजिल की
ओर उतर बढ़ चला…मेरे अन्य सह-साथी शायद यही सोंच
उद्देश्य कोटि पर निकल चले…।
"सफर में बहुत कुछ हुआ लेकिन लेख की लंबाई के कारण
यहीं पर कलम रुक गई क्रमश: में लयबद्धता टूट जाने के कारण
भी आगे जारी रखने का मेरा मन नहीं हुआ।"
धन्यवाद!!!






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