Image Of Virtue..."सत्य संकेत"

Image Of Virtue
कोई और कहाँ है उसके जैसा,
जो गहरा इतना विशाल है
हर आकृति के पीछे...
"एक सवाल है"
जो शायद कुछ भी न कहता हो
फिर-भी 'व्यक्त आभास' है,
कण-कण में प्रकृति-प्रकृति सांसों में
भी उद्गार है…संकेत छुपा है आस-पास पर अज्ञान फैला…सब माया है,
मृत्यु व जीवन के मध्य सिमटा सब प्रयास है,
नभ के दोनों छोड़ों तक…एक वही तो गुंजायमान है,
मानव मस्तक के ठीक उपर एक
अत्यंत विस्तृत संसार है...
3:24 PM
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Divine India

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Incredible India...! अतुल्य भारत…???

Incredible India...! अतुल्य भारत…?

अचानक मैं घोड़े की टाप से रौंदा जाने लगा, चेहरे से रक्त की धार फूटने
लगी, मेरा हरा-भरा बाग जिसमें मैनें पौधे लगाए थे सब सूखते जा रहे थे दीमक ने उनके जड़ों को खोंखला कर दिया था,मैं इस दृष्य को देख तड़पने लगा कि किसी ने मेरा गला दबा दिया...मैं...मैं ! उठ बैठा,शायद कोई सपना था लेकिन बहुत अटपटा कुछ समझ में नहीं आ रहा था क्या......? सुबह के छः बजे थे और आदतन उठते ही दोनों
हाथों की हथेलियों को देखते हुए अपूर्ण तस्वीर, कार्य, थोड़े अपराध के लिये क्षमा मांगता
परमात्मा से और जोड़ से अंगड़ाई लेते हुए "Good Morning India" कहता उठा, सामनेके वातायन से आते उषा-किरण की तरफ गया...झांक कर देखा तो वही भागम-भाग जिंदगी,
वही पुरानी लकीर, ढाक के तीन पात...। मैं कुछ असमंजस में ही था कि देखा एक भीखाड़ी
किसी-से कुछ मांग रहा था थोड़ी देर बाद वह शक्स उगलियों से इशारे करता जाता दिखा
चुकिं मैं दुसरे महले पर था,कुछ सुन न सका पुनः देखा कि वही भीखाड़ी किसी दूसरे के
सामने उसी तरह खड़ा था मुझे दिख रहा था कि यह भीखाड़ी जो दिखने में तो ठीक ही
था, इसका आत्म-सम्मान गली मे भटक रहे कुत्ते के समान हो गया है दुत्कारो फिर भी
सस्ती रोटी की खातिर दरवाजे पर दुम हिलाएगा ही । अस्त हुआ मानव स्वाभिमान
पथ-प्रदर्शक देश की फटेहाल नियति को गा रहा है।
मुझे अत्यतं अकुलाहट हो रही थी कि पराधीनता की दहलीज को
पार किये ५० वर्षों से ज्यादा हो चुके हैं--और निश्चित ही अंग्रेजों को गये भी किंतु आश्चर्य
इस बात का है कि अंग्रेजों की विंदाश और सलीक़ेदार शैली को तो आज तक नहीं सीख
पाए हाँ...उनकी हड़पनीति में...भाई क्या बात है...! घुड़दौड़ लगा रखी है।शायद हम कहीं
अपनी पराधीनता को इस उल्लास से कि हम Modern हो रहे हैं, भुनाने का प्रयास तो नहीं
कर रहे हैं...? आज हम स्वतंत्र हैं...लेकिन स्वाधीन (स्व+अधीन) नहीं हो पाए हैं क्योंकि जिस
स्वतंत्रता की बात बारंबार की जा रही है वो तो मात्र व्यक्तिक स्वतंत्रता से ज्यादा कुछ भी
नहीं जबकि स्वाधीन होना यानि हम समाज-संस्कार-संस्कृति-परिवेश में उच्चोत्तर विकास
करते हुए 'स्व' के उपर 'अधीन' रहकर देश को पटल पर रख सकें। स्वाधीनता इस अर्थ में
कि हम स्वतंत्र जरुर हैं लेकिन मानसिक रुप से रुग्न और पराधीन--अनुसरण बुरा नहीं है
किंतु उसमें अगर देश का जज्वा ना हो तो रंग बदल जाता है। मात्र व्यक्तिक विकास ही
देश का विकास नहीं है--चाहे हम लाख चिल्ला-चिल्ला कर विकसित होने का धौंस...बुद्धिजीवी
होने का छोटे और कमजोर लोगों पर जमा सकें किंतु जैसे ही हम विकसित राष्ट्र की श्रेणी में
खड़े होते हैं, हमारी धीधी बंध जाती है। न तो साहित्य, न विज्ञान, न मेडिसिन, न खेल किसी
भी प्रतिस्पर्धा में हम कही नहीं ठहरते-- भारत की सांस्कृतिक उपलब्धियों में रमने पर
अंतःकरण गीता और शंकराचार्य के दर्शन, चरक की आयुर्वेद एवं आध्यात्मिक उन्नति की
सुगंध से आज भी महक उठता है। मैनें यहाँ के कई महात्माओं-माताओं के शिविर में जाकर
देखा है, अन्य विश्व से आए बृहत संख्या में ये वही लोग हैं जो अपना सबकुछ छोड़कर
शांति मांग रहे हैं-- यही सब देखकर उज्जवल-आनंद तथा असीम गौरव का बोध हम करते ही हैं।
भारत का "संन्यास" उस महान दार्शनिक 'प्लेटो' के लिये भी अज्ञात ही था,जब 'सिकंदर महान'
से अपनी गुरुदक्षिणा में भारत से एक "संन्यासी" लाने को कहा था। यह भी ठीक है की
ब्राह्मणवाद ने धर्म की आढ़ मे कई सामाजिक कुरितियों को जन्म दिया लेकिन हमारा
आध्यात्मिक दर्शन आज भी शांति की राह विश्व को दिखा ही रहा है--चाहे रजनीश हो या
रामदेव या दीपक चोपड़ा (इनके शिष्य तो राष्ट्रपति बुश ही हैं) या श्री श्री रविशंकर अनेकों
बाहरी लोग इनके आश्रम में देखे जा सकते हैं। लेकिन जिसके रहस्य को संसार देखने निकला है,
उसे हमने ही भुला दिया है-- अमेरिका ने अब्राहम लिंकन, मार्टिन लुथर किंग; अफ्रिका ने
मंडेला; जर्मनी ने विस्मार्क आदि को महान से महानतम बनाया है...और हम इस बात पर
लड़-कट रहे हैं कि महात्मा गांधी महान या अंबेदकर--पटेल या नेहरु, यह एक विचित्र स्थिति
है,आने वाले १०० वर्षों में निश्चय हीं हम उस अवस्था में पहुँच चुके होंगे जब हमें अपने
धर्म-मातृभूमि पर शर्म आने लगेगी। इस देश को आजाद हुए ५० वर्ष से ज्यादा हो चुके हैं
और हम बारंबार इसी प्रश्न में उलझे हैं कि क्या वह सपना साकार हुआ जो हमारे राष्ट्रपिता
ने,हमारे पूर्वजों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देखा था...यानि वह सपना जिसमें स्वतंत्र भारत
उन तमाम अभिशापों से मुक्त होगा जो पराधीनता की देन थे और हम भीतरी और बाहरी
समृद्धि की आभा से खिल उठेगें गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, असमानता,भ्रष्टाचार,अराजकता आदि
प्रेतों से मुक्त होकर एक सुंदर और अखंड भारत का स्वरुप उभरेगा।
ऐसा नहीं है कि हमने उपलब्धियाँ प्राप्त नहीं की हैं--आर्थिक
व सामाजिक रुप से हम काफी समृद्ध हुए हैं;आम आदमी की बेहतरी के लिये अनेकों
योजनाओं एवं परियोजनाओं का निर्माण हुआ है;गांव उन्नति की ओर हैं;वैज्ञानिक व तकनीकि
स्तर पर भी काफी कुछ किया जा रहा है। हमारा राष्ट्र निश्चित ही विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा… की धुन में है पर इसमें अपने जैसा क्या है मैं समझ नहीं पाता
अगर बड़ी-बड़ी पार्टियों में,रोड पर नंगा नाच,खुलेआम शराब पीना अगर आधुनिकता है तो
दिखाओ इन तस्वीरों को उन राष्ट्रों को जो इनको बहुत पहले कर चुके हैं,हँसते हैं वो
हमपर...अनुकरण करते-करते नकलची बन गये हैं हम, शिल्पा के साथ क्या हुआ…
उन्होनें कहा मैं भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हूँ और आप भी देखें हम कितने Modern
हो चुकें हैं, किंतु वे किस आधुनिकता की गुहार लगाने गईं हैं, वही... जहाँ लज्जा व स्थिरता है
ही नहीं यह सोचनीय पहलु है; जिस विवेकानंद ने 1893 शिकागो में भारत की सांस्कृतिक
संस्कारों को गौरवान्वित किया था,जहाँ विश्व के अनेकों महान चिंतकों ने उठकर, अंतत:
अभिनन्दन किया……।क्या लगता नहीं उस स्तर को हमने कितना उठाया है…, हमें
अपनी माँ के उपर गर्व होने की बजाए शर्म आती है आज...धिक्कार है ऐसे सपूतों पर...।
पंजाबी-मराठी, बंगाली-राजस्थानी, बिहारी आदि में कौन सम्पन्न...होड़ लगी है। मात्र
हमारा स्वरुप निर्मम दया की अभिव्यक्ति बोल रहा है,इतने सालों में देश की राजनीति
भ्रष्ट आचरण के मनुष्यों की बेढ़ियों में जकड़ चुका है---नीजी स्वार्थों की पूर्ति में देश और
समाज क्षेत्रवाद- जातिवाद- संप्रदायवाद में बुरी तरह झुलस रहा है,मूल्य गिरते जा रहे हैं,
हमारी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक मूल्य खंडित होकर राजनीतिक बजबजाहट में
डूब रही है। हमें यहाँ तक अपनी भाषा-संस्कृति-साहित्य-परंपरा और राष्ट्रीयता के प्रति
गौरव बोध रहा ही नहीं।
कहते हैं मीडिया हर देश की आँखे होती है पर यहाँ तो वह भी
पहले अपना अस्तित्व खोज रही है--कई जगहों पर मैंने देखा है,काफी बड़े-बड़े लोगों का
Interview लिया जाता है लेकिन यह वे लोग हैं जिसने आम आदमी से अपने को जोड़ा
ही नहीं है उनकी बातो को अगर सुनें, देश का सच Five Star Hotel और इनके जश्न में
छुपा होता है। The problem of indian elit class is only that कि वो जब तक आम होते
है विचारवान होते है जैसे ही उपर स्तर पर पहुँचते हैं अपना वह चोला उतार फेंकते हैं,
विदेशी लिबास,विदेशी भाषा, विदेशी संस्कार और भारतीयता एक शर्मनाक......।बाहर से
हम चाहें जितना समृद्धि का डोंग कर लें अपनी अस्मिता को निरंतर खोते ही जा रहे है।
राखी सावंत, दीपल शाह आदि अगर आज के युवावर्ग की Role Model हों तो समझा जा
सकता है की तस्वीर कैसी है--इस रुप मे INDIA को भी बदलकर AMRENDIA रख देना
चाहिए और कहना चाहिए कि न अच्छा लगे तो कान बंद कर लो...!याद रखें की जिस
Poised India और Incredible India की तस्वीर हम पेश कर रहे हैं वह ,वह आधुनिकता
नहीं है जो वाह्य दिखावों पर टीका है…वह्…तो शौम्य भारत का…गंभीर सर्वसमावेशीत
आत्माभिमान है। और निश्चित हीं हम इसे अलग पहचान,अलग आलिंगन दे सकते हैं…॥

"हमें कुछ नाज़ है... इस माटी पर कुछ गर्व छुपा है इसमें
मेरा दिव्य- भारत महान... कुछ कर्ज चुकाना है तुझ-पे...
बदल डाली है तेरी आवरु... को एक ऐसे महफील में
झुकी हैं टूट कर पलकें... कहीं उन्हीं के दामन पर
हमें तो याद ही नहीं... हमारी यही वह माता है
यही उसका आँचल है यही उसकी लाज...पड़े हैं फूल
उसके...शहीदों की शाहादत पर...खिलेंगे फूल चौखट
पर मुझे मालूम है एक दिन...कहीं तो अंत होगा ही...
हमारी वासनाओं का...है सलाम उसे जो मेरा है हमारा है
शायद अपनों से भी थोड़ा ज्यादा ही प्यारा है...। "

हमारा देश…हमारा हक, हमारा विश्वास, हमारी पहचान है…
3:33 PM
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3:33 PM

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Saathi



Saathi

सोंच रहा था...!!!
जब कभी सपनों में कल्पनाएँ...
चित्त को उद्वग्न कर जाएँगी, आयेगी
फिर 'वही' निशा पहर में......
सपनो की मनोरम बारात सजाएगी,
पंकज किशोर की वह अभिलाषा
साथी मेरा संगती भरी वह जिज्ञासा...!!
क्षण-क्षण नये तेवरों से और, कितना रुलाओगी,
दौड़ जाती हो इन हथेलियों को छोड़
कोसों दूर अम्बर में...और बर्षों तक नहीं आती
मेरे खिले प्रसून की गोद में...
दूर बहुत तो मैं देख नही सकता
अपनी चंचल-उत्सुक निगाहों से,
दूरस्थ मंजिल तक पहुँच नहीं सकता
इन लड़खड़ाते पैरों से......
नूपुरों की नटखट धुनों में बांध
हमेशा कितना...सताती हो...
वहाँ हरीतिमा की सुंदर सेज़ में..,
वहाँ गुलशन के आयतों में...
कहीं कोई और श्रृंगार पाती हो...!!!
जो क्षण भर में मेरे अद्योपांत पगडंडियों से
बाहर दौड़े...चली जाती हो...।
बीत चुके कई हजार लम्हें
कई रातें भी पुन: जाग गईं...,
खिलते -मुरझाते पंखुड़ियों का रोज
सवेरा और मातम आता-जाता है,
अक्लांत हृदय में दारुणता तन्हइयों की
सुध दे जाता है......
नीहारता हूँ अपने रुंधे आच्छादित मन में
कहीं...तेरी वहाँ कुछ लय हो,
ढूंढता हूँ...!! सर्वोविस्तारित वन तक
कहीं वहाँ तेरी भींनी खुशबु का कोई आश्रय हो,
पर नहीं मिली तू मुझे इन यौवनॉ में
अकेला ही खड़ा था...सफर की राह पर
अपनी मौजो में तेरा रुप तेरे अहसास का पल लिये
मगर नसीम की रुसवाईयों में वह भी बह गया
तकता-तकता राह मैं तेरी निराशा से भींग गया,
कड़वटें बदल-बदल कर बीतें हैं कई फसानें
समझता रहता तू...है मेरे इसी सिरहाने,
चूमा भी कई बार हथेलियों को तुझे पाकर
लेकिन...मेरा यह आदर्श...!!!
चेहरा वहाँ उभरता ही नहीं था कोई प्रस्ताव लेकर
यह थी इनायत मुझपर मेरे बेबाक अनुराग पर
चाहा...कई बार उकेर दूँ तुझे चेतना पट पर
मगर इंतजार का यह मदहोश आलम छोड़ता कब था
अचेतन पड़ा था वह जो व्यंग-हाले में...
सरकता सा मैं जाम हर हाथों में टूट रहा था...
लेकिन तुझे पाने की चाहत में मैखाने का
इतिहास नहीं बना था......
मेरी समझ की भी क्या गाथा-सार है
उच्चतम नियमों का उदगार है...
संस्कारों में लिपटी मेरी हृदयतार है...
सिद्धातों में उलझी मानसिकता,यही मेरा अंधकार है ।

3:35 PM
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आज का चिंतन...

आज का चिंतन...
मेरा मानना है कि परमात्मा ने मनुष्य होकर
जन्म लिया है,यही अवतारवाद का भी स्वरुप
है किंतु यहाँ जन्म एक पूर्ण-मुक्त मानव का
होता है.जितने भी प्रज्ञावान पुरुष हुए हैं उनका
भी मानना कि हमारे भीतर जो चैतन्य है वही
परम अवस्था भी है--इसका तात्पर्य यही है कि
हर साधारण मानव परमात्मा की प्रतिमूर्तिस्वरुप
है जो मानव को अन्य किसी भी जीव से उसकी
अपार सक्षमता के कारणतः अलग करती है यानि प्रत्येक मानव के अंदर
ब्रह्मांड बनाने की क्षमता विद्यमान है अलौकिकता कहीं बाहर नहीं...अंतर्निहीत
होती है;शंकराचार्य ने माया को इस अज्ञान का कारण माना है...इसके कारण
ही हमें अपनी शक्ति का पूर्ण आभास नहीं हो पाता और परमात्मा स्वयं से
अलग दिखता है--हमारा शरीर तो एक तीर्थ है जहाँ हर एक उच्च स्तर
के बाद भीतरी शुद्धता का अनुभव होता जाता है...मात्र मानसिक व मन के
प्रयास से उन कोष्टकों को जागृत किया जा सकता है जो जन्म के साथ सभी
मनुष्य में सुप्तावस्था में होता है... चैतन्य का शाश्वत प्रवाह जो व्यक्तिगत
इच्छा-आकांक्षा से मुक्त होकर सर्वशक्तिमान सत्ता की ओर हो जाता है महानता
का शिखर उसके मस्तक पर होता है...हलांकि उसे यह पता नहीं होता, उसका
जीवन तो सत्-चित्त-आनंद में लीन होता है-- मैं यह सोंचता हूँ कि जब इस
जगत का प्रत्येक कण अपनी हर अवस्था में एक दुसरे से भिन्न होता है तो
व्यक्तिगत ज्ञान का अहंकार स्वभाविक ही है...किंतु यही तो अज्ञान है; हमारी सृष्टि
का स्वरुप विकासमान है जो लगातार किसी ओर प्रवाहमान है...यही गति दिव्य
अलौकिक युक्त मानव की अंतर्निहीत सत्ता उसके पुण्यात्मा होने का मार्ग बतलाती है...
और तभी जगत को संपूर्णता एवं सूक्ष्मता से देखा जा सकता है...
हरि ओम तत् सत्
3:16 PM
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3:16 PM

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इकरार


इकरार
इकरार-ए-मोहब्बत बयाँ करते गुलशन-ए-फलक की दिवानगी तक
क्यों रंज हो जाता है गुस्ताखी के मुकाम पर;
छोटी-छोटी बातों पर तकरार का मजा ही कुछ और होता था,
आज वो छोटी सी नादानी पर मेहरबाँ न होकर चले गये
शायद फिदरत की नजरों में बयाँबा हो गये या अपनी जिंदगी की नज़म में आप ही खो गये...
सुरमा तारीफे काबलियत की हमद में लगा रखा था,
जिस ओर मैनें तेरी नजरों का ज़ाम पिया था,
ज़रा एकबार रुख से अपने शोख फसाने को तो हटा ले
मैपरस्ती का शौख बेइख्तियार न हो जाए...
बस एक नजर पर हम आपको बेहोश पड़े मिल ही जाएगें,
पर क्या आप भी मुझे और गिरने से बचा पाएँगे...?
तमन्ना है तेरी आवाज में शाम-ओ-सहर हो जाए
नजात मेरे रुह को और तुझे जमाने की रौनक मिल जाए...।

वैसे तो मैं उर्दू के संगत में अभी तक नहीं आया हूं किंतु भावनाओं
के सहारे कुछ कहने का प्रयास किया है--थोड़ा गौर फरमाएं इसमें गलतियाँ
हो सकती हैं--
3:39 PM
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3:39 PM

Divine India

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मिली है चांदनी मुझे...



मिली है चांदनी मुझे...
चांद मेरा छुप गया था वहीं...! कायनात के अब्र में
जहाँ सो जाती है मुक्कदर अक्सर...ख्वाहिशे रखकर,
विखर गया था रंग मौसम के प्रच्छद-पट पर
मिली थी मासूम...तन्हा...जिन्दगी विराने चाहत में,
गुलों में राख की फैली हुई कई और लकीरें थी---
बहारें निर्जर होकर मुझसे उपहास कर रहीं थीं...,
निःशब्द...थी आशाएँ, स्खलित हुआ था यौवन
ज्योत्स्ना त्राण मांगती रही, सिमट के अंधकार में,
डूबा जाता था...मेरा प्राण, बदहवास सागर में...
कहीं तो गंगोत्री की मिले शीतलता, पिपासा थी...मन में,
नयनों से निकलता सलील झर-झर बहता... जाता था
किसे तलाशता था हृदय... यही वह याद दिलाता था,
पैदल-था, थका हुआ... बोझिल था अपने-आप पर
किंक-कर्तव्यविमूढ़ मेरी अराधना, स्तब्ध था...यह चरित महान;
शहादत हुई थी 'होली' में और मातम थी 'दिपावली' पर
प्रार्थना की लौ... या रुहानी आत्मबल के साथ
खड़ा था कितनी रातों तक दिलासा देता हुआ मन को,
खिला है-- आज मेरा चांद, मेरी हथेलियों पर से
नैराश्य-चित का वातायन विह्वल हुआ है, क्षण-भर में...
बस सुनता ही जा रहा था उसकी आहटें, अनेकों दृष्टांत पुराने
निरीह-मन का भावानुभाव...! आंतरीक रुदन से
भर गया... स्मयमान क्षण भावनाओं के जल से,
अधीर मेरे नयन और अधीर थी उठती आहें--
सवेरा हुआ था वर्षों...बाद मेरे घर-आंगन में,
मालूम था मुझको...वक्त कहीं ठहर गया है...
जागी थी मेरी किस्मत... इतने करीब से,
भरी है चांदनी जबतक...अमावस के गहरे अंजन पर
छेड़ दूं संगीत नया इस अनोखे से जागरण में... ।
3:16 PM
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3:16 PM

Divine India

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My Beautiful Philosophy



My Beautiful Philosophy


You are my Sober feeling,


You are my Jest,


You are my beautiful unabridged dream,


You are my Romantic Philosophy,


OH! My Sweet Passion Of Thought


Where are you?


I always find in a memory


And Silent Path


In a Paramount of Sky


In a Tumult Earth.


Oh! Dear , dawn down


Embrace me ,Engross me…


Till the infinity of Love.


this is my first attempt in English.
7:57 PM
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7:57 PM

Divine India

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चिंतन-५

"सच तो ये है कि हम अपने अंतस की आकांक्षाओं से
आगे कुछ-भी नहीं देख पाते; सचमुच...ये निगाहें
ही हमारी पथप्रदर्शक हैं, इन मन की विभूतियों से
आगे न हम कुछ जान पाते हैं और न ही समझ पाते हैं,
जिसने परम अनुभूति की आकृति को अपने अंतस में
स्थान दिया ही न हो वह नास्तिकता के पथ पर चला जाए,
कोई आश्चर्य नहीं. काम-ज्वाला और भौतिक-आवरण ने
इंसान के भीतरी चक्षुओं को इस तरह से कैद कर रखा है
कि स्वतः यह आभास होता है-- मेरा दृष्टिकोण ही सत्
और सर्वमान्य है किंतु यह सोंच गलत या सही नहीं है,
अंधकार मात्र इसकारण से है क्योंकि दूसरा मत भी हो
सकता है, इसे नकारते हैं-- मन की वास्तविक दुनियाँ को
अगर विस्तार दे सकें तो बाह्य सत्ता अपने-आप बृहत हो
जाएगी."
9:17 PM
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9:17 PM

Divine India

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