
ऐसे काफी सारे प्रश्न हैं जो
हमें उद्वेलित करते रहते हैं…
और उनमें सबसे महत्व-
पूर्ण दार्शनिक दृष्टिकोंण से
है कि जब इस जगत का
निर्माता ईश्वर है और जो
परम शक्तिशाली भी है तो इस जगत में अशुभ क्या कर रहा
है…अगर ईश्वर करुणामय व दयालु है…सभी को प्रेम करनेवाला
है तो इस जगत में तो चातुर्दिक आनंद ही आनंद होना चाहिए
था। मानव जीवन में दु:ख-संताप-लोभ की व्यापकता और भयभीत
कर देनेवाली प्राकृतिक विपदा कई रुपों में स्नेही स्रष्टा के विचार
को अविश्वसनीय बना देते हैं।
मेरा मानना है कि एक सर्वशक्तिमान सत्ता से
अशुभ की अपेक्षा नहीं की जा सकती…परमात्मा ने जब इस
प्रकृति को रचा तो मानव को कोरे कागज की तरह ' जगत ' थमा
दिया और साथमें शाश्वत बुद्धि और विवेक को दिया जिसका
उपयोग वह स्वतंत्ररुप में कर सकता था…।लेकिन संतुलन की
जो स्थिती हमें रखनी चाहिए थी वह लोभ-संवरण के कारणत:
टूट गई… जो परमशुभानुभूति है वो अशुभ का निर्माता नहीं हो
सकता !!! ये तय है!!! ईश्वरवादियों के इस तर्क में अभिनंदन पूर्ण
तर्कना विद्यमान है।इस जगत में दृष्टिगत "पाप" कोई अशुभ
नहीं जिसे दार्शनिकों ने इतना महत्व प्रदान किया है…क्योंकि
अशुभ की समस्या तो तब आयेगी जब सच में अशुभ विद्यमान
होगा।जो "पाप" इस जगत में सर्वत्र व्याप्त दिख रहा है…वस्तुत:
वह एक "परम शुभ" ही है, जो मानव जिज्ञासा के लिए रहस्यमय
अंधकार है…जो विश्व विकास की संभावना है, यह न होता तो
संघर्ष की उत्पत्ति संभव ही न हो पाती…यह तो एक " विरोधी शुभ "
है… चूंकि मानव सामान्यत: सीमित ज्ञान वाला प्राणी है जो जिज्ञासा
के कारण ज्ञान को सक्रिय करता रहता है…अगर यह न होता,वह या
तो जड़ बन जाता या इस पृथ्वी के पूर्ण सर्ग के पहले ही प्रलय की
क्रिया आरंभ हो जाती…। अभी तो जगत पूर्णत: खिला ही नहीं है तो
विकास ऊर्ध्वमुखी है लेकिन जैसे ही यह खिल उठेगा यह वापस उसी
स्थिती में लौट आएगा…क्योंकि जन्म और मृत्यु दोनों ही
परम सत्य है…।






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