"नालंदा" जिसका अर्थ है
ज्ञान बाँटने वाला, जहाँ से भारत में सांस्कृतिक व
दार्शनिक विचारधारा का सूत्रपात हुआ। जिस समय विश्व अपने अस्तित्व को
अंधकार में तलाश रहा था, हमारी
नालंदा अपनी ज्ञान गंगा से जगत के
पाप-पंकिल-शरीरी को पवित्र करने में जुटा था। उस जमाने में विश्व ध्यान-योग
की शिक्षा इसकी गोद में बैठकर पूरा कर रहा था।
पटना (बिहार) से लगभग
90 km की दूरी पर स्थित यह महान
धरोहर अपने कर्णधारों की राह तक
रहा है, जो कभी हमारे ज्ञान-गौरव का साधन हुआ करता था आज स्वयं की
विगति से त्राण कर रहा है…।
भारत का गौरवशाली इतिहास शक्तिशाली मगध शासन के नेतृत्व में शुरु हुआ,
जिसकी राजधानी
राजगृह थी; यहीं से
विश्व के दो महान धर्मों का
जन्म हुआ, जहाँ से एक राष्ट्र की
भावना, समन्वय सौहार्द व आध्यात्मिकजीवन का प्रचार-प्रसार आरंभ हुआ आज अपने अस्तित्व की तलाश कर
रहा है जो निश्चित ही एक बड़ा आश्चर्य है। और यही क्रिया विश्व के
प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय नालंदा के साथ भी घटा। हम मात्र हाथ पर हाथ
रखे एक दूसरे की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहे हैं…।

सामान्यत: ऐसा माना जाता है की
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना पाँचवीं
शताब्दी के आसपास
कुमार गुप्त के द्वारा हुई पर इतिहास के पन्नों को
और खंगाला जाए तो पता चलता है कि इसका अस्तित्व द्वितीय शताब्दी से
ही बना हुआ था क्योंकि
नागार्जुन जो यहाँ के विद्यार्थी व बाद में शिक्षक भी रहे
उनका काल यही माना जाता है…।
हर्षवर्धन व पाल शासन काल में यह अपनी
प्रज्ञा से फलता-फूलता रहा किंतु इसके उपरांत धीरे-धीरे
यह गहरे अंधकार में
समाता चला गया जहाँ से पुन: बाहर नहीं निकल पाया।
महान चीनी यात्री
हुयेनसांग और
इत्सिंग ने कई वर्षों तक यहाँ सांस्कृतिक व
दर्शन की शिक्षा ग्रहण की,
नालंदा के विषय में काफी कुछ कहा है--- "उस
जमाने में विश्व के कई जगहों,
सुमात्रा, चीन, थाइलैंड कोरिया, श्रीलंका आदि
जगहों से विद्यार्थी ज्ञानार्जन करने आते थे पर इस विश्वविद्यालय की नामांकन
प्रक्रिया बहुत मुश्किल थी… विद्यार्थियों को तीन कठीन परीक्षा स्तरों से
होकर गुजरना पड़ता था जो शायद विश्व की पहली ऐसी प्रणाली थी। यहाँ
10000 विद्यार्थियों एवं 2000 शिक्षक के रहने की व्यापक व्यवस्था थी
जिसके लिए 300 कमरे बने थे तथा साथ और अकेले रहने की भी
अलग से व्यवस्था की गई थी। यहाँ की
नौ तलीय पुस्तकालय में
3 लाख से ज्यादा जनरल व पुस्तकें मौजूद थी जो अपने विनाश के समय
लगभग
6 महिनों तक जलती रही। इसके गौरव पर पहला आघात
हूण शासक मिहिरकुल के द्वारा किया गया बाद में
बंगाल का तुर्क शासक बख्तियार खिलजी ने 1199 के आसपास इसे पूरी तरह से समाप्त कर
दिया…। जिसकी बेड़ियों में वह आज भी बंधी हुई अपनी मुक्ति के उस
उज्जवल दिव्य प्रकाश की आस में आँख फाड़े बैठी है। यह हमारे देश
का दुर्भाग्य है कि हम अपने इतिहास की भूलों को सुधारने के बजाये
लगातार दोहराते जा रहे हैं।

मैं इसकी पुनर्स्थापना के लिए किए जा रहे प्रयास में ज्यादा विस्तार में
नहीं जाऊँगा पर हमारे
पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब ने जरुर इसे रास्ता दिया
आगे आने का।
सिंगापुर, चीन, जापान व दक्षिण-कोरिया ने भी सहयोग
देने का वादा किया है और 2009 तक इसके पुनर्जीवन को अमल में लाने
का प्रयास किया जाएगा…। पर अगर ध्यान से देखा जाए तो नालंदा आज
भी धूल में पड़ा अपनी मलिनता पर अश्रु बहा रहा है। कोई छोटा प्रयास भी
विकास का अभी तक सरकार के द्वारा नहीं देखने को मिला है… आज
मैं जब कभी टेलिविज़न देखता हूँ तो
"अतुल्य भारत" के विज्ञापन
पर मेरी दृष्टि पड़ती है तो थोड़ी खुशी भी होती है पर अफसोस इसबात
का है कि आजतक
नालंदा के विषय को न तो लोगों तक पहुंचाया
गया न कभी दिखलाया गया और आज सरकार इसके विकास पर
बड़ी-2 बातें करती नजर आती है… वहाँ न तो बाहर से आये लोगों
के लिए रहने की व्यवस्था है
ना ही कोई पुस्तकालय है जहाँ
बैठकर
नालंदा के इतिहास पर दृष्टिपात कर सकें।
आज कुछ मित्रों की सहायता से इस महान संपदा की रक्षा के लिए
थोड़े कदम बढ़ाये गये हैं, जिसमें पहला प्रयास इसके उपर
चलचित्र बना कर किया जा रहा है और
इसका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ हैजिसका उद्देश्य है जन-जन तक इसके गौरव तत्वों को पहुंचाना
जिससे इसपर कुछ काम किया जा सके… और भी कई सारे ऐसे
काम हैं जो
हमारे मित्रगण रात-दिन एक कर उसे क्रियान्वित करने
में जुटे हैं… सरकार का प्रयास आजतलक तो नकारात्मक ही रहा है
पर हम अपने सामर्थ के अनुसार क्या ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते
जिससे इसके विकास में एक ईंट जुड़ जाए चाहे वो
वैचारिक सहायता
ही क्यों न हो…।सबसे बड़ा आश्चर्य तो आप सभी को यह जानकर
होगा की मुझे अपनी फिल्म बनाने में कितनी परेशानी हो रही है
क्योंकि नालंदा के उपर
इंटरनेट पर कुछ एक पेज के सिवा कोई
सामग्री ही उपलब्ध नहीं है…। ये है असल दुर्भाग्य हमारे वर्तमान
का जो हम इतिहास को सहेज ही नहीं पा रहे हैं… कहा जाता है
की इतिहास की महत्ता ही ये होती है कि भविष्य में दोबारा वो
गलतियॉ न की दोहराई जाए जो हमने की हैं।
"कब तक घुटेगी तू इन संस्कारों में,
कब तक बहेगी इन उपेक्षाओं में सालों से खड़ी है तू यहीं अवशेषों परजो प्रकट है क्षण-क्षण वर्तमान परमुरझा गई है तू एक याचक बनकर,
ज्ञान-देवी तू साधना सागर चिंतन का तू अंकुरण है,सत्य सजाया हृदय महल मेंविश्व जागरण का तू प्रस्रवण हैएक तू ही तो सुंदरा है वन मेंमेरे राज्य की गहरी धुंध में
गिर जाने दे अपने सजल अश्रु
इन विखंडित शिलाओं पर, त्याग निस्तब्धता सांझ कीआध्यात्म-वाणी का आह्वान कर,
उठ जाग अभी महानिद्रा से, बढ़ा दो कदम बोधि-वृक्ष की तरफ
स्वयं की अलौकिक वसुंधरा पथ परजीवांत सुरभि… शांत लहर में,गीत रच ले अनंत स्पर्श मधुर ध्वनियों की सत्य यही है दिव्य देवी…तेरा आदिकाल ही तेरा, वास्तविक उषाकाल है।"
"मेरा आज आपसे इस लेख के लिए टिप्पणियों की प्रतीक्षा
नहीं है वरन यह की आप अपने वैचारिक तत्वों को मुझसे
बांटें कि वहाँ पर और क्या किया जा सकता है विकास
के संदर्भ में। मुझे जरुर अपनी योजना से अवगत कराएँ
शायद कुछ एक तत्वों को मैं अपनी फिल्म में भी शामिल
कर पाऊँ।"
धन्यवाद।
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