A Journey In "Garib Rath"



हमारे रेलमंत्री की उत्कृष्टतम सोंच…"गरीब रथ" वैसे यह
गरीबों की सवारी बिल्कुल नहीं लगती पर शायद रेलमंत्री
अपने जातिवाद की छाया से मुक्त नहीं हैं तो यहाँ गरीबों

में भी स्तरीकृत विभाजन किया गया है…यानि गरीबों में
जो अर्थवान हैं यह उनकी सवारी है…एकदम झकास "ट्रेन"।
यह तो हुई "गरीब रथ" की बात…अब मैं यहाँ क्या कर रहा
था? पेशे से तो मैं पत्रकार हूँ नहीं…!
इधर कुछ दिनों से मैं मुंबई में था कुछ काम के संदर्भ में…
अचानक वह कार्य कुछ दिनों के लिए बढ़ गया और मैं
अपने "अनुज" प्रेम के कारण यहाँ खिंचा चला आया क्योंकि
अपने छोटे भाई को छोड़ पहली दफा दूर गया था।
तुरंत वहाँ से चलने के कारण टिकट आरक्षण मिलना मुश्किल
था अत: मुंबई से पहली दफा रवाना होने वाली "गरीब रथ"
में यह संभव हो गया और मैं स्टेशन पर!!! वहाँ सहारा न्यूज
का Coverage हो रहा था…भाई एक नया न्यूज जो था गरीबों
की राजधानी का और हमेशा नेता-फिल्मी लोग हीं क्यों हर
तरफ छाये रहें अब गरीबों की बारी हैं…इसप्रकार तमाम अटकलों
पर विराम लगाते हुए माननीय रेलमंत्री "लालू प्रसाद यादव"
ने वजट से पूर्व तीसरी "गरीब रथ" मुंबई-से-दिल्ली चला ही दी!!!
मैं अपना स्थान ग्रहण कर चुका था मेरे आस-पास कई लोग
आकर और बैठ गये…बिल्कुल नई उम्दा सुविधाओं से लैस
यह ट्रेन कई मामलों में राजधानी को पिछे छोड़ देती है और
वह है…आधी कीमत में सारी सुविधा यहाँ तक की रफ्तार भी…!!!
17 घंटे में मुंबई से दिल्ली वो भी 3AC में वैसे इसमें Chair Car की
व्यवस्था भी है…और!!! 'क्या बच्चे की जान लोगे'
well dressed attendant...!!! काफी सारे स्टाफ इत्यादि…इत्यादि।
हाँ यहाँ पर दो स्तर के लोगों के बीच की दूरी भी कम हो गई
जो "National Integration" में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर
सकता है…ऐसा भले रेलमंत्री न चाहते हों की वर्ग संघर्ष मिटे पर
यह उपलब्धि उनकी ही है…!!! बताता हूँ कैसे…
सभी लोग अपना-अपना स्थान ले रहे थे…बहुतों ने लालू जी को
धन्यवाद किया खास कर व्यापारियों ने जिन्हें सप्ताह में 4 बार
मुंबई-दिल्ली आना-जाना पड़ता है…और नई गाड़ी ने प्रस्थान किया
नये सवेरे की ओर… अब--

"'रथ' चला परस्पर बात चली
सम-दम की टेढ़ी घात चली"॥
नये-नये लोग आते गये और कारवां चल पड़ा…।
हमारे आमने-सामने कुल आठ लोग थे-->व्यापारी-डाक्टर-मरीज-
मैनेजर-एक महिला और "मैं" सबसे अलग सिर्फ "साक्षी"
महिला इसकारण की सभी के सामने मात्र सुकुमार तरुणी
ज्यादा अंग्रेज-कम भारतीय!!! मैं शान से भीतर गया था मेरे
करीब में हरियाणा प्रांत के एक मरीज बैठे थे…जो तंग हाल भी
थे और लकवा से परेशान…पहले मैं अंदर से कुढ़ा लेकिन
व्यावहारिक नैतिकता की बाहों में तुरंत आ गया और मैने बाबा
से संबोधित किया अपना समझ उनकी पत्नी ने मुझसे अपने
सीट के बारे के पुछा कि हम सही जगह पर हैं न…।
व्यापारी महाशय ने कान में मोबाईल FM radio का पीन
लगाया और जोर-जोर से लालू प्रसाद के कहकहे लगाने लगा…
इन रेडियो वाले के साथ क्या बताऊं बैठे हैं सफर में और
कान में टिमटिमा लगा कर अपनी ध्वनी से लोगों को परेशान
भी करते हैं और तन्हाई का एहसास भी दिलाते हैं, सुनने वाला
अच्छे गानों पर सर हिलाता जाएगा और आप मुख खोल
कर उसकी हरकत पर यह सोंचते रहेंगे की कौन सा गना'वा
चल रहा है…ससुर के !! मैनेजर भाई ने कहा कि यार सीट
छोटी है इसका एलाईनमेंट ठीक नहीं है…ससुरा ये महाशय
"दो रुपये में जंगल खरीदने" निकले थे…कुछ लोगों की
यह आदत होती है कि चाहे कुछ भी हो वह शिकायत करने
की अपनी प्रकृति से नहीं चुके'गा…।बात हो ही रही थी तबतक
"जय हिंद" की गुंज पीछे से आने लगी…देखा एक सिपाही
ने कुछ किया हुआ था…। मेरे सीट के पास आने पर…उन्होनें
नये सफर पर बधाई दी…और "जय हिंद" का नारा लगाने को
कहा…पहले मैं भी हिचकिचाया पर तुरंत देश भक्ति का ज्वार
उफान लेने लगा तो चार व्यक्तियों ने यह नारा लगाया बाकी शांत
ही रहे…वह महिला अब थोड़ी परेशानी महसूस करने लगी…उसे
अब यह फुहर लगने लगा था। मेरा प्रथम हिचकिचाना,
दो लोगों का यह नारा न लगाना इस देश का दुर्भाग्य ही है…।
जो मरीज़ थे बहुत परेशान किंतु स्वभावगत अत्यंत सरल…।
सब देख रहे थे मैं पूरी तरह से उनसे Relate कर चुका था…
और उनकी सरलता से प्रभावित भी हुआ और जाना ऐसे
को जितना प्रेम करो उतना नहीं उससे दस गुना ज्यादा
पाओगे…।
गाड़ी वरोदरा में रुकी और मैं कुछ लोगों के
साथ वहाँ का प्रसिद्ध ठंडा दुध पीने को उतरा…बाते भी
हो रही थीं…दिल्ली या मुंबई अच्छा के मुद्दे पर बहस
छीड़ गई…धीरे-धीरे यह बहस हिंदी पर आकर रुकी
की मुंबई के लोग ज्यादा शालीन होते है क्योंकि वहाँ
साधारण आफिस में भी अंग्रेजी बोली जाती है…मुझे
ये शब्दचुभे मैने कहा---भाई साहब विडम्बना यही है
कि वहाँ के लोग मराठी नहीं तो अंग्रेजी बोलना पसंद
करते हैं क्योंकि वे हिंदी को औपनिवेशिक भाषा मानते
है…और तुम उत्तर प्रदेश के होकर भी अंग्रेजी के हिमायती
बने हो…जाकर कुछ अच्छी चीजों को सीखों राष्ट्र भाषा
के सम्मान को बनाये रखना हमारा कर्तव्य भी है…
वह मुझसे नाराज हो अंदर चला गया…मेरे साथ सरदार
जी (डाक्टर) ने मेरे तर्क को सुना और बहुत प्रभावित भी
हुए उन्होंने मुझसे कहा तुम जीवन में जरुर आगे बढ़ोगे…
यह प्रशंसोक्ति सुन कर मैने अपने ब्लागर मित्रों को
धन्यवाद दिया जिसके प्रभाव से यह सब संभव हुआ
था…।गाड़ी आगे बढ़ी खाने का समय हुआ किंतु इस
गाड़ी में Pantry Car न होने के कारण दूसरे स्टेशन से
खाना लिया जाता है…इसके कारण यह ठंडा और थोड़े
विलम्ब से आता है…खाना खाने के बाद बहुत देर बाद
जब उस महिला ने खुद को Relate किया तो बातें शुरु की;
बातें थी--- bc##%%bz##%% आदि अब हमें तो भारतीय
अंग्रेजी आवे है…वही वाली…I can walk english...
I can talk english bcoz english is a very funny language...
भाई यहाँ हाथ तंग है हमारी…फिर भी ठहरे हम "बिहारी"
बोले बिना मानेंगे कैसे सो सिनेमाई बात सफर आरंभ
हुआ…मैडम ने कहा 'कभी अलबिदा न कहना' का Theme
is##%%very##%%good मैनें बात को काटा कहा--
आप अमेरीका से नहीं Hollywood से प्रभावित हैं--
Britney,Angelina,Brad Pitt आदि के रहन सहन से।
वह चुप हो गईं फिर राज कपूर और Big B पर जाकर
बात का अंत हुआ…मैं देख रहा कि ये लोग हिंदी जानते
हुए भी बोलना नहीं चाहते उनको शर्म महसूस होती है…
लेकिन वही बात "National Integration" जो सामने थी
वह यह की नीचला तबका भी हमारी बात को सुन रहा
था और ऊपरी तबका परेशान होकर भी कम-से-कम
17 घंटे तो उनकी बेबसी को करीब से देख रहा था और न
चाह्ते हुए भी स्वयं को जोड़ रहा था…और रात काफी हो चुकी
थी सफर का दंभ मजेदार था मन उलझन में पर प्रसन्न
हुआ था इस नये प्रयोग से और दूसरे को करीब से
जानकर लाचार को देखकर और बाते करके…"गरीब रथ"
का सफर नये उजाले में प्रवेश कर चुका था…मैं मन में कई
भ्रांतियाँ कई कमियों को अंदर पा सर झुकाए मंजिल की
ओर उतर बढ़ चला…मेरे अन्य सह-साथी शायद यही सोंच
उद्देश्य कोटि पर निकल चले…।

"सफर में बहुत कुछ हुआ लेकिन लेख की लंबाई के कारण
यहीं पर कलम रुक गई क्रमश: में लयबद्धता टूट जाने के कारण
भी आगे जारी रखने का मेरा मन नहीं हुआ।
"
धन्यवाद!!!
4:00 PM
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4:00 PM

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अशुभ की समस्या…!!!


ऐसे काफी सारे प्रश्न हैं जो
हमें उद्वेलित करते रहते हैं…
और उनमें सबसे महत्व-
पूर्ण दार्शनिक दृष्टिकोंण से
है कि जब इस जगत का
निर्माता ईश्वर है और जो
परम शक्तिशाली भी है तो इस जगत में अशुभ क्या कर रहा
है…अगर ईश्वर करुणामय व दयालु है…सभी को प्रेम करनेवाला
है तो इस जगत में तो चातुर्दिक आनंद ही आनंद होना चाहिए
था। मानव जीवन में दु:ख-संताप-लोभ की व्यापकता और भयभीत
कर देनेवाली प्राकृतिक विपदा कई रुपों में स्नेही स्रष्टा के विचार
को अविश्वसनीय बना देते हैं।
मेरा मानना है कि एक सर्वशक्तिमान सत्ता से
अशुभ की अपेक्षा नहीं की जा सकती…परमात्मा ने जब इस
प्रकृति को रचा तो मानव को कोरे कागज की तरह ' जगत ' थमा
दिया और साथमें शाश्वत बुद्धि और विवेक को दिया जिसका
उपयोग वह स्वतंत्ररुप में कर सकता था…।लेकिन संतुलन की
जो स्थिती हमें रखनी चाहिए थी वह लोभ-संवरण के कारणत:
टूट गई… जो परमशुभानुभूति है वो अशुभ का निर्माता नहीं हो
सकता !!! ये तय है!!! ईश्वरवादियों के इस तर्क में अभिनंदन पूर्ण
तर्कना विद्यमान है।इस जगत में दृष्टिगत "पाप" कोई अशुभ
नहीं जिसे दार्शनिकों ने इतना महत्व प्रदान किया है…क्योंकि
अशुभ की समस्या तो तब आयेगी जब सच में अशुभ विद्यमान
होगा।जो "पाप" इस जगत में सर्वत्र व्याप्त दिख रहा है…वस्तुत:
वह एक "परम शुभ" ही है, जो मानव जिज्ञासा के लिए रहस्यमय
अंधकार है…जो विश्व विकास की संभावना है, यह न होता तो
संघर्ष की उत्पत्ति संभव ही न हो पाती…यह तो एक " विरोधी शुभ "
है… चूंकि मानव सामान्यत: सीमित ज्ञान वाला प्राणी है जो जिज्ञासा
के कारण ज्ञान को सक्रिय करता रहता है…अगर यह न होता,वह या
तो जड़ बन जाता या इस पृथ्वी के पूर्ण सर्ग के पहले ही प्रलय की
क्रिया आरंभ हो जाती…। अभी तो जगत पूर्णत: खिला ही नहीं है तो
विकास ऊर्ध्वमुखी है लेकिन जैसे ही यह खिल उठेगा यह वापस उसी
स्थिती में लौट आएगा…क्योंकि जन्म और मृत्यु दोनों ही
परम सत्य है…।
11:31 AM
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11:31 AM

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'सपनों' के साथ अठखेलियाँ…!



जीवन की तरंग या किसी सांझ की
शांत... कहानी का उल्लेख, सोंच है वो
मेरी या मेरे अनुमानों की मूर्त गीता...
या फिर मेरी कल्पनाओं के साथ मेरा
अपना जागृत प्रयोग......

सुने...! क्या कुछ कहती हैं ये अंतरंग वीणा...
शिखा से स्वरुप में आनंद निखार
प्रतिवेदनाओं का अदभुत निर्माण
कुछ दिव्य-दिव्य सा भंवर पड़ा है
गहराते हुए अंधकार में...

मात्र उसी के अभिज्ञान में ठहर कर,
जब-से, अबतक सोया हुआ हूँ
जागृत मनु की वृत्तियों में...
बस इंतजार है उस लौ की जिसमें
करवटों पर करवटें हों और निशा के
शांत लहर में स्नेहा-मंथन की बात चले...

कुछ शाम की तन्हाईयों की
कुछ ज्योत्सना के प्रच्छद-पट पर
भावयुक्त संवेदना का अविराम आभास पले,
रुठ जाओगी आज अगर तुम इस
थमे हुए-से अनजाने मोड़ पर
हर पल शायद घुल जाएगा याद
तुम्हें ही कर-कर...

मैं प्रातः था इस जीवन में जब
त्रियमा ने अंधकार रचा...पर...कैसा था...
वो रुप सुहाना जिसके विभिन्न रश्मियों ने
अपना चैतन्य विस्तार किया,

कैसे भूल जाऊँ मैं...
उस पल की अनंत उत्सुक्ताओं को...
उस पल की अनंत गति, धड़कते हृदय
में उठते गहरे श्वास की ज्वार को
कैसे...? कैसे...? मैं छोड़ जाऊँ तुझे...

चाहे कल्पना हो या हक़ीक़त, झाँकना तो
सभी को पड़ता ही है, पीछे जाकर खुद को
तलाशना उन रश्मों को उन वादों को
निभाना तो पड़ता ही है, अनचाहे हृदय से
या कुछ देर से...एक बार ही सही,
पास तो जाना पड़ता ही है.

मेरे प्राणों की साथी मेरे संभावनाओं की संगनी......
वो आकृति ही तो इस मन की ओट से
झाँक-झाँक कर कह रही है---

"पथ हजारों थे जिसपर मैं ठोकर खाकर पड़ा हुआ था,
चलना सीखा ही तेरे आने की गुँज सुनकर,
जो तू चली जाएगी इसकदर...पथ- से,
क्या मैं लौट नहीं आऊँगा...उसी भंवर में..."
1:05 PM
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1:05 PM

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पुत्र का ख़त पिता के नाम…!!!



अनायास ही मन हो आया लिखूं आपको
अपनी भाषा का एक ख़त, पिता हैं आप !
शायद समझेगें पुत्र का दर्द…।

आज जाकर वह वेला आई है जब
उभरे है कागज पर अक्षर…
मेरे परम आदरणीय पिता श्री,
कैसे हैं आप!

जमाना बदल गया…हमारा साथ बदल गया,
तरीके और हालात बदल गए…
बाते तो दूरभाष पर हो ही जाती थीं
आप भी सोंचेगे यह पत्र मैं लिख रहा हूँ…क्यों ?

मगर शब्दों की आकृति में जो भावनाएँ
उठती हैं वह कलमों के सहारे पन्नों पर
छपती जाती हैं…
लिखते हुए कम-से-कम एहसास में डूबा
होता हूँ…इसकारण मैं यह पत्र लिख रहा हूँ।

लाख हठ थे मेरे, कुछ जो मेरे लिए होते थे
और कई जिसे करने को चाहता था यह 'मन'
उस पर आपका अंकुश बहुत बुरा लगता था…

स्कूल में जब मैं भटकता जा रहा था,
अपने रास्तों से लगातार दूर होता जा रहा था…
उस वक्त मेरा हाथ थाम कर या यों कहें
मेरा लक्ष्य टांग कर कंधों पर, पाने को
मंजिल रास्ता आंखों में दृष्ट किया.…

बढ़ता आकार मेरा चिंता बढ़ा रहा था…
जिस प्रदेश (बिहार)का था विद्यार्थी…वहाँ
अवसरों की कमियाँ आपका हृदय व्यथित
कर रहा था…

मैं जो था आपके सपनों का पंछी…जो
पूरा कर सकता था सारे अधूरे सपने को…
इसलिए भेजना चाहते थे कोई और परदेश
को…सुना दिया "माँ" ने आपकी बड़ी आकांक्षा
को और देख रहा था उस परदेश में,
अनेकानेक हाथों से खुद को होता तौल।

सहमा था मैं डरा हुआ…भीतर-भीतर आँसू थे,
वह वक्त भी जल्द आ गया जब मैं रेलगाड़ी
पर बैठा खिड़की से हाथ हिला रहा था…आज
सभी को छोड़ मैं कहीं और जा रहा था…
खुद को अकेला महसूस कर आपको
मन-ही-मन बहुत कोस रहा था…

आखिरकार उतर आया मैं अलबेले महफिल में,
बदला हुआ नजारा…परिवेश बदला था…
भाषा बदल गई थी…सब नया-नया सा था…
आँखें चमक जाती थीं दर्पण उभरा आता था

अपने कोमल हृदय पर अब बोझ महसूस
कर रहा था,जिम्मेदारियों को लाद कर यहाँ
जो आ पहुँचा था…सच करने को वह अधूरा सपना!

वक्त और स्थान बदला तो ढंग बदला रंग और
सैलाव भी…मैं उमंगों की धुन में बढ़ता चला गया
और पीछे छोड़ आया आपके पुराने क्षण…

अब आपके विचार मेरे सिद्धांतों को गवारे नहीं थे,
मैं यह समझने लगा था, अब जमाने की मैं तस्वीर
बनाऊँगा…अब आपके सपनों में कोई करतब नहीं
दिखता था.…

आया था मैं "IAS" बनने, जो बिहारियो का
सिद्ध अधिकार है…कई बार यहाँ की रंगीन छटा
में भटक भी जाता था…मगर 'कलक्टर' बनने के
जोश से दौड़ भी पड़ता था…

प्रोफेसर हैं आप और गुरु भी हैं
बनाना चाहते थे पुत्र को एक "IAS";
अब अलग तो होने थे न विचार हमारे
और अलग हो रहा था मैं…

घर की समस्त परेशानियों से दूर
न कभी पैसे - न कोई चिंता
जी लगा रहे पढ़ाई मे मेरा मात्र यही
थी न आपकी मंशा.…

सच कहूँ ! मैं अब सब भुला रहा था
ना ही पढ़ने से खुद को जोड़ पा रहा था
और ना ही आपको नजदिक लाकर कोई
अंकुश चाहता था…

कभी आश्रमों में कभी योगियों के
संगत में पड़ गया था मैं…पता नहीं क्यों
इस राह निकल आया था…

आया वह भी वक्त जब "IAS" बनने को मन
मचला और शुरु हुई तैयारी…कोचिंग जाने लगा
वहाँ भी मन भटकने लगा और मैं…
बालाओं के नाज़ उठाने लगा…।

घर से दूर आकर भी इतना गमगीन
कभी नहीं हुआ था…जितना उसे याद कर-करके
तकीया भींगोता था…रात-रात भर अंजनों में
उसको संवारा करता था…
प्रत्येक पल न जाने क्यों बेचैन सा रहता था।

लेकिन कभी न सोंचा, आपको "एक दिन" के किसी
अंतरे में…जिस सपने को पूरा करने आया था
भूला चुका था इस मैख़ाने में…

दो प्रयास तो ईमानदार था मेरा "IAS" का
उस वक्त साथ थी मेरी 'प्रेरणा' भी बहुत करीब से
मगर जो बीता वक्त था उसे लौटा न पाया मैं…।
मेरे जीवन का उद्देश्य बदल गया परिभाषाएँ
अलग हो गईं…

अब आपको याद करना भी बेईमानी लगता था,
कहाँ याद आता था वह सबेरा…जब परेशान होता
देख मुझे सीने में भींच कर पुचकारा करते थे,
बारिश में छाते को मुझपर डाल देते थे
गोद में मुझे उठाकर मीलों चला करते थे
मैं आराम से हाथों को झूला मान हिल्लोरियाँ
लेता था…

पर अब सबकुछ उलट-पलट गया है…किंतु
गुनहगार आपको भी मैं मानता हूँ…
क्यों नहीं फट्कारा आकर थप्पड़ की गुंज
क्यों नहीं सुनाई आपने…मुझे आपसे ज्यादा और
कौन जान सकता है…
हक है आपका इतना तो मुझपर वैसा ही जब
पहली बार स्टेशन पर गाड़ी चढ़ाया था…
क्यों समेट लिया उस हक को मुझ नादान की
भूलो से…

अत्यंत लज्जित हूँ मैं पिता जी…नहीं लाज
आपकी सपनों की रख पाया…
आपके सपनों का यह पंछी बहुत ऊँचा नहीं
उड़ पाया…।

लेकिन फिर भी मैं एक पंछी हूँ और
उड़ना मेरा धर्म…आसमान के उस छोर
तक तो नहीं पर पुन: नये ठौर को पाने
मैं कहीं और निकल गया………


आपका प्रिय आत्मजात
"दिव्याभ"
1:59 PM
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1:59 PM

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नि:सम्बल "मन"



हर श्लोक में एक मंथन है
हर ओज सत्यं शिवं सुंदरम है,
आज का है यह विकट व्याख्यान
हर भेद में एक अभेद है
हर दृष्ट में कुछ अदृष्ट है;

वो समृद्धि छुप-छुप कर लुभा रही
मेरे चित्त-चितवन को अनंत अलंकारों से
क्या पास वो अपने बुला रही…या
संकेत है उसका निरझर पल;

क्या हो रहा है…इस दिवस में
क्या बीत चुका इस काल से आगे
मत कुरेद ओ मालिक मेरे…
हृदयाकाश को सब ठहर जाता है…
उसके ख़्वाबों में जिज्ञासा बनके…।

प्रयाण पाता या तलाश करता…पर
मन की विस्तार का क्या होगा
इस चिंतित स्वर और व्याकुल चित्त
पर कब और कहाँ हस्ताक्षर होगा

मत पूछ ऐ मन मेरे ठहर जा…
कौन है जो तुझे जो यहाँ पहचानेंगा,
इस काला-युग के अवशेषों पर तेरी
अकुलाहट को कहाँ त्राण मिल पाएगा,

एक हवा का झोंका चल पड़ता है
व्यार बनकर उड़ चलता है…
क्या पता इसे है…उन समयों का
जो साथ यह अपने ले उड़ता है,

हर सांत में एक अनंत छुपाकर
जीवन की डोर को मृत्यु तक ले जाकर
आती है नित्य नये-नये रहस्यों में
आशाएँ-अभिलाषाएँ लेकर…

विश्वास नहीं हो रहा है…इसबार
चली ले उड़ मेरे अनुरागी वृत को
संघर्ष की सूचना पर भी मैं
बैठा रहा स्तब्ध बनकर…

जब सबकुछ बंधा-बंधा सा था
सबकुछ सधा-सधा सा था…
फिर कैसी यह विपदा है आन पड़ी
पिंजरे के पीछे कैसी होगी अभिलाषा मेरी,

यह घनावरण कहाँ से आया
यह सन्नाटा कैसा है…कुछ नजर
यहाँ क्यों नहीं आ रहा…
यह अंधियारा यह आवरण कैसा है,

जाता कहाँ किस ओर किधर मन
सिमट रही बेख़ौफ जिंदगी नि:शब्द रुदन
के आईने मेंबिखरती हुई सांसों में,
आज भागना चाहता हूँ मन से…
लेकिन , सफर "समाप्त" हो चुका!!!

2:27 PM
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2:27 PM

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Satyagraha औR महात्मा…।

Satyagraha R महात्मा…।

राष्ट्रपिता…महात्मा…गांधी…'बापु'…भारतीय इतिहास के
महानतम व्यक्तित्व…विश्व नेता…दार्शनिक व एक प्रवर्तक…
जिन्होंने मंथन कर 'सत्याग्रह' (सत्य का आग्रह करते हुए किसी
भी परिस्थिती का मुकाबला करना…Total devotion surrender to
the will of Truth...
No matter!Come what may I stick to the honesty of Truth.) के आधार पर विश्व को अनूठा मार्ग दिया
की अहिंसा के आधार पर 30cr जनता को बांधा जा सकता
है…जन-आंदोलन के लिए। इससे पूर्व किसी प्रवर्तक या भारतीय राजनेताओं ने ऐसा नहीं कहा था…।

क्रांति हो सकती है…! बिना वर्ग-संघर्ष के;
वर्ग-विहिन क्रांतिका बिगुल फूंका…बापु यह जानते थे कि इन सबों में कुछ तो साम्यता होगी,जो सहयोग का आधार बन सकता है…वे राजनैतिक आधार पर संघर्ष नहीं चाहते
थे…उनका आधार था 'सत्याग्रह' पर आधारित शाश्वत नैतिक विचारधारा। एक ऐसी
प्रणाली जो विशेष वर्ग का हृदय परिवर्तन कर सहयोग के लिए वाध्य कर दे…
यानि हृदय परिवर्तन के आधारपर क्रांति !!!


हिंसा के आधार पर सामान्य जन को आकर्षित नहीं किया जा
सकता था…जबकि विभिन्न वर्गों को अहिंसा के माध्यम से जोड़ा जा सकता था; इसी यथार्थवादिता ने महात्मा को व्यापक जनाधार दिया उस समय जब यह देश टुकड़ों में
बँटा था।गांधी जी ने 'सत्याग्रह' के आधार पर जन-आंदोलन का चित्र खींचा-----
"एक नियंत्रित जन-आंदोलन" जिसमें साहस व समग्रता हो किंतु प्रहार के लिए नहीं…सहनशीलता के लिए।

साध्य कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो लेकिन साध्य की श्रेष्ठता का यही प्रभाव
हो सकता है…साधन की श्रेष्ठता…,तात्पर्य यदि साधन श्रेष्ठ होगा तो विचार पवित्र होगा…
कार्य में शुद्धि आएगी…क्योंकि जलता हुआ भारत जलती मानसिकता से नहीं बुझ सकता था।वे सहयोग के आधार पर परिवर्तन कर रहे थे…एक ऐसा साहस…! जो विपक्ष को भी अपनी रणनीति बता दिया करते थे…यहाँ तक की जगह और तारीख कि वो क्या करने
वाले हैं---यह थी उनके रणनीति की पारदर्शिता!!!
.....
महात्मा यह जानते थे कि किसी आंदोलन को दीर्धावधी तक नहीं ले
जाया जा सकता है क्योंकि कृषक-कामगार को काम के लिए बाध्य रुप से जाना
पड़ता है, इससे पहले कि जन-आंदोलन स्पष्टत: विफल हो वे पहले ही सफलता के
चरमविंदु पर वापस ले लेते थे…"उनके विचारों में एकप्रकार का लचीलापन था"…
आंदोलन वापस लेने के उपरांत भी वे संवाद के लिए तैयार रह्ते थे…यानि
संवाद से क्रांति!!!

आंदोलन की असफलता के बावज़ूद वे असफल नहीं कहे जा सकते…
क्योंकि विश्व इतिहास में इसप्रकार का यह प्रथम अहिंसात्मक आंदोलन था जिसमें
सभी-ने मिलकर हिस्सा लिया था जो निश्चय ही अद्भुत था…।साम्राज्यवाद के अंत
के उद्देश्य के साथ-साथ सुधारों का प्रयास किया जा सकता है…यह था 'सत्याग्रह' का रचनात्मक स्वरुप। मैं अभी-भी यही सोंचता हूँ कि गांधी जी को अंग्रेजों ने मार क्यों
नहीं दिया.…?द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब गांधी जी जेल में थे उस समय "चर्चिल"
ने कहा था कि यह "नंगा फकीर" अबतक मरा क्यों नहीं…।लेकिन गांधी जी के लाख
उकसाने पर भी अंग्रेज यह जानते थे कि यह "मलंग बाबा" दो निशाना साध कर बैठा
है…एक कि अगर उनकी मृत्यु अंग्रेजों के हाथों हुई तो यह व्यापक जनाधार उनको पूरी
तरह से बाहर खदेड़ देगा…गांधी की मृत्यु अर्थात अंग्रेजों की मृत्यु; नहीं तो आजादी तो मिलनी ही थी…तो क्यों नहीं ज्यादा से ज्यादा लोगों को खुन खराबे से बचाया जाए…
यह थी उनकी युद्ध नीति!!!


युवा Suppression को वह समझते थे कि यह वर्ग असहनशील होता
है…जिसे ज्यादा दबाया नहीं जा सकता…'भगत सिंह ' भी तो असहयोग आंदोलन की
असफलता की उपज थे…जिसे इस आंदोलन ने मार्ग दिया बढ़ने का…वे जानते थे कि
फांसी पर चढ़कर आजादी नहीं मिल सकती…हमें आंदोलन को पूरा करना है वैसे भी
भारत एकराष्ट्र नहीं बना है अगर नेतृत्वकर्ता ही न रहे तो आंदोलन को विखंडित होने
में कितना समय लगेगा… अपने सिद्धांतों के सहारे आजादी को छूना बहुत अलग है…
जिन लोगों ने कुर्बानियाँ दी महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के द्वारा उन सभी को
श्रद्धांजलि दी.…!!!

इंसान चाहे जितना ही महान क्यों न हो वह हमेशा अधूरा ही होता
है…।गलतियाँ हर इंसान से होती हैं, एक सामान्य आदमी की गलतियों को कोई
नहीं देखता पर बड़े लोगों की छोटी गलतियाँ भी बहुत बड़ी दिखती है---हमें यह
नहीं भुलना चाहिए कि वे हमारी तरह बिल्कुल सामान्य मानव थे।
उनका 'सत्याग्रह'…सृजनात्मकता का अनमोल दृष्टांत था…समन्वय
सहृदयतासंयमसमानतामर्यादा उनके दर्शन का मूल था वे स्पष्टत: जानते
थे कि जबतक समन्वय नहीं होगा शांति नहीं आएगी…॥


"दर्शन जिनका काल से आगे…सत्य था पीछे-पीछे
टेक चला था राम रे…
नि:संग अहिंसा की कर्मठता का पाठ पढ़ाते अपने
जीवन काल में…
जिसके निर्भीक पांव से पड़ा मलीन था क्षत्र ब्रिटिश
का राज रे…
भारत के क्षितिज पर बनकर पिता चंदा के जैसे चमकते
हैं बापु बनकर राम रे…
अनुनयपूर्वक लड़ा संग्राम, उतार फेंका अपने चीवर को
मानवता के आदर्श में…
दिया विश्व को अनूठा ज्ञान ऐसे थे वह महात्मा.…
जिनकी दुनियाँ करती गान रे…
सभी आधारों का समन्वय कर दे दिया वतन आजाद
हमारे हाथ रे…
वे महान नहीं आदर्श ,गर्व- स्वाभिमान यही थी उनकी
पहचान रे…
वह मानव थे या महा-मानव पर थे
भारत के लाल रे…
आओ याद करें उस पुण्य आत्मन को
शत-शत नमन आदर-प्रणाम के साथ रे…
कि विश्वास हो पर्वत के जैसा जो ढ्केले
चक्रावात रे…
पूरा हो लक्ष्य हमारा बढ़े देशाभिमान रे…"
2:41 PM
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2:41 PM

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सच में…!!! कुछ नहीं बदला है यहाँ…





शिक्षा में बदलाब की प्रक्रिया…पर हमनें
शोर किया इस दोमुंहे रास्ते का…?




ढंग और तरीका बदला है…!!! पर हमारा
योगदान…?




रहन-सहन में सुधार…!!! पर किसी के
आवरण को नोंच कर…?




स्वास्थ के क्षेत्र मे संम्भावनाएँ बढ़ी…!!!
किसकी किमत पर…?




हमने जीने कई तरीके बना लिये…!!!
पर जिन्हें इसका भान नहीं उनके लिये
हमनें क्या किया…?




समाज समृद्धि की ओर उन्मुख है…!!!
पर संघर्ष बढ़ रहा है, क्यों…?




खुशियाँ पंख फैला रही हैं…!!! पर पहले
हमने इसे खुद के लिए सहेजना शुरु किया
यही था न…! प्रथम विभेद…?




दोषी कौन…? हम या समाज…!!!
पर इस समाज का निर्माता कौन है…?




कभी जिंदगी को जज्बातों के सहारे देखा…
सच में करीब से…!!बहुत कुछ कहते हैं हम,
पर किसी का हाथ थाम कर कभी सड़क
पार करवाया है…?




"जब तक सिद्धांतों को Action में नहीं लाया
जाता…वह मात्र काला अक्षर ही होता है जिसमें
कोई ताकत-कोई ऊर्जा नहीं होती…!!!
अगर दो व्यक्तियों में से एक भी किसी
की सहायता करता है--प्रेरित करता है तो
क्या समाज ऐसा हीं दिखेगा जो नजर आता है।
हम अपनी समस्त जिम्मेदारियों को राजनेता और
भ्रष्टाचार के उपर नहीं डाल सकते…यह देश हमारा
भी है…हमारा भी कर्तव्य है…पहल करने की…! कोई
नेता जन्म से नहीं बनता वह भी हमारे बीच का
ही एक सदस्य है…प्रत्येक व्यक्ति अगर अपने
आस-पास ही सफाई शुरु कर दे…कौन सा ऐसा
लक्ष्य है जो अप्राप्य रह जाएगा…!!! "

'उपर के सारे तस्वीर मेरे प्रिय आत्मन ने मुझे भेजे थे,
इसकारण उनका बहुत आभारी हूँ…।'
3:41 PM
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एक कविता !!!



एक कविता
मेरी मनोरम कल्पना की अनाम आवाज थी वह,
उसके सौंदर्य की पराकाष्ठा मेरे मनःस्थली में
उथल-पुथल करती आज-भी...हजारों कोस दूदूरररर........
गगन में निकल जाती है,
खुबानी-सा उसका बादामी चेहरा बोले तो जैसे
मुखमंडल से शहद टपक रहे हों हंसे तो ओस
के मोती झिलमिल-झिलमिल कर उठे…
घुंघराले सुनहरे काले बाल, आसमानी आँखें,
झरने से उठते उजले फेन की तरह उसकी
बाहों को मैं बस... देखता हीं रह जाता हूँ…
उसके खुशी के अश्क जब-भी मेरे दामन पर गिरते,
मानो सारे गगन के सितारे उसमें समाविष्ट हो गये हों…
उसकी पलकों के भीतर मंदाकनी की तरह कल-कल
करते अंश्रु ऐसे दिख पडते जैसे जाम अभी छलकने
को व्याकुल हो किंतु इसे थामने बाला न आया,
जिसप्रकार दिवा-रात्री एवं चांद-चकोर का मिलन नहीं हो पाता,
दोनों खामोश... एक-दुसरे की प्रतीक्षा में अपना समय खो देते हैं--
न तो सुबह की मोहक छटा को रात्री देख पाती है और
ना ही रात्री के अद्भुत सौंदर्य का दिवा अभिनंदन कर पाता है.
बेशक वो एक परी के समान थी लेकिन उसके बाह्य सुंदरता
का तो प्रत्येक व्यक्ति कायल था, किंतु उसकी अंतरात्मा से
उठते स्नेह की लहर को किसी ने स्पर्श किया...
2:58 PM
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2:58 PM

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