त्रासदी का समर है…ऐ "परमात्मा" !!!



सुंदर जगत ये सुंदर आवरण

अद्भुत प्रकृति पर दिवस का आगमन

किस ओर नहीं हर ओर मौज है

चातुर्दिक प्रेम दिव्य संगीत की लय है…

******

विपदा का एक ऐसा मंजर भी आता है

तराशी हुई दुनियाँ में भी एक ज्वाला फूट पड़ती है

नभ धू‍‍‍-धू करता हुआ उपवन हीं सारा जलता है‍‍‍‍,

सुंदर मानव मूर्ति इतिहास बनता जाता है…

*******

देख समर! गरज रहा था सागर जब

वो नभमंडल भी बरसा था

रक्त में सनी थी मेदनी

शिलाएँ छिंटों से आवृत हुईं

******

शंकर तेरी आपदाओं में क्या

विपदा की अग्नि भड़केगी

मृत्यु की आगोश में क्या

तेरी यह दुनियाँ तड़पेगी

******

नितांत प्यासे से लाचारों का

भूखों का और आशाओं का

फटती हुईं अबलाओं की छाती

विलखते क्रंदित उनके बच्चों की आकृति

******

थकी विपन्न बूढ़ी झर‍-झर आँखें

झुर्रियों पर भी तनी हैं भौंएँ

समता पर विषमताओं की लहरें

भीषणता पर प्रतिकार करती दिशाऍ

रक्तों को उद्वेलित करती लीलाएँ

******

उजड़ गया यह उपवन सोना

मात्र पत्थरों पर टूटी पड़ी

हुई सांसों की अस्थियाँ हैं.......

किसकी भावनाओं में स्थित

डूबी नजरे.......बह गईं... छोड़कर

******

ऐसे, हर जन्मों का न्याय विखड़ता है

हर साल लाखों घर लूटता है।

तेरी चरणों में श्रृंगार यह आभूषण कैसा

अपने ही पुत्र- पुत्रियों का यह मातम कैसा

******

कैसे नहीं तू तड़पता है, कैसे नहीं तू रोता है

ऐसी विनाश लीलाओं के दर्द में

कैसे नहीं तू विफड़ता है......

तीसरी आँख का यह कैसा ढंड विधान है

जो बरसते हैं तेरी अंशों पर हीं,

गिर पड़ते हैं तेरी भावनाओं की

मर्म हथेलियों पर हीं.......

******

आकर देख जरा इस सृष्टि को

और इस सुंदर मानव को,

तू भी तो एक पापी हुआ

हजारों नयनों में आँसू भर कर

तू भी तो शापित हीं हुआ

अब तू भी चैन कहाँ पाएगा,

शंकर क्या तू इनके दुःखों को सह पाएगा

******

ये नर और नारी ……

गरिमा प्रदत्त तेरी हीं आँखें हैं

सुंदर-सुंदर रचनाओं की यह

सर्वोत्तम प्रतीकात्मक आहें हैं

फिर, क्यों अपनी हीं तस्वीर को फाड़ना चाहते हो

अपनी हीं अंगों को बारंबार काटना चाहते हो

******

छोड़ दिया है... उस रण में

जिसमें लड़ना भी है और अंततः

तुम्हारे रथ- चक्कों के बीच में

दबकर मर जाना भी है...

जीतना हीं सिर्फ तुझे है और

हारना ही हम सबका धर्म है

******

गंगा की धाराओं में तैरती लाशें बनकर

गिद्ध- कौवों का आहार बनकर या

समाचार पत्रों में शब्दों की सुंदर शैलियॉ बनकर

******
बिखर
गया हूँ आज इन हरी वादियों में

उस ऊँची मीनार पर और

रुठती - तपती शिलाखंड पर

छूट गया अब तेरी मर्यादा का सम्मान

रुठ गया अब तेरी करुणा का गान

बस अब तेरी पूजा हीं बची है...

श्रद्धा का मोल तो बीक चुका

भक्ति का संग तो छूट चुका।

******

"अब कैसे हो तेरी अराधना

अब कैसे हो तेरी भंगिमा

बता भगवान तू हीं

अब कैसे हो तेरी प्रार्थना..."

2:27 PM
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2:27 PM

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तू ही मेरी प्रतीक्षा है…!!!



है वह अनगिनत सुरों की साधना

यहाँ से वहाँएक छोर से दूसरे तक

वादियों में बिछे शबनम की शीतलता

मेरे भागते जीवन की आश्ना

किसी संध्या की शांत कहानी की भंगिमा

ज़ूस्तजू है या मेरी कल्पना की तृप्ति'का

कोई सोंच हो मेरी या मेरे अनुमानों की मूर्त मीमांसा


कुछ तो हो
ssssनहींssss सबकुछ!!!

अब तो यह आलम ही बदनसीब हुआ है जो

शब्द-चादर में समेटना चाहता है तेरी अंगराइयों को

मगर स्वयं तुम व्यक्त हो इशारों में कहीं भी


सुनी थी सिसकियाँ तुम्हारी एकांत झुरमुट से

जहाँ गिरे थे वह मोती मेरे आग्रह में

ज़ुबां खामोशनमीं फैली है पलकों मेंतड़पती सांसे

तेरी यादों के आगोश में घुटता ही रहता है


शमां की पवित्र लाली में जलता जाता हूँ
तेरे लिए

कभी रुख़सत होता हूँ खुद सेतेरे लिए

बिखड़े हुए सपनों के पोरों को जोड़ता जाता

तन्हा राहगीर फिरता रहतादर-ओ-दर

यही तो उलझन है जो हमेशा अपने से भटक जाता हूँ


अब तो जज्बात भी सो गये झील की गहरी गोद में

वही तो कुछ मिलन की यादें सहर हैं मेरे अनुरागी मन में

टपकते जाते मेरे सलिल फलक में समां

बरस जाते हैं तेरे यौवन परपैगाम देते हैं


खड़ा हूँ मैं
……

अभी-भी उसी राह पर

जहाँ चांद पूरा खिला हुआ था

अब्र पानी से भरा और धरा से मिलन चाहता था

आशियां सुबह की ताजगी के नेत्रों से पुलकित थी


sssssss मेरी दिलकश नाज़नीन

इशारा है यह भी उसी तरह,

शमां भी अद्भुत है उसी तरह,

अब तो बसंत के बादल भी आ गये

बस मेरी इन बांहो को प्रतीक्षा है उसी तरह

5:54 PM
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5:54 PM

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खुशबू है 'वह' विभिन्न रंगों की…!!!



थोड़ा-थोड़ा साथ उसी का, सत्य भी है अखंड भी

मेरे अंगों की खुशबू, मेरा अहंकार है वह

अफसाना भी है वह, कोई तराना भी है

लेखक की कल्पना है वह,कोई कलम की रवानगी भी है


कहानी भी है वह, कोई दिलकश प्रेमी का नूर भी

सपना है अहसास और साक्षी है वह कर्तव्य का

अत्यंत करीब है वह, कोई योजनों के पार भी

आसपास ही फिरती इच्छा भी है,

कोई परदे की उसपार की तृष्णा भी


एक आवाज है वह संगम की
,

कोई उठता शांत आगाज भी

अंदाज है वह उस नव-जीवन का,

कोई दिशा से जागता पुनरुत्थान भी

कोलाहल है वह चकित संयम का,

कोई अंतर का भूचाल भी


अयाचित ममता की तस्वीर है वह,

कोई करुणा की आराधना भी…

सौंदर्य नगर है भावनाओं की वह,

कोई तृप्त आनंद की दास्तान भी…

ज्योत्सना की शीतल आधार है वह

कोई मौज की कल-कल धारा भी…


विशाल है तनमयता उसकी,

कोई पंक्षी की चहकती मुस्कराहट भी…

आध्यात्मिक उन्नति का विकास है वह,

कोई अलौकिक ज्ञान और श्रृंगार भी…

मेरा आत्मानुसंधान भी है वह,

कोई लक्ष्य की संभाव्यता भी…


कुछ पलकों को भींचकर फिर देखता हूँ आवरण मैं

मेरी आत्मस्थित अभिलाषा है वह,

कोई स्नेह-सिक्त आश्रय भी…।

4:49 PM
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4:49 PM

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जिंदगी लहर है…इबादत है…!!!



यह निर्जरा है…प्रधन का
संयुग है…एषणा का
समग्रता है…आश्चर्य का
चांदनी है…अपूर्व सौंदर्य शीतलता का
जिंदगी लहर है…कौतूहल का
इबादत है…परमात्मा के स्नेहावलंबन का,

छिपाया मर्म है कितने स्थापनाओं का
बड़ा अनोखा रहस्य भी है अंधकार का
भाषा भी इसमें और परिभाषा भी…
आशा का तिनका और एक सहारा भी
निराशा की लाठी है यह, तत्वज्ञान भी

हम खिंचते जाते है आढ़ी-टेढ़ी लकीरें…
बिना तस्वीर की परिकल्पनाओं के…
राह पर बढ़ चलते हैं और कई मोड़ों पर
सोंचे बिना मुड़ जाते हैं……
अपने मंतव्यों पर बिना समझे चढ़कर उतर जाते हैं
गुजरते हादशों के पन्नों को बस यूं ही
पलटते जाते है…
जिंदगी की इसी लहर को हम सब जीते चले जाते हैं।

सुबह होती है और रात गुजर जाती है अंगराइयों में
जिंदगी की यह लहर अपने ही कशमशाहट में
हंसते-रोते कट जाती है…खड़े रह जाते है उद्देश्य हमारे
जगत के अंधेरे साये में कढ़वे सत्य के सहारे

ख्यालों की सरिश्त से तरबतर आलम तकता है परेशान होकर
कोई रुककर किसी के हाथ भी तो नहीं सहलाता
मृदुलतास्नेह वर्षा से मन को स्पर्श भी तो नहीं करता
पहचानना तो दूर…अंधी-दौड़ के साथी सब
अपने होकर भी मुख फेर लेते हैं

जिंदगी की यह भी एक लहर है…जो उदासी की बदली
से झांकती जाती है…नदियों पर तैरते, पर स्थिर दिखते
पतवाड़ों के बिल्कुल नीचे से विशाल आवरण में बहे जाती है…
डुबकी लगाते है नदी में और तत्क्षण पूरा जीवन नया हो्कर
पिछे छूटे समय पर व्यंग करते बहे जाती है…।

निगाहें ढूंढ़ती है उसे, वारिपूरित कर दे निर्जन उपवन को
दोनों हथेलियों से अपने जो सहलाए मातम को
तन्हाइयों से पटा यह वृहत मैदान सुगम उत्सव को
उन्मुलित है कर रहा…अग्रगण्यता का मंत्र लिए
पकड़े विज्ञान के हाथों को…
प्रेम-अनुराग के मतलब को ही बदल रहा…
स्वच्छंदता इतिहास…!!!
और जीवन का मर्म यहीं खड़ा प्रतीक्षा कर रहा…

हम जीते चले जा रहे निरुद्देश्य
वह बदलता बहता जा रहा है…
लगातार बिन रुके…बिन थमे
जीते तो जाते हैं हम इसे अपना तरीका मानकर
मगर इस जीवन को जीने का सलीका
गलत होता…।
1:54 PM
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1:54 PM

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वहाँ भी अनंत...यहाँ भी!!!



वहाँ भी सरक कर पत्तों से बूंदे
अनंत में घुल जाती हैं
यहाँ भी शब्द ह्रदय की गहराइयों
से
टपक कर अनंत बन जाती है।

शुरू का बोध अगम्य निश्छल
कार्य कल्पना के पार नईया खेता
यहाँ भी नाचती अहसासों में
अबंध गीता की परिकल्पना।

कितने दिवस बीत गए उम्मीद-ए-आशाओं में
कई लालिमा प्रकृति में खिल कर मुरझा गईं
यादें अपने चरम पर "प्रियतम" को छू गईं
रास्ते बनते गयें और दिशाएं बदलती गईं
मगर याद रहा यहाँ की वो रूमानी छांव

कुछ की नवीन, कुछ प्रेम, कुछ प्रांजल रचनाओं
की भावावस्था...भुले नहीं पाता था और पुनः इस
दश्तुर में मिलन करनें आ गया ,
एकबार फिर मेरा पदचिह्न उभर कर
औरों के साथ हो लिया ।
12:58 PM
Post Was Published On

12:58 PM

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चला मुरारी "Director" बनने…!!!


बिहार के ग़र्द से
दिल्ली की ज़र्द तक और
मुंबई के "अर्ज़" पर चला
यह 'मुरारी' अब "Director"
बनने...!!!
UPSC(IAS)छोड़ने के
एक साल बाद भारी मुसक्कत
और मानसिक दुविधाओं को
परास्त करते हुए अंतत:
"Film Making"
के ग्लैमर के आकाश में उड़ने
को चाहा मन… थोड़ा परिवार
और अनेकानेक महानुभावों की
असफल आपत्तियों के बाबजूद…मेरे पैतृक गाँव
"जहानाबाद" से प्रथम,पूरे बिहार में से कुछ की
श्रेणी में आना भी रोमांचक लगने लगा और
मेरे कंधे इस बोझ से इतने दबे हैं कि कोशिश
के सहारे उस विशाल अनजाने मंच पर बेदियों
का निर्माण करने निकला हूँ…कहाँ पढ़ने लिखने
वाला यह शक्स दुसरे चेहरे में अपने स्वरुप
तलाशने निकला है…।
कुछ दिनों तक शायद मेरी अंतर्जाल पर उपस्थिति
न हो पर जल्द मैं अपना कैमरा MOVE करूँगा और
जल्द वापस आऊँगा तबतक बिदा "आपकी
दुआओं के सहारे"… लेकिन…
चला मुरारी "Director" बनने…!!! तबतक
क्रमश: रहेगा…
उस मंच की कथा का अगला अंक मेरे दोबारा
आने तक…!!!
12:09 PM
Post Was Published On

12:09 PM

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1857 का "Revolt"


1857 का विद्रोह” अपने 150 साल पूरा
कर चुका है, मुंबईचौपाल
पर बहस के लिए आमंत्रण किया गया था
बात यहीं से शुरु हुई…मैंने देखा वर्तमान
समय में इतिहास के कुछ पन्ने स्पष्ट हो
चुके हैं तब-भी इतनी अतिश्योक्तिपूर्ण परिचर्चा
हो रही है…अब चुकीं इस क्षेत्र से अपन का
लंबा नाता रहा है तो पूर्व का “मैं” जागा और
जैसे ही लिखने लगा…ये क्या मेरे हाथ कंपकंपा
रहे थे जैसे जड़ता की स्थिति में आ गये हो
Keypad पर कुछ भी टाईप नहीं हो रहा था,
मन भयाक्रांत था सहमा हुआ…अब लिखना था
1857 का विद्रोह और कांप रहा था मैं क्यों?
तो लो जी हम भी मन के अंधकार को प्रकाशित
कर लें नहीं तो मैं काला न रह जाऊँ…।एक दिन
“RSS तालिबान” लिखा लेख पर जा पहुंचा…
मैं इसपर की गई टिप्पणियों को पढ़ पूरी तरह
हतोत्साहित हो गया…वाह मित्रों!!! क्या हालात हैं
तुम्हारे…जब रचना जी ने अपने लेख में ग्रुप की
बातें की तो सारे झंडा लेकर विरोध करने जा
पहुंचें और वहाँ टिप्पणियों की संख्या मासा-अल्लाह!!J
सब सफाई ही देने में लगे थे…लेकिन ये क्या
संप्रदायवाद की दुर्गंध…क्या प्रतिक्रिया
दी है भाइयों भाई वाह!!!!!!
Shrish Bhai
मेरे एक लेख की प्रतिक्रिया में सच कहा था कि
दिव्याभ भाई आज –कल चिट्ठाकार बहुत असहनशील
हो गये हैं…यह अब सच लगने लगा है, कोई
अनाम बनकर टिप्पणी कर रहा है और जब
देखता है कि अभी तो कुछ कहा ही नहीं तो
दोबारा वही शक्स पुन: पहुँच जाता है…हमारे बीच
बौद्धिकता का चोला डाले कुछ मित्र-गण भी
कुछ-से-कुछ लिख कर आ रहे हैं…कई बार इन लोगों
ने “जलते भारत” पर सवाल उठाए पर दिख गया कि
लिखना और वास्तविकता दोनों अलग हैं।


सदाशिव स्वामी ने कहा था कि
जो करने की इच्छा हो वह मत करो,
तब तुम जो चाहोगे वह कर सकोगे।


इस विरोधाभासी कथन का यही अर्थ है कि अपने
“अहं” को मार डालो तभी उच्चता पाओगे।
अब कहीं मैं न इस गाली-गलौज में आ फंसूँ
तो भयभीत हो गया…था।]
तो चर्चा शुरू करते हैं---
1857 का विद्रोह“क्रांति” था। सबसे पहले
“क्रांति” को समझना आवश्यक है…
“क्रांति” वह होता
है जिसका कोई परिणामी उद्देश्य हो एक निश्चित समीकरण
हो एक गणितीय नियम हो…जो सत्ता के पूर्ण परिवर्तन
व नये शासन की शुरुआत करता हो…बदलाव की
उसी पुरातन पृष्ठभूमि से स्वयं को अलग कर
निर्माण की नई आकांक्षा को पूरा करता हो,
अर्थात सारे स्तरों पर तत्क्षण परिवर्तन।

और इस आधार पर यह अब प्रमाणित हो चुका
है कि 1857 एक विद्रोह था…।


1857 का विद्रोह एक महान जागरण था, जो गहन
अब्रिटिश” भावनाओं की अभिव्यक्ति स्वरूप उत्तर तथा
मध्य भारत में फूट पड़ा, यद्यपि भारतीय नागरीकों
के असंतोष का सीधा प्रभाव सैनिकों पर पड़ा,
जिसके कारणत: इसका आरंभ सैनिक विद्रोह के
रुप में हुआ तथापि इसका नेतृत्व असैनिकों के हाथों
में और शीघ्र ही इसने अधिकांश जनता एवं किसान
वर्ग को भी सम्मिलित कर लिया। विद्रोह की व्यापकता
इसी-से ज्ञात होती है कि उस समय के कतिपय
पर्यवेक्षकों ने इसे “राष्ट्रीय विद्रोह” की संज्ञा दी।
ईस्ट इंडिया कंपनी की साम्राज्यवादी अराजकतापूर्ण
शोषण की प्रवृति तथा धन की लोलुपता के संचित
प्रभाव से भारत में सभी वर्गों यथा रियासतों के
शासक, सैनिकों, जमींदारों, कृषकों, व्यापारियों तथा
धर्म संस्थापक आक्रांत थे, ब्रिटिश नीतियों के कारण
हिंदू-मुसलमान के धर्म-मान-जीवन सम्पत्ति सभी
को भय उत्पन्न हो गया था। यद्यपि भारतीयों का
रोष समय-समय पर विभिन्न भागों में विद्रोह के रुप
में प्रकट होता रहा; इसी आधार की उपज जो सामान्यत:
भिन्न व व्यापक जन-आंदोलन “1857 के विद्रोह
के रुप में हुआ।
जहाँ तक 1857 के विद्रोह की “राष्ट्रीय प्रकृति” का प्रश्न है
इस संबंध में इतिहासकारों में मैंतक्य नहीं है।
इसके पक्ष में “बेंजामिन डिजरेली” जो इंगलैंड में
समकालीन रूढ़िवादी दल के एक प्रमुख नेता थे तथा
अशोक मेहता” आदि विद्वानों ने इसे “राष्ट्रीय विद्रोह
माना है। डिजरेली के अनुसार
यह सुनियोजित एवं
प्रयत्नों का परिणाम था, जो अवसर की प्रतीक्षा में था।

जहाँ तक राष्ट्रीय विद्रोह का प्रश्न है, किसी विद्रोह
को राष्ट्रीय विद्रोह तब कहा जा सकता है जब;
    • वह संपूर्ण राष्ट्र में एक समान प्रभाव छोड़े
    • उस विद्रोह का कोई एक नेतृत्वकर्ता हो
    • वह राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर लड़ा जा
      रहा हो
    • विद्रोह को सर्वसाधारण एवं सभी वर्गों का
      समर्थन प्राप्त हो।


1857 के विद्रोह में बंगाली, पंजाबी, महाराष्ट्रीय तथा
मद्रासीयों नें यह कभी अनुभव नहीं किया था कि वे
एक राष्ट्र के सदस्य हैं। विद्रोह का नेता कोई राष्ट्रीय
नेता नहीं था। “बहादुरशाह” कोई राष्ट्रीय सम्राट नहीं
था, उसे तो मात्र सैनिकों ने नेता घोषित कर दिया,
नाना साहब का दूत लंदन से पेंशन प्राप्त नहीं कर
सका तब इन्होंने विद्रोह का झंडा उठाया। झांसी का
विद्रोह उत्तराधिकार और विलय के प्रश्नों को लेकर था,
इसमें कोई संशय नहीं कि “रानी झांसी” वीर-गति को
प्राप्त हुईं परंतु इससे स्पष्ट नहीं की वह राष्ट्रीय हित में
लड़ रही थीं। अवध का नवाब एक बेकार एवं व्यभिचारी
व्यक्ति था, जो राष्ट्रीय नेता नहीं हो सकता था यह तो
अवध के तालुकदारों ने सामंतशाही अधिकारों था अपने
राजा के लिए युद्ध किया ना कि राष्ट्रीय-हित में। इसमें
जनता के सभी वर्गों ने हिस्सा नहीं लिया आधुनिक
शिक्षा प्राप्त वर्ग, मध्यम एवं उच्चवर्ग तथा सम्पत्तिशाली
वर्ग इस आंदोलन से अलग ही रहा। विद्रोह का प्रसार
भी सीमित था, उत्तर व मध्य भारत के अलावा अन्य भागों
में इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।
डा सेन का कथन है:
19 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में भारत केवल
एक भौगोलिक कथन ही था तथा उस समय भारतीय
राष्ट्रीयता भ्रूणावस्था में थी”।
सही जान
पड़ता है।

श्री ताराचंद ने ज्यादा स्पष्ट किया है;
1857 का विद्रोह एक कमजोर व्यवस्था
का अपनी खोई हुई मर्यादा को पाने का अंतिम प्रयास
था।


अत: इस रुप में “1857 के विद्रोह" को राष्ट्रीय विद्रोह की
संज्ञा नहीं दी जा सकती। “क्रांति” तो बिल्कुल नहीं!!


जहाँ तक 1857 के विद्रोह का प्रश्न है, इसके वास्तविक
स्वरूप के संबंध में इतिहासकारों का विभिन्न मत है…
समकालीन अंग्रेज लेखकों ने जिसमें जॉन विलियम,
मालेसन, ट्रेविलियन, लारेन्स ने इसे सिर्फ सैनिकों का
विद्रोह या "म्यूटिनी" कहा। इन लोगों ने असैनिकों के
योगदान की या तो उपेक्षा की या इसे कुछ स्वार्थी
लोगों की स्वार्थपरायणता का परिणाम मानकर महत्वहीन
समझा। कुछ भारतीय इतिहासकार भी इसे सैनिक विद्रोह
मानते हैं—मुंशी ज़ीवन लाल, दुर्गादास, सैयद अहमद ख़ां
आदि। दूसरी ओर कुछ लेखकों ने इसे;
अंग्रेजों के विरूद्ध मुसलमानों का षड़यंत्र,
असंतुष्ट सामंतों का विद्रोह कहा।

“होम्ज” की उक्ति सबसे प्रसिद्ध रही इसने इसे—
“बर्बरता तथा सभ्यता के बीच युद्ध” कहा।
स्पष्ट है कि इस बारे में अनेकों विचार प्रस्तुत किये गये
हैं। किसी निष्पक्ष निष्कर्ष तक पहुंचने हेतु इन विचारों
का परीक्षण आवश्यक है---


यह सही है कि विद्रोह का आरंभ सैनिक छावनी
से हुआ, कारतूस के मुद्दे ने अवसर को मौका दिया
और सैनिक हिंसक विद्रोह कर दिल्ली पहुँचे जहाँ वहाँ
के सिपाहियों ने उनका साथ दिया लेकिन हमें यह ध्यान
रखना चाहिए की भारतीय सैनिकों का एक बड़ा भाग
अंग्रेजों के साथ में था जिसने इस विद्रोह को कुचलने
में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। दूसरे इस विद्रोह
में मात्र सैनिकों या सामंतों ने भाग नहीं लिया था वरन
जन-साधारण ने भी अपना रोल निभाया था। इसकारण यह
मात्र सैनिक विद्रोह नहीं था…।
जेम्स आउट्रम और डब्ल्यू टेलन ने इसे मुस्लिम षड़यंत्र माना,
जिसमें हिंदू शिकायतों का लाभ उठाया गया किंतु यह
व्याख्या भी अपर्याप्त है क्योंकि वर्तमान में यह स्पष्ट
हो गया है इस विद्रोह का कोई संगठन नहीं था।
इसी प्रकार इसे ईसाइयों के विरुद्ध भी विद्रोह नहीं माना जा
सकता क्योंकि एक तो ईसाइयों ने अपने धर्म प्रचार में
कोई पर्याप्त सफलता नहीं पाई थी दूसरे उनके द्वारा अंग्रेजी
शिक्षा के प्रचार को हिंदू-मुस्लीम दोनों समाजों के शिक्षितों
ने सहर्ष स्वीकार किया था।
आर सी मजुमदार का मानना है कि तथाकथित “प्रथम राष्ट्रीय
स्वतंत्रता संग्राम” ( जिसे "सावरकर" ने माना है) न तो प्रथम,
न राष्ट्रीय और ना ही स्वतंत्रता संग्राम थामार्क्सवादियों के
अनुसार यह सैनिक व कृषकों का प्रजातांत्रिक गठजोड़ था जो
विदेशी तथा सामंती दासता से मुक्त होना चाहता था।


उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न विचारकों
के मत में आंशिक सत्यता ही है, कोई भी मत पूर्णतया
सत्यता की कसौटी पर खड़ा नहीं उतरता…यह एक
जन आंदोलन अर्थात “पापुलर रिवोल्ट” था जो सैनिकों
के मूल से शुरु हुआ एवं असंतुष्ट सामंतों ने इसका नेतृत्व
किया…। यह एक सरकार कि नीतियों के विरुद्ध जन विद्रोह
था जिसमें दोनों ने मिलकर हिस्सा लिया।


इस गंभीर विश्लेषण से पता चलता है, हाँलाकि “1857 का
विद्रोह” असफल रहा मगर यह व्यर्थ नहीं गया, यह हमारे
इतिहास का एक शानदार पड़ाव था; यह पुरातन भारतीय
नेतृत्व को बचाने का एक हताशा-पूर्ण प्रयास जरूर था परंतु
यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए भारतीयों का
प्रथम महान संघर्ष था। इसने आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन
को नींव प्रदान किया तथा विदेशी शक्ति को समाप्त करने
के लिए जिस वीरता व बलिदान की भावना का परिचय
दिया वह आने वाले भारतीय जन-नायकों की प्रेरणा का
अक्षुण्ण स्रोत बना रहा…।
मैं इस लेख के माध्यम से उन समस्त वीरों को
सादर प्रणाम करता हूँ…।
भाइयों ;
“महात्मा बुद्ध” से एक प्रश्न पूछा गया कि
“मनुष्य को सबसे समान रुप से प्रेम क्यों करना चाहिए?
“बुद्ध” का उत्तर बड़ा अनूठा था—“क्योंकि प्रत्येक मनुष्य
के असंख्य और विविध जन्मों में कभी-न-कभी अन्य प्रत्येक
जीव किसी-न-किसी रूप में उसे प्रिय रहा है।

यह हमें याद दिलाता है कि हमें व्यवहार में कैसा
परिवर्तन करना चाहिए…मुझे आप अपना कोप-भाजन
न बनाये इस कारण यह लिखना पड़ा JJ
2:39 PM
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2:39 PM

Divine India

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प्रश्नों की भौतिक भूमि पर खड़ा “द्रष्टा”




“हमेशा चाहना यही होती है कि पूछा जाये मुझसे मेरी निकटता
के दो प्रश्न…उलझु न जिसमें ‘मैं’ और दंभ पुलकित होता हो,
शायद ही कभी अपने सपनों की दो-चार पंक्तियाँ लिखता हूँ…
इच्छाओं व तृष्णाओं के जो शिखर बुनता जाता हूँ…
वह अंतस्थ तृप्त उदगारों में ही विसर्जित कर देता हूँ…
कहीं खुल न जाये भीतरी भेद मेरे अवचेतन मन के वातायन से
और सुन कर जान साथी मित्र मुझे छोड़ दूर न हो जाएँ…”॥

  • मैंने मिश्रित प्रश्नों के उत्तर दिये हैं जिसे “राजीव जी”,
    “राकेश जी” और “मान्या जी” ने मुझसे पूछा था…

    प्रश्नदो प्रिय पुस्तकें और दो प्रिय चलचित्र…।

  • कोई भी विचारशील पुस्तक जिसकी पंक्तियों पर रुककर
    चिंतन किया जा सके और जो मानसिक कोष्टकों को भी
    चोट पहुँचाए…ऐसी पुस्तकों में “Indian Philosophy”
    by S RadhaKrishn & M Hiriyanna और
    “रश्मिरथी”—राष्ट्रकवि "दिनकर" विरचित।
  • 'सिनेमा' समाज और मानव कुंठा का दर्पण है…आगे
    निकलता समाज पीछे मुड़कर देखना नहीं चाहता क्योंकि
    उसकी मानसिकता नीचे देखने नहीं देती तो इसपर रहनेवाले
    भूमि पर न खड़े होकर सदा आसमान में विचरण करते रहते
    हैं…। इन आधारों को माना जाए तो “प्यासा” बेहतरीन फिल्म
    है और समाज की कुंठा का परिणाम “अंकुर” में दिखता है।

    प्रश्नक्या लिखना पसंद करते है और क्या प्रेरित करता है?

  • आनंद और Romance न हो तो यह जिंदगी बोझिल
    हो जाए… दबी-दबी सी, घुटन भी होगी…चाहता हूँ बंदिशों से
    पार भीतर उतर कर बाहर को टटोलूँ…प्रकृति के ताजे नूपुरों
    पर बस एकबार खुल कर थिरकूँ “परमात्मा” की कलाकृतियों
    में छिपे रहस्यों को पहचान सकूँ…जरा देख सकूँ कि उन
    पत्तों पर क्या लिखा है…॥

    प्रश्नक्यों लिखते हो…?

  • मैं लिखता नहीं…!!! लिखना बड़ा चतुराई का काम
    है… और फिर लिखते तो सारे हैं…कोई कलम से तो कोई
    तन्हाई में तो कोई बातों से…। मैं तो बस मानसिक तरंगों
    और शब्दों का व्यापारी हूँ।

    प्रश्नजीवन की कोई सनसनीख़ेज़, धमाकेदार और
    रोमांचकारी घटना…।

  • जीवन बनाम गति…अर्थात इसके साथ-साथ
    कथाएँ, कहानियाँ, घटनाएँ चलती रहती हैं…बस वही घटनाएँ
    स्मरण में रहती हैं जो बहुत दु:ख या चरम सुख के स्तर
    पर ठहर जाती हैं, लेकिन छोटे-छोटे वाक्यांश जो सदा हमारे
    साथी होते हैं वही भूला हो जाता है और दूर के शोर याददाश्त
    बन जाते…लेकिन प्रश्न के लिहाज से जब मैं 14 साल पहले
    संन्यास लेने निकला था और मेरा “अनुज” मेरे साथ था…
    उसकी पलकों से बंधे सलील ने स्नेह की नई परिभाषा मुझे
    सिखलाई, हाथ पकड़ कर तो रोक नहीं सकता था; वो आँसू
    जेल बन गये थे।

    प्रश्नकिस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसंद हैं…।

  • सच कहा जाए तो कोई भी चिट्ठा अपने-आप में
    पूरा या उत्कृष्ट नहीं होता, हाँ उसकी कुछ पोस्ट जिसे आप
    Topic कह सकते हैं अच्छा लगता है और उसपर ही टिप्पणी
    भी करता हूँ…अभी तो हिंदी ब्लागिंग स्वयं रास्ता ढूंढ़ रहा है…
    तो इसकी सीमाएँ संकुचित हैं।
  • चूंकि मेरे करीबी मित्र भी हैं इसमें और गुरूजन
    भी और ठहरा मानव तो पूर्वाग्रह होना स्वभाविक ही है तो
    उनकों बिल्कुलअलग मानता हूँ। सीखना चाहता हूँ तो
    सभी को पढ़ना भी होताहै जो अच्छा लगा
    “बस ओढ़ ली चदरिया उसकी”

    प्रश्नआपकी स्व-रचित पसंदीदा रचना कौन सी है?

  • प्रत्येक लेखनी पुत्र के समान होती है एक लेखक
    के लिए, लेकिन कुछ भावनाएँ हमेशा तैरती रहती हैं और
    जब उन्हें शब्द मिल जाते हैं तो वह जीवंत हो उठती हैं…
    ऐसी ही रचना हैं “वो कौन है” जिसे अभी पोस्ट नहीं किया
    है किंतु मौका मिलने पर डाल दूँगा।

    प्रश्नकला पक्ष का भाव पक्ष से रिश्ता कितना महत्वपूर्ण है?

  • एक प्रकार से कला पक्ष भाव पक्ष ही है…शब्द
    अलग-अलग हैं पर संस्कार एक है…।

    प्रश्नलिखने से ज्यादा पढ़ना मन-पसंद क्यों विधा है?

  • भाई यह तो दो-धारी तलवार है…ज्यादा पढ़ना व्यक्ति
    को विचार संपन्न बनाता है…अज्ञान को ज्ञान से जोड़ता है
    लेकिन साथ में अहंवाद को भी प्रश्रय देता है जब हम स्वयं
    को विद्वान समझने की भूल करने लग जाते हैं।

    प्रश्नआपके जीवन के दो महत्वपूर्ण व्यक्ति…।

  • प्रत्येक के जीवन में सामान्यत: माता-पिता से
    ज्यादा महत्वपूर्ण कोई नहीं हो सकता लेकिन मेरे लिए
    “मेरी पगली’या” और “मेरा अनुज”!! एक सत्य है तो
    दूसरा सार्थक!!!

    प्रश्नअपनी एक अच्छाई और बुराई…।

  • मेरी जो अच्छाई है वही बुराई भी है यानि जो मैं
    चरम रुप में करता हूँ वह बुराई है ऐसा मानता हूँ और
    शांत आश्रय मेरी अच्छाई॥

    प्रश्नमूड खराब होने पर कौन सा गाना सुनते हैं?

  • मूड खराब होने पर कोई गीत सुन भी कैसे सकता है!!
    अंधेरे कमरे में तन्हाइयों पर अकेले-पन का सर रखकर
    निरीह और निर्बल भावनाओं को आँखे बंद कर घंटों देखना
    और तलाश उस स्थिती की जहाँ मैं रुक जाऊँ।

    प्रश्नआप किसी साथी चिट्ठा-कार से प्रत्यक्ष मिलना
    चाहते हैं, तो वह कौन है और क्यों?

  • बिल्कुल नहीं!!! कितने सुंदर-सुंदर भावनात्मक
    चिट्ठे रोज़ लिखे जाते हैं, हर दिन उनकी सुंदरता
    व्यक्तित्व की प्रखरता उनके भाव में अनुभूत होती हैं…जो मेरे
    मन को आमोद-प्रमोद से खिलखिलाती हैं, मेरा चित्रकारी मन
    आवेश की ब्रुश से बहुतों के Sketch बना रखे हैं तो कृपया
    जीने दे मुझे मेरे जाने तस्वीरों के सहारे जो परम पाकीज़ा और
    परम पुनीत भी है…।!!!अवर्णनीय!!!
    जो मजा अदृष्ट में है दृष्टता तो महज खेल है…।

मेरा प्रश्न…सभी ब्लागर मित्रों से है--

आपको अपने भीतर की "शून्यता" में क्या दिखता है जिसे

पाकर खो दिया…।

3:44 PM
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3:44 PM

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